शहर जंग के नए मैदान

पृथ्वी
Image caption 2030 तक दुनिया की 59 फ़ीसदी आबादी शहरों में होगी.

संयुक्त राष्ट्र ने चेताया है कि शहरी क्षेत्र पर्यावरण बचाने के लिए नए जंग के मैदान होंगे.

संयुक्त राष्ट्र की संस्था यू एन हैबीटैट के आकलन के अनुसार धरती के महज़ दो फीसदी हिस्से पर काबिज़ शहर पृथ्वी पर 70 प्रतिशत प्रदूषण के जनक हैं.

इस नए अध्ययन का कहना है कि शहरों की बेहतर बसाहट और सटीक योजनाएँ बहुत बड़ी मात्रा में बचत पैदा कर सकती हैं. शोधकर्ताओं का कहना है कि अगर कोई कदम नहीं उठाया गया तो "पर्यावरण में हो रहे बदलावों और शहरों के बीच में एक घातक टकराव हो सकता है".

मानव बसाहटें, शहर, और जलवायु परिवर्तन : दिशा निर्देशों पर अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट 2011 का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य इस बारे में जागरूकता लाना है की शहर किस तरह से जलवायु परिवर्तन को बढ़ा रहे हैं और इसे रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं.

चिंताजनक चलन

यू एन हैबीटैट के कार्यकारी निदेशक जोआन क्लॉस का कहना है कि दुनिया में शहरीकरण का बढ़ता चलन प्रदूषण के बढ़ते उत्सर्जन को काबू करने के नज़रिए से बड़ी चिंता का विषय है.

उन्होंने कहा, "हम शहरीकरण को बढ़ता हुआ देख रहे हैं और दुनिया की पचास फ़ीसदी आबादी शहरों में रहती है और ये चलन थमता हुआ नहीं दिख रहा".

क्लॉस का कहना है कि बढ़ते शहरीकरण का सीधा मतलब है ऊर्जा के इस्तेमाल का बढना.

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार साल 2030 तक दुनिया की 59 फ़ीसदी आबादी शहरों में रह रही होगी. हर साल करीब छह करोड़ सत्तर लाख लोग शहरों में बढ़ रहे हैं. इस संख्या में सबसे ज़्यादा इज़ाफ़ा विकासशील देशों में हो रहा है.

शहरी क्षेत्रों में ज़्यादा ऊर्जा के इस्तेमाल के कारण बताते हुए क्लॉस ने कहा कि शहरों में ज़्यादातर ऊर्जा यातायात में, इमारतों को गर्म या ठंडा रखने में और आर्थिक गतिविधियों से पैसा कमाने में ख़र्च होती है.

इन्हीं कारणों से शहरों को जलवायु परिवर्तन के संभावित नतीजों का पहले सामना करना पड़ सकता है.

संभावित नतीजों को गिनाते हुए इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इनमें मुख्य हैं गर्म और शीतलहरों का बढ़ना, बहुत ज़्यादा बारिश और सूखे क्षेत्रों की संख्या में बढ़ोत्तरी. दुनिया के कई इलाकों में समुद्र का जलस्तर बहुत ज़्यादा बढ़ सकता है.

दक्षिण अफ्रीका उन इलाकों में से एक है जो जलवायु परिवर्तान के नतीजों का सबसे ज़्यादा सामना कर सकता है.

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Image caption शहरों से उपजता है दुनिया का सत्तर प्रतिशत प्रदूषण

शोध कर्ताओं का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से शहरी इलाकों को मूलभूत सुविधायें जैसे पानी, बिजली, यातायात तक मिलना मुश्किल हो सकता है.

क्लॉस का कहना है, "बहुत जगहों पर स्थानीय अर्थव्यवस्थाएं और आम लोग अपनी कमाई और रोज़ी रोटी से महरूम हो सकते हैं ".

जिन इलाकों को सबसे ज़्यादा ख़तरा हो सकता है उनमें से दक्षिण एशिया प्रमुख है. इसके अलावा दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण अमरीका का पूर्वी तट और अमरीका का पश्चिमी तट जलवायु परिवर्तन की आग से जल सकते हैं. इन इलाकों को सूखे, बाढ़, भूकंप जैसी आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है.

कदम उठाने ही होंगें.

डॉ क्लॉस ने बीबीसी से कहा कि "यूं तो सारी दुनिया को जलवायु परिवर्तन को रोकने की लड़ाई करनी है लेकिन शहर इस लड़ाई में बहुत ख़ास भूमिका अदा कर सकते हैं."

इस रिपोर्ट का कहना है कि ऊर्जा का इस्तेमाल व्यक्तिगत स्तर पर होता है और यहीं पर शहर और स्थानीय निकाय बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं चाहे उनकी राष्ट्रिय सरकारें इस समस्या से निपटने के लिए कोई कदम उठाएं न उठाएं .

इस रिपोर्ट में स्थानीय निकायों से आग्रह किया गया है कि वो जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपने स्तर पर योजनायें बनाएं.

स्थानीय निकायों को ना केवल ऊर्जा की खपत को कम करना होगा बल्कि बाढ़ जैसी आपदाओं से निपटने के लिए तैयारी भी करनी होगी.

यू एन हैबिटैट का मानना है कि स्थानीय निकायों को इस काम में अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय निति निर्धारकों की मदद की भी दरकार होगी.

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