क्षुद्रग्रह के पहले नमूने लेकर लौटा यान

इटोकावा क्षुद्रग्रह
Image caption आलू के जैसे दिखनेवाले पाँच सौ मीटर लंबे इटोकावा क्षुद्रग्रह की सतह पर कई चट्टान हैं

जापान का एक अंतरिक्ष यान सात साल की यात्रा के बाद ऐसे नमूने लेकर धरती पर लौटा है जो संभवतः किसी क्षुद्रग्रह की सतह के पहले नमूने हो सकते हैं.

ये छोटा यान कोई पाँच अरब किलोमीटर की यात्रा के बाद रविवार को दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया में लौटा.

वैज्ञानिक अब यान से लाए गए नमूनों से ये पता लगाने की कोशिश करेंगे कि क्या उनसे सौर मंडल के उद्भव के बारे में कोई जानकारी मिल सकती है.

हायाबुसा अभियान वर्ष 2003 में शुरू हुआ था जब इस यान को इटोकावा नामक एस्टेरॉयड या क्षुद्रग्रह की ओर भेजा गया.

आलू की तरह दिखनेवाली इस 500 मीटर लंबी उल्का पर इस यान ने वर्ष 2005 में तीन महीने बिताए.

देर

Image caption तकनीकी गड़बड़ियों के कारण हायाबुसा यान तीन साल देर से लौटा

यान को धरती पर वर्ष 2007 में ही लौट आना था मगर तकनीकी गड़बड़ियों के कारण इसमें तीन साल की देर हो गई.

वैसे अभी भी ये संदेह बना ही हुआ है कि इस यान के भीतर वास्तव में इटोकावा के नमूने हैं कि नहीं क्योंकि हायाबुसा यान की क्षुद्रग्रह के टुकड़ों को बटोरने की व्यवस्था में ख़राबी आ गई थी.

लेकिन जापानी अंतरिक्ष एजेंसी के वैज्ञानिकों को सफलता की उम्मीद है.

उनका कहना है कि हायाबुसा यान जब उल्का पर उतरा था तो उस वक्त कुछ-ना-कुछ नमूने ज़रूर यान के भीतर चले गए होंगे.

हालाँकि यान की वापसी के समय असल अंतरिक्ष यान नष्ट हो गया और अब उसके भीतर नमूने एकत्र करनेवाला कैप्सूल ही वापस आया है.

विश्लेषण

फ़िलहाल इस कैप्सूल का विश्लेषण किया जाएगा जिसमें कई महीने लग सकते हैं और तभी वैज्ञानिक ये कह सकेंगे कि हायाबुसा इटोकावा के नमूने लेकर लौटा है या नहीं.

इन नमूनों से सौर मंडल की आरंभिक स्थिति के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है और पता चल सकता है कि साढ़े चार अरब वर्ष पहले ग्रह कैसे बने.

इन नमूनों के अध्ययन से जुड़ने रहनेवाले ऑस्ट्रेलियाई नेशनल युनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर ट्रेवर आयरलैंड कहते है कि धरती पर मिलनेवाले चट्टानों से कोई जानकारी नहीं मिल सकती क्योंकि उनका रूप कई बार परिवर्तित हो चुका है.

वे कहते हैं,"यदि हमने धरती पर मिलनेवाली किसी भी चीज़ को देखा तो पाएँगे कि वह कई बदलावों से गुज़र चुका है. इसलिए ये पता लगाने के लिए कि हमारी धरती कैसे बनी, हमें धरती से बाहर जाना होगा.

उनके शब्दों में - "हायाबुसा और इटोकावा का महत्व इसी बात में निहित है."

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