डरबन में भारत, चीन और अमरीका पर दबाव

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Image caption डरबन में विरोध प्रदर्शन करने वाले एक प्रभावी संधि की माँग कर रहे हैं

जलवायु परिवर्तन को लेकर दक्षिण अफ़्रीका के डरबन में हो रहे संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन में भारत, चीन और अमरीका पर अपने कड़े तेवर कुछ ढीले करने का दबाव बढ़ता जा रहा है.

यूरोपीय संघ और दुनिया के कुछ बेहद ग़रीब देशों ने मिलकर सम्मेलन में एक मज़बूत संधि बनाने की ज़ोरदार माँग की है. एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में यूरोपीय देशों के अलावा अफ़्रीकी और एशियाई देशों के मंत्रियों ने हिस्सा लिया.

उनका कहना था कि चीन और अमरीका जैसे देश किसी समझौते तक पहुँचने का दबाव अब महसूस कर रहे हैं.

जलवायु परिवर्तन के लिहाज़ से एक समय था जबकि बहस अमीर देशों और ग़रीब देशों के बीच हुआ करती थी. सब कुछ अमीर बनाम ग़रीब था मगर अब सूरत बदल गई है.

अब रेखा के एक ओर वो देश खड़े हैं जो ग्लोबल वॉर्मिंग को रोकने के लिए एक मज़बूत और प्रभावशाली संधि चाहते हैं और दूसरी ओर वे देश हैं जो ऐसी कोई संधि फ़िलहाल नहीं चाहते.

पहली बार ऐसा हुआ कि अब तक के पारंपरिक गुट तोड़कर देश एक साथ आए और उन्होंने सार्वजनिक तौर पर अपना रुख़ रखा.

विकसित और ग़रीब एक साथ

बांग्लादेश, गांबिया, मोज़ांबिक़ और नेपाल जैसे देश विकसित यूरोपीय देशों के साथ मिलकर खड़े थे. ये देश अमरीका, चीन, भारत और ब्राज़ील जैसे देशों से अपील कर रहे थे कि इस दिशा में प्रभावी क़दम उठाने में वे सहयोग करें.

डेनमार्क के पर्यावरण मंत्री मार्टिन लिडेगार्ड ने कहा, "हमारा एकीकृत लक्ष्य ये है कि आने वाले समय में तापमान में बढ़ोत्तरी अधिकतम 2 डिग्री सेल्सियस तक रखने का लक्ष्य हो और अगर संभव हो तो डेढ़ ही डिग्री. हम सब जानते हैं कि अगर हम मिलकर काम करें तो ये संभव है."

ये गठबंधन तीन बातों पर ज़ोर दे रहा है- पहला तो ये कि क्योटो प्रोटोकॉल जिसकी प्रभावी अवधि अगले साल समाप्त हो रही है वो सार्थक रूप से जारी रहे, वित्तीय मदद को लेकर जो भी संकल्प किए गए थे वे पूरे हों और एक ऐसी नई क़ानूनी रूप से बाध्यकारी सीमा तय करने वाली संधि जो प्रदूषण फैलाने वाले प्रमुख देशों पर रोक लगा सकें.

ब्रितानी पर्यावरण मंत्री क्रिस ह्यून ने कहा कि बहुमत देश एक मज़बूत समझौता चाहते हैं.

उन्होंने कहा, "मेरे ख़्याल से जिस तरह का दबाव बना है वो अमरीका महसूस कर रहा है और बाक़ी देश जो अभी तक राज़ी नहीं है वे भी महसूस करते रहेंगे. हम लोग कुछ प्रगति कर रहे हैं मगर अभी मंज़िल तक नहीं पहुँचे हैं."

दूसरा पक्ष

अमरीका और अन्य प्रमुख विकासशील देशों का कहना है कि इस बारे में कोई भी चर्चा अगर शुरू होनी भी है तो अभी न होकर 2015 में हो और जो भी बाध्यकारी सीमाएँ तय होनी हैं वे 2020 से लागू हों.

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Image caption भारत का कहना है कि कार्बन उत्सर्जन की बाध्यकारी सीमा कोई रामबाण नहीं है

मगर छोटे द्वीपीय देश और ग़रीब देशों का कहना है कि तब तक काफ़ी देर हो जाएगी क्योंकि तापमान में डेढ़ डिग्री से ज़्यादा की बढ़ोत्तरी हो जाएगी.

अमरीका और चीन दोनों ने कहा है कि वे किसी प्रभावी संधि के ख़िलाफ़ नहीं हैं बशर्ते कि उनकी शर्तें मानी जाएँ.

मगर अन्य प्रतिनिधियों का कहना है कि दुनिया में कार्बन के सबसे बड़े उत्सर्जक ये दोनों देश जो सार्वजनिक तौर पर कहते हैं और चर्चा के दौरान उनका जो बर्ताव होता है वो बिल्कुल उलट है.

संयुक्त राष्ट्र की ओर से आयोजित इस तरह की बैठकों में आम तौर पर अमीर और ग़रीब देशों का साझा मंच देखने को नहीं मिलता मगर अब जबकि डरबन में बैठक ख़त्म होने में सिर्फ़ एक ही दिन बचा है कुछ विश्लेषक अब भी उम्मीद कर रहे हैं कि शायद ये एक ऐसी संधि दे दे जिससे जलवायु परिवर्तन पर लगाम लगाने में कुछ मदद हो.

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