सीरियल किलर 'एमडीआर-टीबी' की दस्तक

दुनियाभर में 24 मार्च को विश्व तपेदिक दिवस के रुप में मनाया जाता है और इस मौके पर एक बार फिर विश्व का ध्यान एक ऐसी बीमारी के प्रति आकर्षित हुआ है जिससे मरने वाले 95 फीसदी लोग विकासशील देशों से हैं.

ये खबर तो हमें है कि भारत तपेदिक यानि टीबी का गढ़ बन चुका है लेकिन टीबी के नए प्रकार और बढ़ते मामलों को लेकर जारी विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक टीबी की घातक किस्म एमडीआर-टीबी के मामलों में भारत दक्षिण-पूर्वी एशिया में पहले स्थान पर पहुंच गया है.

एमडीआर-टीबी यानि ‘मल्टिपल ड्रग रेसिसटेंट टीबी’, तपेदिख का एक ऐसा प्रकार है जिससे प्रभावित होने पर टीबी की ज्यादातर दवाएं मरीज़ पर बेअसर हो जाती हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में जहां टीबी के नए मरीज़ों में एमडीआर-टीबी दो से तीन फीसदी की दर से बढ़ रहा है वहीं टीबी के मौजूदा मरीज़ों में यह दर 12 से 17 फीसदी है.

युवा शिकार

जनसंख्या के अनुपात के चलते सालाना स्तर पर देखें तो टीबी के नए मामलों में चीन भारत से आगे है लेकिन भारत में एमडीआर-टीबी के मामले सबसे अधिक तेज़ी से बढ़ रहे हैं.

तपेदिक का वायरस आमतौर पर युवावस्था में हमला करता है. ये व्यक्ति के जीवन का सबसे क्रियाशील दौर होता है लेकिन फेफड़ों को निशाना बनाने वाली ये बीमारी इंसान को शारीरीक रुप से बेहद कमज़ोर और घातक बीमारियों के प्रति संवेदनशील बना देती है.

लेकिन भारत के पास इस घातक बीमारी से निपटने के साधन जितने कम हैं उतना अधिक बढ़ रहा है इसके नए से नए प्रकार का खतरा.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक एमडीआर-टीबी से एक कदम आगे भारत में एक्सटेंसिवली ड्रग रेसिसटेंट टीबी यानि विस्तृत दवा प्रतिरोधक टीबी के मामले सामने आ रहे हैं.

‘टुबरक्लोसिस कंट्रोल इन द साउथ ईस्ट एशिया रीजन’ नाम की इस रिपोर्ट के मुताबिक साल 2010 में दक्षिण पूर्वी एशिया में टीबी के लगभग 50 लाख संभावित मामले सामने आए.

‘डॉट्स’ अभियान के चलते टीबी से मरने वालों की संख्या भले की कम हुई हो, लेकिन अब भी हर साल इस क्षेत्र में लगभग पांच लाख लोग मौत का शिकार हो रहे हैं.

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Image caption फेफड़ों को निशाना बनाने वाली ये बीमारी इंसान को शारीरीक रुप से बेहद कमज़ोर और बीमारियों के प्रति संवेदनशील बना देती है.

दुतरफा खतरा

लेकिन भारत के लिए खतरा दुतरफा है. जहां एक ओर भारत में टीबी के इन नए प्रकारों की जांच में सक्षम प्रयोगशालाओं की कमी है वहीं गलत इलाज और जागरुकता की कमी मरीज़ों में दवाओं के प्रति प्रतिरोध बढ़ने का एक बड़ा कारण है.

भारत में विश्व स्वास्थय संगठन के प्रतिनिधि डॉक्टर नाता मेनाब्दे के मुताबिक, ''भारत में खासतौर पर निजी अस्पतालों में एंटी-टीबी ड्रग्स धड़ल्ले से इस्तेमाल की जा रही हैं. ऐसे में दवाओं की उपलब्धता और उनके सुझाए जाने पर नियंत्रण ज़रूरी है क्योंकि गलत और तेज़ दवाओं का इस्तेमाल टीबी के वायरस को प्रतिरोधी बना रहा है.''

ऐसे में विश्व के अन्य देशों के मुताबले 1.2 अरब की जनसंख्या वाले भारत में लगातार बढ़ रहे टीबी के मामलों के चलते तपेदिक का संकट सबसे गहरा है. ये हाल तब है जब तपेदिक को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन के 2011 की एक रिपोर्ट के अभी तक भारत सरकार ने मान्यता नहीं दी है.

वजह भी साफ है, सरकार नए मामलों से निपटने के बजाए आंकड़ों पर नियंत्रण को ज्यादा मुस्तैद है लेकिन इसका भुगतान कर रहे हैं वो लोग जो तकनीकी शब्दावली और आंकड़ों के बीच इस संक्रमणशील बीमारी से छुटकारा और बचाव चाहते हैं.

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