नवजात शिशुओं में ऑटिज़म की पहचान

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Image caption ये बीमारी लड़कियों के मुकाबले लड़कों को ज़्यादा होती है.

अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के एक दल ने पाया है कि छह महीने के नवजात शिशुओं में ऑटिज़म की पहचान की जा सकती है.

‘करंट बॉयोलोजी’ नाम की पत्रिका में छपे इस शोध में, ऑटिज़म की पहचान के लिए नवजात शिशुओं के मस्तिष्क की तरंगों में हो रहे बदलाव का अध्ययन किया गया.

ज़्यादातर बच्चों में ऑटिज़म की पहचान पहले या दूसरे वर्ष की आयु में उनके बर्ताव में आने वाले बदलावों से की जाती रही है.

ऑटिज़म के पीड़ितों के साथ काम कर रहे संगठनों के मुताबिक मर्ज़ की जल्द पहचान होने से इलाज में मदद मिल सकती है.

ऑटिज़म को ‘ठीक’ तो नहीं किया जा सकता लेकिन शिक्षा और व्यवहार से जुड़े कार्यक्रमों से पीड़ित की मदद की जा सकती है.

मस्तिष्क की तरंगों का अध्ययन

एक शोधकर्ता, लंदन विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर मार्क जॉनसन ने बीबीसी को बताया, “अब तक की समझ ये कहती है कि रोग के सभी लक्षणों के सामने आने से पहले ही अगर हम कुछ कर सकें, मसलन प्रशिक्षण कार्यक्रम के ज़रिए, तो कम से कम कुछ मामलों में हम शायद लक्षण घटा पाएं.”

उनके दल ने छे से 10 महीने की आयु के 104 नवजात शिशुओं पर ऑटिज़म के लक्षणों के लिए नज़र रखी.

इनमें से आधे शिशुओं के बड़े भाई या बहन को पहले से ऑटिज़म था यानि उन्हें भी ये बीमारी होने की संभावना ज़्यादा थी. बाकि आधे समुह में ये संभावना कम थी.

इन सभी शिशुओं को लोगों के चेहरों की अलग-अलग तस्वीरें दिखाई गईं, जिनकी नज़रें कभी उनकी तरफ़ और कभी उनसे दूर देख रही थीं. इस दौरान सर से जुड़े सेंसर मस्तिष्क की तरंगों में हो रहे बदलावों पर नज़र रखे हुए थे.

ऑटिज़म से पीड़ित बच्चे आंख से आंख कम मिलाते हैं. शोध में पाया गया कि जिन शिशुओं को ऑटिज़म नहीं हुआ, वे वो थे, हर तस्वीर को देखते हुए जिनकी मस्तिष्क की तरंगों में ज़्यादा बदलाव आया.

वहीं जिन बच्चों को ऑटिज़म हुआ, वे वो थे, हर तस्वीर को देखते हुए जिनकी मस्तिष्क की तरंगों में बेहद कम बदलाव आया.

इलाज में मदद

प्रोफ़ेसर जॉनसन ने कहा कि ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि ये विश्लेशण 100 फ़ीसदी मामलों में सही नहीं पाया गया और कुछ शिशु ऐसे थे जिनकी मस्तिष्क की तरंगों में बदलाव दिखने के बावजूद उन्हें ऑटिज़म नहीं हुआ.

समाजसेवी संगठन, ‘नैश्नल ऑटिस्टिक सोसायिटी’ की डॉक्टर जॉर्जीना गोमेज़-डी-ला-क्वुएस्टा ने कहा कि तरंगों के बदलाव पर और शोध किया जाए तो रोग की जल्द पहचान और इलाज संभव हो सकेगा.

उन्होंने कहा, “ये शोध अपने शुरुआती दौर में है और इससे विस्तृत अध्ययन भी किए जा रहे हैं, तो नवजात शिशुओं में रोग की जल्द पहचान के लिए अभी कुछ समय इंतज़ार करना बेहतर होगा.”

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