गेहूँ की जेनेटिक संरचना की पहेली हल

  • 27 अगस्त 2010
Image caption कई वर्षों से गेहूँ का उत्पादन नहीं बढ़ा है

ब्रिटेन के वैज्ञानिकों ने गेहूँ की जेनेटिक संरचना का पूरा विवरण तैयार कर लिया है, उम्मीद की जा रही है कि इस वैज्ञानिक उपलब्धि से गेहूँ की पैदावार बढ़ाने में काफ़ी मदद मिल सकती है.

इससे गेहूँ की नई क़िस्में तैयार करना काफ़ी आसान हो जाएगा. पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर में गेहूँ की माँग बढ़ी है लेकिन उत्पादन उस अनुपात में नहीं बढ़ा है.

चावल और गेहूँ को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण खाद्यान्न माना जाता है, चावल की जेनेटिक सरंचना का पूरा विवरण वैज्ञानिक पहले ही प्रकाशित कर चुके हैं.

ब्रिटेन की लिवरपूल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने डॉक्टर नील हॉल के नेतृत्व में यह अध्ययन किया है.

इस जानकारी के सामने आने से किसानों और कृषि वैज्ञानिकों को कई फ़ायदे हो सकते हैं, मिसाल के तौर पर वे फ़सल के तैयार होने का समय कम कर सकते हैं, मौसम और जलवायु के अधिक अनुकूल नस्लें तैयार की जा सकती हैं और उत्पादन तो बढ़ाया ही जा सकता है.

वैज्ञानिकों ने यह सफलता ऐसे समय हासिल की है जब दुनिया में गेहूँ की किल्लत होने की आशंका व्यक्त की जा रही है, भारी गर्मी पड़ने की वजह से रूस में गेहूँ का उत्पादन प्रभावित हुआ है और रूस ने गेहूँ के निर्यात पर रोक लगा दी है.

जटिल चुनौती

गेहूँ की बहुत अधिक खपत वाले देश पाकिस्तान में बाढ़ की वजह से पूरी फ़सल तबाह हो गई है जबकि चीन में फ़सल प्रभावित हुई है.

Image caption रूस में आग से तबाह हुई गेहूँ की फ़सल

इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रोफ़ेसर हॉल ने कहा, "एक हेक्टेयर से आठ टन से अधिक गेहूँ नहीं मिल पाता, इसकी वजह यही है कि किसानों के पास बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, गेहूँ का जीनोम काफ़ी जटिल रहा है. लेकिन अब इस अध्ययन के बाद स्थिति में काफ़ी बेहतरी आ सकती है."

गेहूँ के जीनोम का अध्ययन काफ़ी जटिल वैज्ञानिक चुनौती थी, यह अब तक की सबसे बड़ी जेनेटिक संरचना है, मानव जीन से पाँच गुना अधिक बड़ी गेहूँ की जेनेटिक संरचना है.

इससे पहले वैज्ञानिक चावल और मक्के की जेनेटिक संरचना का पूरा विवरण मालूम कर चुके हैं लेकिन वह गेहूँ के मुक़ाबले काफ़ी आसान काम था.

डॉक्टर नील हल का कहना है कि नई वैज्ञानिक तकनीकों और विशेष कंप्यूटरों की मदद के बिना यह काम संभव नहीं था इसलिए चावल और मक्के की जेनेटिक संरचना का पूरा विवरण उपलब्ध था लेकिन गेहूँ के मामले में अब तक ऐसा नहीं हो पाया था.

वैज्ञानिक अब इस जानकारी के आधार पर गेहूँ की अलग-अलग क़िस्मों के बारे अधिक जानकारी जुटा सकेंगे और उन्हें बेहतर बना सकेंगे.

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