बदलता मानसून और ब्लैक कार्बन

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Image caption भारत में मौनसून की बारिश का महीना चार महीने तक रहता है

दक्षिण एशिया में इस बार सामान्य मानसून की भविष्यवाणी की गई है और कई हिस्सों में बरसात सामान्य रूप से शुरू भी हो गई है, मगर लोगों में अभी भी चार महीने तक रहनेवाले मानसून के मौसम को लेकर चिन्ता बनी हुई है.

उनकी चिन्ता का कारण हाल के वर्षों में मानसून को लेकर रही अनिश्चितता है जिनसे कृषि पर असर पड़ा है और जिसके कारण खाद्यान्नों की कीमतें बढ़ गई हैं.

पिछले एक दशक में, कई बार मानसून के मौसम में कुछ स्थानों पर काफ़ी कम वर्षा हुई है जबकि कुछ जगहों पर असामान्य रूप से बहुत कम समय के बीच भारी बारिश हुई है.

इस वर्ष भी बारिश के स्तर में इसी तरह के उतार-चढ़ाव दिखाई देने लगे हैं.

ऐसे समय जबकि इसके पीछे जलवायु परिवर्तन का हाथ होने को लेकर बहस चल रही है, वैज्ञानिक हवा में कार्बन कणों और शहरों में धुँध जैसे कारकों का भी अध्ययन कर रहे हैं.

कार्बन के ये कण जीवाश्म ईंधनों, लकड़ी, उपलों आदि के जलने से बनते हैं.

वहीं शहरी धुँध निचले वायुमंडल में प्रदूषण करनेवाले कणों के जमने से बनती है जिसे ट्रोपोस्फे़यर ओज़ोन कहते हैं जो धरती के तापमान को गर्म करनेवाली एक महत्वपूर्ण गैस होती है.

कई वैज्ञानिक पिछले कई वर्षों से ये कहते रहे हैं कि इन कारकों से मानसून पर प्रभाव पड़ता है.

कार्बन विवाद

संयुक्त राष्ट्र की संस्था – संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम – और विश्व मौसम विज्ञान संस्थान ने अपनी एक रिपोर्ट में ज़ोर दिया है कि ब्लैक कार्बन और ओज़ोन से मानसून की बारिश के वितरण पर असर पड़ सकता है.

अपनी नवीनतम रिपोर्ट में वे लिखते हैं,”वे क्षेत्रीय तापमानों को प्रभावित कर हवाओं का रूख़ बदल सकते हैं जिससे बारिश और बर्फ़ पर असर पड़ सकता है“.

पिछले कुछ समय में ट्रोपोस्फ़ेयर ओज़ोन और ब्लैक कार्बन के बारे में कई रिपोर्टे आ चुकी हैं मगर ब्लैक कार्बन को लेकर कुछ विवाद ने ज़ोर पकड़ा है.

कई वैज्ञानिक निकायों के सरकारी नेटवर्क – इंडियन नेटवर्क फ़ॉर क्लाइमेट चेंज ऐसेसमेंट (आईएनसीसीए) – कहता है कि ब्लैक कार्बन और मानसून को लेकर विरोधाभासी बातें कही जाती रही हैं.

उसने अमरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के एक वैज्ञानिक और उनकी टीम की खोज का हवाला दिया जिसमें कहा गया था – "तिब्बत के पठार के ऊपर सौर विकिरण के सोखने और ब्लैक कार्बन के लगातार गर्म होते जाने से गर्मी बढ़ती है जिससे भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर गर्म और नम हवा जमती है और भारतीय मानसून मज़बूत होता जाता है."

मगर सभी इससे सहमत नहीं. आईएनसीसीए युनिवर्सिटी और कैलिफ़ोर्निया के पर्यावरण वैज्ञानिक वीरभद्रन रामनाथन के एक दूसरे निष्कर्ष की ओर ध्यान दिलाता है.

दूसरा मत

रामनाथन का अध्ययन ये जताता है कि धरती की सतह पर सौर विकिरण में होनेवाली बड़ी कमी के साथ-साथ निचले वायुमंडल के गर्म होने से पर्यावरण में स्थिरता आती है.

इससे वर्षा चक्र की गति धीमी पड़ती है और मानसून के मौसम में वर्षा में कमी आती है.

