भारत भी बना रहा है नेविगेशनल सिस्टम

सैटेलाइट
Image caption भारत भी खुद का नेविगेशनल सिस्टम तंत्र विकसित कर रहा है.

आम तौर पर चीन किसी भी तरह का कोई सैटेलाइट या मिसाइल प्रक्षेपण करता है तो अंतरराष्ट्रीय जगत में हलचल होती है. तरह-तरह के कयास भी लगाए जाते है, चीन की मंशा पर भी सवाल उठाए जाते है.

मंगलवार को जब चीन ने बीदो सिरीज़ के दो नेविगेशनल सैटेलाइट लॉंच किए कयास तब भी लगाए गए कि चीन के पास ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम आ गया तो वो उसका क्या प्रयोग करेगा.

हालांकि वरिष्ठ विज्ञान पत्रकार पल्लव बागला का कहना है कि चीन का नेविगेशनल सैटेलाइट प्रक्षेपत करना भारत के लिए कोई खतरे की बात नहीं है.

बीबीसी से विशेष बातचीत में पल्लव बागला ने कहा, “ग्लोबल पोज़िशनिंग सिस्टम जैसी प्रणाली अमरीका और रूस के पास पहले से है और चीन ऐसी प्रणाली तैयार करने वाला तीसरा देश बन सकता है. इसमें भारत के लिए कोई खतरे की बात नहीं है, इस तंत्र पर सभी देश काम कर रहें है.”

पल्लव बागला का कहना है कि भारत भी खुद का नेविगेशनल सिस्टम तंत्र विकसित कर रहा है.

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

भारत का 'गगन'

उन्होंने कहा, ''हर देश चाहता है कि उनके पास ऐसा तंत्र हो. रूस के पास अपना नेविगेशनल सिस्टम है, अमरीका के पास अपना है और चीन खुद का सिस्टम बना रहा है. भारत भी खुद के नेविगेशनल सिस्टम, ‘गगन’ पर काम कर रहा है. पर काम कर रहा है. आने वाले समय में इसरो ने 1600 करोड़ का बजट इस तंत्र को बनाने के लिए तय किया है.''

दरअसल नेविगेशनल तकनीक के जरिए सैटेलाइट से किसी व्यक्ति या वस्तु का स्थान पता किया जा सकता है. इसका सैन्य प्रयोग भी किया जा सकता है.

पल्लव बागला का कहना है आम तौर पर प्रयोग किए जाने वाले ग्लोबल पोजिंशनिंग सिस्टम या जीपीएस तंत्र अमरीका की प्रणाली है और इसमें कुछ बंदिशे होती हैं जिस वजह से देश खुद का ऐसा तंत्र बनाना चाहते है.

उन्होंने कहा, “सबसे बड़ी बात ये है कि जीपीएस में एक तरह का ‘एरर’ होता है कि आप उसका प्रयोग सैन्य कार्यों के लिए नहीं कर सकते है. इसलिए ज्यादातर देश चाहते है कि वो खुद का तंत्र विकसित करे जिससे उसका सैन्य और व्यवसायिक प्रयोग हो सके.”

पल्लव बागला का मानना है कि आने वाले चार-पांच वर्षों में भारत स्वदेशी ‘गगन’ तकनीक पाने की ओर अहम कदम बढ़ा चुका होगा.

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