भारत में होती है सबसे ज़्यादा शिशुओं की मौत

बीमार बच्चा
Image caption शोधकर्त्ता मानते हैं कि शिशुओं को मौत के मुँह से बचाना उतना मुश्किल नहीं.

विज्ञान की दुनिया की जानीमानी पत्रिका 'द लांसेट' का कहना है कि भारत में 2005 के पूरे साल में 15 लाख बच्चों की मौत उन कारणों से हुई जिन्हें टाला जा सकता है.

लांसेट का कहना है कि भारत में जच्चा बच्चा का बेहतर ध्यान रखने, दस्त और निमोनिया के मामलों के बढ़िया उपचार व्यवस्था और टीकाकरण कार्यक्रमों में नए टीकों को शामिल करने से भारत में बच्चों के मौत के मामलों में कमी लाई जा सकती है.

इस विषय पर हुए शोध का नेतृत्त्व रजिस्ट्रार जनरल ऑफ़ इंडिया ने किया है.

भारत में पिछले दो दशक में शिशु मृत्यु दर में कमी आई है लेकिन इसके बावजूद संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि सिर्फ़ 2005 में ही भारत में 20 लाख 35 हज़ार बच्चों की मौत हुई.

ये आंकड़ा दुनिया भर में हुई शिशुओं की मौत का 20 प्रतिशत है जोकि दुनिया के किसी भी देश से ज़्यादा है.

सरल भाषा में अगर यही बात कही जाए तो इसका मतलब ये हुआ कि दुनिया भर में सबसे ज़्यादा शिशुओं की मौत भारत में ही होती है.

पाँच वर्ष से कम उम्र के बच्चे को ‘शिशु’ माना जाता है.

मौत के ज़िम्मेदार

भारत में इस तरह की ज़्यादातर मौत के लिए घर पर बच्चा पैदा करने की व्यवस्था और मेडिकल सुविधा की कमी ज़िम्मेदार है.

शोध में जमा किए गए आंकड़ों से ये भी पता चलता है कि समय से पहले पैदा होना और पैदा हुए बच्चे का वज़न कम होना शिशुओं की मौत के दो प्रमुख कारण हैं.

इसके अलावा 50 प्रतिशत शिशुओं की मौत के लिए दस्त और निमोनिया ज़िम्मेदार है.

शोध करने वालों का कहना है कि इस बात पर चिंता जताई गई है कि भारत में शिशुओं के मृत्यु दर में उस तेज़ी से कमी नहीं आ रही जैसी कि आनी चाहिए.

Image caption शोधकर्त्ताओं का मानना है कि बेहतर टीकाकरण से शिशुओं की मौत को बचाया जा सकता है.

शोधकर्ताओं ने कहा है कि “हमारा शोध दर्शाता है कि जन्म के समय हुए बच्चे के मौत के 50 प्रतिशत मामलों के लिए दम घुटना और जन्म के समय की पेचीदगियाँ,सेप्सिस,निमोनिया और टेटनस ज़िम्मेदार है.प्रसव के दौरान और उसके बाद बेहतर ख़याल रखने से ज़्यादातर मौतों को रोका जा सकता है.”

शोधकर्त्ताओं ने कहा है कि शिशुओं की मौत के मामले में लड़कों की तुलना में लड़कियों के मौत पर अगर नज़र डालें तो क्षेत्र और मृत्यु के कारण को देखते हुए कहा जा सकता है कि इसके लिए सामाजिक और जैविक कारण भी हैं.

ये शोध 2005 तक के लिए है.

2006 से भारत में बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए क्रार्यक्रम चलाया गया जिसको राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य अभियान के तौर पर जाना जाता है.

इस कार्यक्रम के अंतर्गत अस्पतालों में प्रसव कराने और टीकाकारण पर ज़ोर दिया गया है और इसकी वजह से शिशु मृत्यु दर में कमी आई होगी, ये कहा जा सकता है.

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