आईएनसीसीए ने अपने बयान में लिखा है,"क्षेत्रीय पर्यावरण के बारे में किसी नतीजे पर पहुँचने से पहले इन विरोधाभासी रिपोर्टों के परिणामों को समझना ज़रूरी है."

मगर संयुक्त राष्ट्र परमाणु कार्यक्रम और विश्व मौसम विज्ञान संस्थान की नवीनतम रिपोर्ट तैयार करनेवाले एक विशेषज्ञ, अमरीका के मैसाचुसेट्स इंस्टीच्युट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के चिएन वांग कहते हैं कि इस बारे में किसी तरह के भ्रम की स्थिति नहीं है.

उन्होंने बीबीसी से कहा,"मोटे तौर पर हर अध्ययन में दक्षिण एशिया में ब्लैक कार्बन की परत के कारण मानसून पर असर पड़ने की बात सही पाई गई है, इसलिए इस बारे में कोई अलग-अलग मत नहीं हैं.

उन्होंने कहा कि उनके अपने शोध से भी ये पता चलता है कि हवा के गर्म होने से वायुमंडल में विस्तृत क्षेत्र में स्थिरता प्रभावित होती है जिसके कारण भारत के बड़े हिस्से में बारिश कम होती है.

वे कहते हैं,"ये बात ध्यान देने वाली है कि ये ज़रूरी नहीं है कि मानसून के दौरान कुल वर्षा कम हो सकती है, मगर इससे वर्षा का वितरण बदल सकता है.

"ब्लैक कार्बन की परत से सतह भी ठंडी होती है और बहुत बड़े इलाक़े से वाष्पीकरण में कमी आ सकती है, दूसरी तरफ़ तापमान में परिवर्तन होने से सारा चक्र कमज़ोर पड़ सकता है."

बदलाव?

संयुक्त राष्ट्र परमाणु कार्यक्रम और विश्व मौसम विज्ञान संस्थान की टीम की अगुआई करनेवाले नासा के गोदार्द इंस्टीच्युट फ़ॉर स्पेस स्टडीज़ के वैज्ञानिक ड्रीउ शिन्डेल कहते हैं कि ये रिपोर्ट मानसून पर ब्लैक कार्बन के संभावित प्रभाव को जानने की दिशा में एक नई प्रगति है.

वे कहते हैं,"हम ये पता नहीं लगा रहे कि मानसून पहले या बाद में आता है कि उसकी दिशा तो नहीं बदल रही है. हमने केवल ये पता लगाया है कि वर्षा में अनियमितता हो रही है."

भारत में कुछ वैज्ञानिक इस बात को मानते हैं कि मानसून के क्षेत्रीय वितरण में बदलाव आ रहा है.

भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग के तहत काम करनेवाली संस्था नेशनल ऐटमॉसफ़ेरिक रिसर्च लेबोरेट्री के निदेशक प्रोफ़ेसर ए जयरामन कहते हैं,"बिना ब्लैक कार्बन वाला साफ़ वायुमंडल और ब्लैक कार्बन वाला गंदा वायुमंडल निश्चित रूप से अलग-अलग तरीक़े से व्यवहार करेगा. इस बदलाव की माप करना बाक़ी है और हम उसी जगह पर अटके हुए हैं."

ऐसे समय में जबकि वैज्ञानिक ये पता लगाने की कोशिश में जुटे हैं कि ब्लैक कार्बन वास्तव में मानसून की बारिश को कैसे प्रभावित करता है, भारत और चीन जैसे देश लगातार ऊर्जा का उपभोग बढ़ाते जा रहे हैं.

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने वर्ष 2010 की विश्व ऊर्जा रिपोर्ट में लिखा था - "वर्ष 2035 तक चीन की ऊर्जा ज़रूरत सारी दुनिया की 22 प्रतिशत तक पहुँच जाएगी जो अभी 17 प्रतिशत है.

"वर्ष 2035 तक विश्व की ऊर्जा ज़रूरत बढ़ाने में दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा भारत का रहेगा जो 18 प्रतिशत तक चला जाएगा."

दोनों ही देशों के लिए ऊर्जा का मुख्य स्रोत जीवाश्म ईंधन है – जो ब्लैक कार्बन का एक बड़ा जनक है.

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