साइबर हमले के नए निशाने

इंटरनेट हमले
Image caption राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति 2010 में लॉच हुई थी.

एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में इटंरनेट का इस्तेमाल करने वाली मूलभूत सेवा प्रणालियों पर साइबर हमले तेज़ हो गए हैं.

इन हमलों से अब गैस, ऊर्जा और पानी जैसी ज़रूरी चीज़े मुहैया करवाने वाले तंत्र पर ख़तरा बढ़ गया है.

इस सिलसिले में एक कंपनी मैक्फ़ी ने 14 देशों में यूटिलिटी सेवाएं देने वाली आईटी कंपनियों के 200 कर्मचारियों से बात कर एक सर्वेक्षण किया.

सूचना प्रौद्यौगिकी के क्षेत्र में काम करने वाले इन 10 में से आठ कर्मचारियों का कहना था कि पिछले साल उनके नेटवर्क को हैकर्स ने निशाना बनाया था.

ये देखा गया कि चीन की तरफ़ से ऐसे हमले सबसे ज़्यादा हुए. उसके बाद इन हमलों में रूस और अमरीका का नाम आया.

हमले बढ़े

इस रिपोर्ट के अनुसार साल 2009 के मुक़ाबले ऐसे हमलों की संख्या में और बढ़ोत्तरी देखी गई.

इनमें से ज़्यादा मामलों में सुरक्षा का उल्लघंन इस रूप में हुआ कि ज़्यादातर प्रणालियों ने सेवा ही देना बंद कर दिया.

साइबर हमला करने वाले इन अपराधियों ने एक कंप्यूटर नेटवर्क पर नियंत्रण कर इन कंपनियों की इंटरनेट प्रणाली पर हमला बोल दिया.

हालांकि ये भी आशंका बरक़रार है कि ऐसे हमले भविष्य में और नुक़सान पहुंचा सकते है.

इंटरनेट से एक ओद्यौगिक प्रणाली को भी ख़तरा हो सकता है. इसके एक बेहतरीन उदाहरण के तौर पर स्टक्सनेट वर्म का नाम लिया जा सकता है.

स्टक्सनेट वर्म की खोज 2010 में हुई थी.

विश्लेषकों का मानना है कि इस वर्म या कंप्यूटर कोड का डिजाइन विशेष तौर पर ईरान के बुशहर या नानताज़ की परमाणु प्रणालियों में मौजूद मशीनरियों पर नियंत्रण करने के लिए किया गया था.

मैक्फ़ी के शोधकर्ताओं के मुताबिक इस बात की जानकारी मिल चुकी है कि ये वर्म अपने निश्चित निशाने से भी आगे बढ़ चुका था.

इन युटिलिटी कंपनियों ने जब अपने कंप्यूटरों में स्टक्सनेट वर्म के नमूने ढूढ़ने की कोशिश की तो उन्हें अपने कंप्यूटर तंत्र में 40 प्रतिशत इस वर्म के लक्षण मिले.

हालांकि इसने प्रणाली को नुक़सान नहीं पहुंचाया था क्योंकि इस वर्म को इन हमलों के लिए डिज़ाइन नहीं किया गया था.

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