दिल को हुए नुकसान की भरपाई होगी स्टेम सेल से

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Image caption स्टेम सेल लगाने के बाद स्कार टिशू की मात्रा में गिरावट आती गई और स्वस्थ हृदय मांसपेशियां बनने लगीं

अमरीका में डॉक्टरों का कहना है कि दिल का दौरा पड़ने से होने वाले नुकसान को स्टेम सेल के इस्तेमाल से ठीक किया जा सकता है.

दिलचस्प बात ये है कि रोगी के ही दिल से निकली स्टेम सेल का इस्तेमाल कर दिल के दौरे से हुए नुकसान को ठीक किया जा सकेगा.

दिल का दौरा इंसान को तब पड़ता है जब उसमें ऑक्सीजन की सप्लाई की पूर्ति नहीं हो पाती और दिल के रक्तसंचार में कमी आ जाती है.

दरअसल दिल का दौरा पड़ने के बाद जब डॉक्टर मरीज़ का इलाज करते हैं, तो मृत मांसपेशियों को निकाल कर ‘स्कार टिशू’ लगा दिया जाता है.

लेकिन स्कार टिशू दिल की मांसपेशियों की तरह नहीं धड़कते जिसके कारण शरीर में रक्तसंचार की क्षमता कम ही रहती है.

चिकित्सकीय पत्रिका लैंसेट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक स्टेम सेल के इस्तेमाल से अब स्कार टिशू का इस्तेमाल 50 प्रतिशत तक घटाया जा सकता है.

स्टेम सेल और स्कार टिशू में फ़र्क ये है कि स्कार टिशू में धड़कने की क्षमता नहीं होती, जबकि स्टेम सेल को किसी भी प्रकार की मांसपेशी में बदला जा सकता है.

यानि स्टेम सेल को धड़कने वाली मांसपेशी के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है.

‘अच्छी ख़बर’

ब्रितानी हार्ट फ़ाउन्डेशन का कहना है कि हालांकि ये प्रयोग अभी शुरुआती चरण में ही है, लेकिन ये दिल के मरीज़ो के लिए एक अच्छी ख़बर है.

सेडार्स-सिनाई हार्ट इंस्टीट्यूट में हुए इस प्रयोग में मरीज़ के हृदय में से निकाले गए स्टेम सेल का इस्तेमाल किया गया.

दिल का दौरा पड़ने के एक महीने के भीतर मरीज़ की गर्दन के ज़रिए हृदय में एक नस घुसाई गई और दिल के टिशू का एक सैंपल निकाला गया.

इसके बाद इस टिशू को प्रयोगशाला में ले जाया गया जहां स्टेम सेल को बढ़ने के लिए छोड़ दिया गया.

इसके बाद ढाई करोड़ स्टेम सेल मरीज़ के हृदय के आस-पास लगा दिए गए.

डॉक्टरों ने पाया कि स्टेम सेल लगाने के बाद स्कार टिशू की मात्रा में गिरावट आती गई और स्वस्थ हृदय मांसपेशियां बनने लगीं.

शोधकर्ता डॉक्टर एडुआर्डो मारबान ने कहा, “हमारे अध्ययन का मुख्य मकसद सुरक्षा निश्चित करना था. लेकिन साथ ही हम ये देखना चाह रहे थे कि स्टेम सेल स्कार टिशू की जगह लेने में कामयाब होते हैं या नहीं. कई प्रयोगों के बाद ऐसा पहली बार हुआ है कि ये प्रयोग सफलता के करीब लगा हो. अब हमने ये कर दिखाया है.”

हालांकि हृदय के रक्तसंचार करने की क्षमता में इस प्रयोग के बाद कुछ ख़ास बदलाव देखा नहीं गया.

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