इमारतों पर भूकंप के असर को जानने में जुटे वैज्ञानिक

लंदन
Image caption वैज्ञानिकों का कहना है कि उनके प्रयोग से इमारतों के बेहतर निर्माण में मदद मिलेगी.

ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने सॉफ्ट सॉइल यानी भुरभुरी मिट्टी वाली जमीन पर बनी इमारतों पर भूकंप के असर को जानने के लिए एक खास प्रयोग किया है.

यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नॉलोजी, सिडनी की प्रयोगशाला में भूकंप के जबर्दस्त झटके पैदा करके एक 15 मंजिला इमारत के मॉडल पर उसके प्रभावों का अध्ययन किया गया.

पहली बार किए गए अपनी तरह के इस शोध को खासा महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे दुनिया भर में भूकंप के खतरे वाले इलाकों में इमारतों को झटकों का बेहतर तरीके से मुकाबला करने के काबिल बनाया जा सकता है.

प्रयोग के दौरान कुछ सेकंडों के लिए जापान के कोबे शहर के पास आए जबरदस्त भूकंप जैसे झटकों के प्रभाव को पैदा किया गया और ध्यान से देखा गया कि मॉडल इमारत की हर एक मंजिल पर उसका कैसा असर हो रहा है.

जापान में 17 जनवरी 1995 को कोबे शहर के पास आए भूकंप में लगभग साढ़े छह हजार लोग मारे गए थे.

बेहतर होगा निर्माण

ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं का कहना है कि उनके प्रयोग में इस बात पर भी नजर रखी गई कि जब भूकंप आता है तो भुरभुरी मिट्टी वाली जमीन पर किसी इमारत में कार्यालयों और घरों पर उसके प्रभाव किस तरह एक दूसरे से अलग होते हैं.

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Image caption एशिया प्रशांत क्षेत्र में भूकंप के लिहाज से सबसे खतरनाक माना जाता है.

इस प्रयोग से जुड़े प्रोफेसर बिजन समाली कहते हैं, “भुरभुरी मिट्टी को आप जेली की परत की तरह समझ सकते हैं. मान लीजिए जेली की एक पट्टी मेज पर रखी है. अगर आप मेज को धक्का देते हैं तो जेली का ऊपरी हिस्सा उसके तल से कहीं ज्यादा हिलता है. अगर जेली के ऊपर इमारत खड़ी हो तो उसमें कहीं ज्यादा उथल-पुथल होगी, कहीं ज्यादा झटके महसूस होंगे. इसलिए अगर इमारतों की डिजाइनिंग में इस बात का ख्याल नहीं रखा गया तो वे नहीं बच सकतीं. तो निश्चित तौर पर ये सुरक्षा का मुद्दा है.”

वैज्ञानिकों का कहना है कि उनके इस प्रयोग से भूकंप के खतरे वाले इलाकों में भुरभुरी मिट्टी वाली और दलदली जमीन पर बने घरों और बहुमंजिला इमारतों के लचीलेपन को बेहतर बनाया जा सकता है.

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