डिस्लैक्सिया:आवाज़ की पहचान मिटाए ?

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Image caption डिस्लैक्सिक लोगों को पढ़ने लिखने के अलावा आवाज़ें पहचानने मे भी दिक्क़्त हो सकती है

डिस्लैक्सिया से पीड़ित लोगों को पढ़ने लिखने में तो परेशानी रहती ही है लेकिन अब यह पता चला है कि उन्हें आवाज़ पहचानने में भी दिक़्क़त आती है.

डिस्लैक्सिया के कारण लोगों को कभी अक्षर उल्टे दिखते हैं तो कभी ठीक से लिख पाना मुश्किल होता है.

लेकिन अब वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि डिस्लैक्सिक लोगों को आवाज़ों मे फ़र्क़ करना भी मुश्किल हो जाता है.

'साइंस' पत्रिका में वैज्ञानिकों ने यह कहा है कि डिस्लाक्सिया से पीड़ित कई लोगों को आवाज़ों के अंधेपन का सामना करना पड़ता है.

मानव मस्तिष्क ‘फोनीम’ ध्वनि की मदद से एक आवाज़ से दूसरी आवाज़ में फ़र्क़ कर पाता है.

मसलन ‘डॉग’ शब्द के अर्थ तक पहुंचने के लिए हमें तीन ध्वनियों को पहचानना होता है. ‘ड’ ‘औ’ और ‘ग’.

लेकिन जैसे जैसे हम पढ़ने लिखने में महारत हासिल कर लेते हैं हम ध्वनियों पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते.

आवाज़ पहचानने के लिए ध्वनियों की अहमियत इतनी है कि उसमें ज़रा सा भी फ़र्क़ आ जाए, तो सुनने वाले को पता चल जाता है कि आवाज़ अलग है.

डिस्लैक्सिया और फ़ोनीम

अमरीकी वैज्ञानिकों का यह कहना है कि डिस्लैक्सिक लोगों को पढ़ते वक्त फ़ोनीम के साथ काफ़ी संघर्ष करना पड़ता है.

और इसी कारण लोगों की आवाज़ों को समझने में उन्हें दिक़्क़त महसूस होती है.

इस अध्य्यन दल के प्रमुख वैज्ञानिक टाइलर पेराचियोन का कहना है, “आवाज़ के अंधेपन को अब तक ‘फ़ोनाग्नोज़िया’ के रूप में जाना जाता रहा है, जो एक आम समस्या है लेकिन जो लोग आवाज़ों में फ़र्क़ नहीं कर पाते उन्हें यह अहसास ही नहीं होता कि 'फ़ोनीम' को पहचानने की उनकी सामर्थ्य में कहीं कमी है “

30 डिस्लैक्सिक और सामान्य लोगों की टीम पर यह अध्ययन किया गया.

इन लोगों को 5 आवाजें अंग्रेज़ी में और 5 चीनी भाषा में सुनाई गईं.

नतीजा यह मिला कि सामान्य लोगों का प्रदर्शन डिस्लैक्सिक लोगों से 40 प्रतिशत ज़्यादा अच्छा रहा.

लेकिन चीनी भाषा के नतीजे ऐसे नहीं थे.

ब्रिटेन के ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय की डोरोथी बिशप का कहना है, “जब वह लोग चीनी भाषा सुन रहे थे तो उन्हें परेशानी इसलिए हुई क्यों कि चीनी फ़ोनीम उन्होंने कभी सुने नहीं थे.”

शोधकर्ताओं का यह मानना है कि डिस्लैक्सिक लोगों के मस्तिष्क में फ़ोनीम की इतनी बड़ी लायब्रेरी नहीं होती जितनी समान्य लोगों के दिमाग़ में होती है, तभी अंजान आवाज़ों के ‘फ़ोनीम’ समझने में उन्हें दिक्क़त होती है.

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