कछुए के अंत का कारण मानव

  • 18 अगस्त 2010
विशालकाय कछुआ
Image caption विशालकाय कछुए लाखों वर्षों तक जीवित रहे

एक शोध के मुताबिक क़रीब तीन हज़ार वर्ष पहले विशालकाय कछुए की एक प्रजाति के अंत के लिए मानव जिम्मेदार है.

इस शोध में पहली बार साफ़ तौर पर यह बात सामने आई है कि विशालकाय जंतुओं के अंत में मानव की एक भूमिका रही है.

यह शोध पत्र 'प्रोसिडिंग्स ऑफ़ द नेशनल अकेडमी ऑफ़ साइसेंज ऑफ़ यूनाइटेड स्टेट्स (पीएनएएस)' में प्रकाशित हुआ है.

वानुआतु के एक द्वीप पर ऑस्ट्रेलियाई शोध दल ने कछुए के पैर की हड्डियों को पाया. हालांकि उन्हें वहाँ खोपड़ियाँ वगैरह नहीं मिली.

ये हड्डियाँ मानव के आने के 200 वर्षों के बाद के समय-काल को दर्शाती है. इससे इस बात का अंदाज़ा लगाया जा रहा है कि मानव ने खाने के लिए उनका शिकार किया होगा.

ग़ौरतलब है कि ये कछुए अन्य विशालकाय जंतुओं के मुक़ाबले लंबे समय तक जीवित रहे.

ये कछुए ढाई मीटर लंबे होते थे और उनके सिर पर डरावना सींग होता था.

बेहतरीन काम

ऑस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले चर्चित जीव वूलेन मैमोथ (ऊन से ढके रहने वाले, हाथी के आकार-प्रकार के) जहां 50 हज़ार वर्ष पहले ख़त्म हो गए, वहीं ये कछुए काफ़ी लंबे समय तक जीवित रहे. लापिटा नाम से जाने जाने वाले लोगों के आने के बाद इन पर ख़तरा मंडराने लगा.

चार्ल्स डार्विन ने चिली में जब पहली बार विशालकाय जीव के अवशेष पाए थे, तब से लेकर इन 150 वर्षों में विशालकाय जीवों के लापता होने के कारणों के बारे में काफ़ी बहस होती रही है.

इनमें जलवायु परिवर्तन से लेकर मानव के प्रभाव और सब कुछ ख़त्म कर देने वाले उल्का पिंड को जिम्मेदार माना जाता रहा है.

लंदन के एक्सटर विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर क्रिस टरनी ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "लाखों वर्षों तक ये जीव इस द्वीप पर जीवित रहे लेकिन जैसे ही इन लोगों ने वहाँ बसेरा बनाया कुछ सौ वर्षों के अंदर ही ये ग़ायब हो गए."

उन्होंने इसे 'एक बेहतरीन काम बताया' है.

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