हर्बल दवाओं को लेकर बदले नियम

  • 30 अप्रैल 2011
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यूरोपीय संघ में जड़ी बूटियों से बनने वाली कई दवाएँ अब दुकानों में उपलब्ध नहीं होंगी.

इस संदर्भ में नए नियम बनाए गए हैं और इनका मकसद है कि हर्बल दवाओं की वजह से होने वाले संभावित बुरे असर से मरीज़ों को बचाया जा सके.

यूरोपीय संघ के नए निर्देशों के अनुसार कई ऐसी दवाएँ जो पहले दुकानों में मिल जाती थीं अब नहीं मिलेंगी. इनमें चीनी और भारतीय दवाएँ भी शामिल हैं.

दवा बनाने वाली कंपनियों को ये साबित करना होगा कि उनके उत्पाद मानकों पर खरे उतरते हों.

अब इन दवाओं के बारे में पर्याप्त जानकारी देना ज़रूरी होगा.

बीबीसी संवाददाता का कहना है कि हर्बल दवा देने वाले और बनाने वाले दोनों को आशंका है कि इससे उनके बिज़नस पर असर पड़ेगा.

अब तक 1968 के मेडिसिन्स एक्ट का पालन किया जा रहा था. लेकिन उस दौर में बहुत कम हर्बल दवाएँ बाज़ार में उपलब्ध होती थीं और ऐसी दवा देने वाले डॉक्टर भी कम होते थे.

यूरोप में पिछले कई वर्षों से हर्बल दवा को लेकर बहस चल रही है.

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