भारत की नानुकुर के बाद अंतत सहमति बनी

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जलवायु परिवर्तन के मुद्दे से जुड़े कई पहलुओं पर संयुक्त राष्ट्र वार्ता में अंतिम क्षणों में सहमति बन गई है जिसे ‘संतुलित’ कहा जा रहा है.

भारत और यूरोपीय संघ में नई संधि के रोडमैप की शब्दावली को लेकर गतिरोध था जिस कारण अंतिम समझौते में देर हुई.

समझौते के मुताबिक उत्सर्जन कटौती के अपने वादों को यूरोपीय संघ क़ानूनी रूप से बाध्य क्योटो संधि की परिधि में रखेगा. ये विकासशील देशों की मुख्य माँग थी.

जबकि नई क़ानूनी संधि पर बातचीत अगले साल शुरु होगी और वे वार्ता 2015 तक ख़त्म हो जाएगी ताकि 2020 से समझौता लागू हो जाए.

दरअसल भारत नहीं चाहता था कि शब्दावली में ये लिखा जाए कि संधि क़ानूनी रूप से बाध्य होगी. अंतत ये तय हुआ कि संधि की क़ानूनी शक्ति होनी चाहिए.

यूरोपीय संघ के देश और कम विकसित देशों को चिंता थी कि सभी देशों पर लागू नई और क़ानूनी रूप से बाध्यकारी संधि के बग़ैर वैश्विक औसत तापमान दो डिग्री सेल्सियस से बढ़ जाएगा- जो अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्य सीमा है.

ब्रिटेन का भी कहना था कि कमज़ोर मसौदा और 2020 की समयसीमा स्वीकार्य नहीं है.

मतभेद

क़ानूनी रूप से बाध्य संधि और तय समयसीमा का भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ़्रीका, चीन और अमरीका विरोध करते रहे हैं.

भारत की पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन ने कहा, “हम अपनी बात पर कायम हैं. ये सिर्फ़ भारत की बात नहीं है, ये पूरे विश्व की बात है.”

भारत उस व्यवस्था को बनाए रखना चाहता है जहाँ सिर्फ़ विकसित देशों को ही ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करना है.भारत की पर्यावरण मंत्री के मुताबिक अपने वादों के अनुसार पश्चिमी देशों ने उत्सर्जन कम नहीं किया है. चीन भी ऐसा ही मानता है.

लेकिन बांग्लादेश और कुछ अन्य विकसित देशों का कहना था कि क़ानूनी रूप से बाध्य नई संधि की ज़रूरत है.

हालांकि ये देश भी मानते हैं कि अगर तापमान में बढ़ोतरी को दो डिग्री से कम रखना है तो तेज़ी से बढ़ते चीन जैसे देशों को बहुत ज़्यादा उत्सर्जन कम करना पड़ेगा.

बातचीत ख़त्म होने की समयसीमा के 36 घंटे बाद तक वार्ता चलती रही. कई प्रतिनिधिओं का कहना था कि मेज़बान देश ( दक्षिण अफ़्रीका) के पास रणनीति नहीं है.

इसके बावजूद जब दक्षिण अफ़्रीका की विदेश मंत्री ने अंतिम समझौता का प्रारूप बताया तो मुख्य हॉल में तालियों से इसका स्वागत किया गया.

इस बात पर भी सहमति बनी है कि ग़रीब देशों को जलवायु परिवर्तन के परिणामों से निपटने और अच्छी तकनीक अपनाने में मदद के लिए विशेष फंड होगा जिसमें 100 अरब डॉलर होंगे. हालांकि ये तय नहीं हुआ है कि पैसा कैसे जुटाया जाएगा.

जंगलों की कटाई के कारण उत्सर्जन में कमी लाने पर भी काफ़ी हद तक सहमति बनी है.