कार्बन उत्सर्जन की बाध्यकारी सीमा रामबाण नहीं

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Image caption भारत के रवैये ने कई विकासशील देशों को नाराज़ भी किया है

दक्षिण अफ़्रीका के डरबन शहर में जारी संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में हिस्सा लेने गईं भारतीय पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने कहा है कि कुछ देश क़ानूनी रूप से बाध्यकारी जलवायु समझौते को ग्लोबल वॉर्मिंग से निबटने के रामबाण के तौर पर पेश करने की ग़लती कर रहे हैं.

वैसे भारत के कड़े तेवरों से कई विकासशील देश नाराज़ हैं कुछ अफ़्रीकी देशों के मुताबिक़ तो इस रवैये से भारत अलग-थलग भी पड़ सकता है.

जलवायु परिवर्तन से जुड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते क्योटो प्रोटोकॉल की अवधि 2012 में समाप्त हो रही है और अब एक नई संधि पर चर्चा हो रही है.

साथ ही इस चर्चा के विफल होने की आशंका काफ़ी बढ़ गई है क्योंकि नई संधि की ज़रूरत को लेकर काफ़ी मतभेद हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून ने भी कहा है कि अब इस बारे में कोई समझौता होना 'फ़िलहाल पहुँच से बाहर दिख रहा है'.

कई देशों का कहना है कि जब तक अमरीका, चीन और भारत जैसे बड़े देश सक्रिय होकर कार्बन उत्सर्जन की सीमा तय नहीं करते कोई समझौता प्रभावी साबित नहीं होगा.

इस बैठक के दौरान मंत्रियों और उनकी टीमों की द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बातचीत जारी हैं.

कई देश और प्रतिनिधि ये जानने को उत्सुक हैं कि चीन कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए क़ानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते को लेकर भविष्य में कितना तैयार होगा.

चीन की घोषणा

मगर पर्यावरण मामलों के बीबीसी संवाददाता रिचर्ड ब्लैक के अनुसार कई विकासशील देश भारतीय दल के कड़े तेवर से नाराज़ हैं. भारत का कहना रहा है कि विकसित देशों पर ही बाध्यकारी रोक लगनी चाहिए.

दक्षिण अफ़्रीकी देश और कुछ छोटे द्वीप भारत सरकार को ये बताना चाहते हैं कि उस पर अब बाक़ी विकासशील देशों के गुट से ख़ुद को अलग-थलग करने का ख़तरा मँडरा रहा है.

भारत की इन आलोचनाओं को देखते हुए नटराजन ने कहा कि भारत इस चर्चा में 'काफ़ी उम्मीद और रचनात्मक नज़रिए' से हिस्सा ले रहा है.

दरअसल चीन ने इससे पहले ये घोषणा कर दी थी कि वह क़ानूनी रूप से बाध्यकारी जलवायु संधि को लेकर 2020 के बाद राज़ी हो सकता है.

चीन के इस रवैये से ब्राज़ील, दक्षिण अफ़्रीका और भारत जैसे अन्य विकासशील देशों में चिंता पैदा हो गई थी क्योंकि अब तक ये चारों देश एक स्वर में अपनी बात रखते आए हैं.

मगर इसके बाद चीन ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि चारों देश एकजुट हैं और चीन के अलग होने की बात सिर्फ़ अफ़वाह भर है.

बाध्यकारी सीमाएँ

इसी एकजुटता को दिखाने के लिए चारों देशों की ओर से आयोजित संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में नटराजन ने कहा कि सिर्फ़ प्रदूषण पर रोक लगाने की बाध्यकारी सीमा भर से जलवायु परिवर्तन का हल नहीं निकाला जा सकता क्योंकि क़ानूनी रूप से बाध्यकारी संधि कोई रामबाण नहीं होगी.

दरअसल यूरोपीय संघ, जापान और कुछ अन्य देशों ने अब क़ानूनी रूप से बाध्यकारी संधि पर ज़ोर दिया है.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि विकासशील देशों को अभी विकसित देशों से और भरोसे की ज़रूरत है जिसके तहत विकसित देशों को कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए तेज़ी से क़दम उठाने होंगे और साथ ही वित्तीय तथा प्रौद्योगिकी मदद भी मुहैया करानी होगी.

क्योटो प्रोटोकॉल के तहत 37 विकसित देशों के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करने की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बाध्यकारी सीमाएँ तय की गई हैं और प्रोटोकॉल का ये पहला दौर अगले साल समाप्त हो रहा है.

इसके अलावा आम तौर पर अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की तीन साल पुरानी इस घोषणा को लेकर भी लोग निराश हैं जिसमें ओबामा ने कहा था कि अमरीका अब जलवायु परिवर्तन के मामले में दुनिया का नेतृत्त्व करेगा.

कई सूत्रों का कहना है कि पर्दे के पीछे उनके ही प्रतिनिधि किसी नए क़दम की राह में रोड़े अटका रहे हैं.

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