केमिस्टों की स्वास्थ्य मंत्रालय को धमकी

  • 1 अगस्त 2011

ड्रग्स और कॉस्मेटिक अधिनियम में संशोधन करने के केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के फ़ैसले के विरोध में देश भर के दवा विक्रेताओं ने सोमवार को दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया.

दरअसल केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक अधिनियम में संशोधन करने का फ़ैसला किया है जिसके तहत अब डॉक्टरों को मरीज़ों के लिए दो सलाह-पर्चियां बनानी होंगी.

दवा व्रिकेता सरकार की उस नीति का विरोध कर रहे हैं, जिसके मुताबिक़ डॉक्टरों की लिखी पर्ची के बिना वे उन 74 एंटीयबायोटिक दवाओं को नहीं बेच पाएंगें, जिन्हें सरकार ने ‘एच’ श्रेणी से निकाल कर ‘एच एक्स’ में डालने का फ़ैसला किया है.

साथ ही विक्रताओं को मरीज़ों की ओर से दिखाई गई पर्ची को रिकॉर्ड के लिए एक साल तक सुरक्षित रखना होगा.

दवा विक्रेता सरकार के उस सुझाव का भी विरोध कर रहे हैं, जिसके तहत 16 जीवन-रक्षक दवाइयां केवल अस्पतालों में ही उपलब्ध होंगीं और विक्रेताओं को ये दवाइयां बेचने की इजाज़त नहीं दी जाएगी.

सरकार के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सोमवार को पांच राज्यों के दवा विक्रेता हड़ताल पर चले गए हैं.

दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब और उड़ीसा में ये हड़ताल की गई है, जिसकी वजह से मरीज़ों को ख़ासी दिक्कत का सामना करना पड़ा.

एंटीबायोटिक का दुरुपयोग

Image caption विश्व स्वास्थय संगठन ने चेतावनी दी थी कि एंटीबायोटिक दवाओं के ज़्यादा इस्तेमाल जानलेवा हो सकता है.

सरकार का कहना है कि भारत में एंटीबायोटिक दवाओं के तेज़ी से हो रहे दुरुपयोग को रोकने के लिए ये संशोधन करना ज़रूरी है.

जबकि ऑल इंडिया केमिस्ट और डिस्ट्रीब्यूशन फ़ेडरेशन का कहना है कि ये संशोधन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है.

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा था कि भारत में एंटीबायोटिक दवाओं के दुरूपयोग से बहुत बड़ी तादाद में लोगों पर जान का ख़तरा पैदा हो गया है.

दवाइयों के सही इस्तेमाल को बढ़ावा देने वाली संस्था ‘दिल्ली सोसाइटी फ़ॉर रैशनल यूज़ ऑफ़ ड्रग्स’ की महानिदेशक ऊषा गुप्ता का कहना था कि अगर एंटीबायोटिक की नीम हक़ीमी पर रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ़ नहीं करेगी.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “ये कोई नया मुद्दा नहीं है. भारत ही ऐसा एक देश है जहां केमिस्ट काउंटर पर कुछ भी मिल जाता है, जबकि दुनिया के किसी और देश में ऐसा नहीं होता. अब वक़्त है कि ऐसा क़ानून आए जो विक्रेताओं और ग्राहकों की ग़लत धारणा और नीति पर रोक लगाए क्योंकि एंटीबायोटिक दवाओं के ज़्यादा इस्तेमाल से कुछ समय बाद शरीर पर उनका असर ख़त्म हो जाता है और ये जानलेवा भी हो सकता है.”

एंटीबायोटिक दवाओं के दुरुपयोग के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने उन डॉक्टरों को ज़िम्मेदार ठहराया था, जो उद्योग कंपनियों के दबाव में आकर मरीज़ों को एंटीबायोटिक दवाओं की सलाह दे डालते हैं.

विक्रेताओं का पक्ष

जंतर मंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे सैंकड़ों दवा विक्रेताओं ने ड्रग्स और कॉस्मेटिक अधिनियम में संशोधन के ख़िलाफ़ जम कर नारेबाज़ी की और कहा कि इससे उन्हें घाटा झेलना पड़ेगा और उनकी सिरदर्दी भी बढ़ेगी.

एक प्रदर्शनकारी केमिस्ट संदीप जैन ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए कहा, “एंटीबायोटिक दवाओं का उतना ज़्यादा दुरुपयोग हो नही रहा है, जितना सरकार दावा करती है. एंटीबायोटिक कोई रेवड़ी या मीठी गोली नहीं जिसे ख़रीद कर खा लिया जाए. सरकार का ये फ़ैसला केवल कुछ निजी गुटों से प्रेरित है, जो अपना फ़ायदा चाहते हैं. अगर दुरुपयोग रोकना है, तो डॉक्टरों को भी हिदायतें दी जाएं. सिर्फ़ हमें ही क्यों निशाना बनाया जा रहा है?”

तो वहीं ऑल इंडिया केमिस्ट और डिस्ट्रीब्यूशन फ़ेडरेशन के महासचिव एएन मोहन का कहना था, “हम मानते हैं कि एंटीबायोटिक दवाओं का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए, लेकिन सरकार को ज़ोर-आज़माइश कर ये सुनिश्चित करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. बल्कि सरकार को लोगों को इन दवाओं के दुरुपयोग बारे में अवगत कराना चाहिए, ताकि वे ख़ुद ही नीम हक़ीम न बनें और बिना डॉक्टर की सलाह के दवाइयां न ख़रीदें.”

उन्होंने घोषणा की है कि अगर सरकार अपने सुझाव वापस नहीं लेती, तो देश भर के दवा विक्रेता अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले जाएंगें.

लेकिन ऊषा गुप्ता ने दवा विक्रेताओं के इस विरोध की आलोचना करते हुए कहा कि विक्रेताओं को तो ख़ुश होना चाहिए क्योंकि ये एक अच्छी दिशा की ओर बढ़ाया गया क़दम है.

उनका कहना था, “एंटीबायोटिक दवाओं के ग़लत और ज़्यादा इस्तेमाल के लिए ये विक्रेता ही ज़िम्मेदार हैं क्योंकि वे मरीज़ों को बिना डॉक्टरी सलाह के कोई भी दवा पकड़ा देते हैं. सरकार का ये क़दम केवल दवा विक्रेताओं को सबक सिखाना ही नहीं है, बल्कि उन डॉक्टरों के लिए भी कड़े दिशा-निर्देश दिए जाएंगें, जो एंटीबायोटिक की ज़्यादा सलाह देते हैं.”

विश्व स्वस्थ्य संगठन के दिल्ली में हुए एक सर्वेक्षण के अनुसार दिल्ली में 47 प्रतिशत लोगों ने कहा कि अगर सामान्य ज़ुकाम के लिए उनका डॉक्टर उनको एंटीबायोटिक नहीं लिखता तो वो डॉक्टर बदल देंगे.

ऐसे लोगों की तादाद 53 प्रतिशत थी जिन्होंने माना कि बीमार होने पर वो खुद एंटीबायोटिक ले लेते हैं और अपने परिवार वालों को भी देते हैं.

संबंधित समाचार