'कार्बन गैसों में कमी अनुमान से अधिक'

जंगल
Image caption सरकार ने वर्ष 2020 तक ग्रीन हाउस गैंसों में 20 प्रतिशत तक कटौती का लक्ष्य रखा है

बंगलौर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस (आईआईएस) के एक शोध में दावा किया गया है कि ग्रीन इंडिया मिशन से ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में कमी उससे कहीं अधिक हो सकती है जितना पहले अनुमान लगाया गया था.

इसे शोध के अनुसार यह गैस उत्सर्जन में कमी का आंकड़ा अनुमान से चार प्रतिशत तक अधिक हो सकता है.

पर्यावरण और वन मंत्रालय के 'ग्रीन इंडिया मिशन' के तहत अनुमान लगाया गया था कि देश में होने वाले वनारोपण से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 6.4 प्रतिशत तक की कमी होगी जबकि नया शोध कहता है कि वास्तव में यह कमी 10.5 प्रतिशत तक हो सकती है.

हालांकि अभी इस शोध की समीक्षा की जा रही है उसके बाद इसे आईआईएस की पत्रिका 'करेंट साइंस' में प्रकाशित किया जाएगा.

'ग्रीन इंडिया मिशन' भारत सरकार की योजना है जिसके तहत देश में एक करोड़ हेक्टेयर क्षेत्रफल में वनारोपण का कार्यक्रम है ताकि पेड़ पर्यावरण में मौजूद कार्बन को अवशोषित कर लें.

इससे कार्बन और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आने की उम्मीद की जा रही है.

ये मिशन अभी जनता के परामर्श के लिए रखा गया और अभी लागू नहीं किया गया है. इस मिशन में 44,000 करोड़ रुपए ख़र्च होने का अनुमान है.

अगर ये नए आंकड़े सही निकले तो भारत के कार्बन उत्सर्जन में काफ़ी कमी आ सकती है.

शोधकर्ता का कहना है कि अगर 2005 को अगर आधार वर्ष माना जाए तो साल 2020 तक ग्रीन हाउस गैसों में 20 से 25 प्रतिशत तक आसानी से कम किया जा सकेगा.

उल्लेखनीय है कि दिसंबर 2009 में कोपनहेगन में हुए जलवायु सम्मेलन से पहले ही भारत 2020 तक 20 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन कम करने का भरोसा दे चुका है.

सरकारी अनुमान कम क्यों है?

यह शोध आईआईएस के प्रोफ़ेसर एनएच रविंद्रनाथ के प्रतिनिधित्व में किया गया है.

प्रोफ़ेसर रविंद्रनाथ ने बीबीसी से कहा , "सरकार ने जो अनुमान लगाया है उसमें मिट्टी में जमा होने वाले कार्बन को हिस्सा नहीं बनाया गया है इसलिए ये आंकड़ा कम है."

Image caption वैश्विक तापमान बढ़ने की वजह से सभी देशों पर ग्रीन हाउस गैंसों में कटौती का दबाव बना हुआ है

उनका कहना है, "कार्बन दो तरह से जमा होता है. एक तो कार्बन लकड़ी में और जड़ों में जमा होता है जिसे ज़मीन के ऊपर का जैव ईंधन कहते हैं या फिर मिट्टी के अंदर कार्बन जमा होता है. सरकार ने जो अनुमान लगाए हैं वह सिर्फ ज़मीन के ऊपर के जैव ईंधन के आधार पर लगाए हैं."

सरकार ने वर्ष 2020 के लिए 'मिटिगेशन पोटेंशियल' का अनुमान 1.5 प्रतिशत लगाया है जबकि प्रोफ़ेसर रविंद्रनाथ का कहना है कि उनके मॉडल के अनुसार ये अनुमान 6.4 प्रतिशत होना चाहिए.

'मिटिगेशन पोटेंशियल' ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को काबू में करने की क्षमता होती है जिसे कोमैप नाम के मॉडल से नापा जाता है.

'ग्रीन इंडिया मिशन' के तहत अनुमान लगाया गया है कि एक करोड़ हेक्टेयर में वनारोपण किए जाने से नए जंगलों में कितना कार्बन जमा होगा और इससे भारत का उत्सर्जन कितना कम हो पाएगा.

प्रोफ़ेसर रविंद्रनाथ ने सरकारी अनुमान में एक और कमी की ओर ध्यान खींचा है.

उनका कहना है कि सरकार और शोध की गणना में जंगलों की लकड़ी से निकाले गए ईंधन पर ध्यान नहीं दिया गया है जिससे आंकड़ा कम हो सकता है.

लेकिन इस बात की गणना करने का कोई तरीक़ा नहीं है कि आने वाले दिनों में लोग लकड़ियों से कितना ईंधन निकालेंगे.

प्रोफ़ेसर रविंद्रनाथ को विश्वास है कि समीक्षा के बाद उनका शोध ज़रुर प्रकाशित किया जाएगा.

इस शोध पर सरकार और दूसरे विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया भी उसके बाद ही आएगी.

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