मानसिक विक्षिप्तता का ख़तरा तेज़

डिमेन्शिया

दुनिया भर में मानसिक विक्षिप्तता या डिमेंशिया का ख़तरा इतनी तेज़ी से बढ़ रहा है कि दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद का एक प्रतिशत इसके इलाज पर ही ख़र्च हो जाएगा.

लंदन के किंग्स कॉलेज और स्वीडन के कार्लोनिस्का इंस्टीट्यूट के एक संयुक्त अध्ययन के मुताबिक यह बीमारी चीन, भारत और लातिन अमरीका जैसे विकासशील क्षेत्र में तेज़ी से पैर पसार रही है.

रिपोर्ट के लेखकों के अनुसार इस वर्ष मानसिक विक्षिप्तता पर होने वाला ख़र्च छह सौ अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है.

एक देश की अर्थव्यवस्था

लेखकों का कहना है कि यह इतनी बड़ी रक़म है कि इसका अंदाज़ा लगाने के लिए अगर यह माना जाए कि एक पूरा देश चलाना है तो यह दुनिया की 18वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगी और इसका दर्जा तुर्की और इंडोनेशिया के बीच कहीं होगा.

रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले वर्षों में यह ख़र्च और बढ़ेगा.

मानसिक विक्षिप्तता एक लाइलाज बीमारी है लेकिन रिपोर्ट के लेखकों का मानना है कि इस के लिए ईजाद की गई किसी भी दवाई का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसा प्रचार होना चाहिए जैसा एचआईवी की दवाइयों का होता है.

इस बीमारी पर होने वाले ख़र्च का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा पश्चिमी यूरोप और उत्तर अमरीका में केंद्रित है.

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