क्या चलने से रोशन होगा ओलंपिक?

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Image caption ये एक ऐसी टायल है जिस पर चलने से बिजली पैदा हो रही है.

कल्पना कीजिए सड़क पर चलने के लिए आप जितनी ऊर्जा का इस्तेमाल करते हैं उसे बिजली में बदल दिया जाए तो....

सुनने में ये किसी काल्पनिक वैज्ञानिक कथा जैसा लगता है, लेकिन ये केंट, केंटरबेरी में स्थित एक स्कूल के छात्रों के लिए वास्तविकता है.

ये छात्र एक ऐसी प्रणाली पर काम कर रहे हैं जिसमें वो फुटपाथ की चलायमान टायल पर चलते हैं और इससे पैदा होने वाली गतिज ऊर्जा का इस्तेमाल कर रहे हैं.

इस गतिज ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल कर उन्होंने एक बल्व को जलाया.

मुख्य अध्यापक केन मोफाट को उम्मीद है कि इस तरह से पैदा होने वाली ऊर्जा का भविष्य में और भी इस्तेमाल किया जा सकेगा.

साइमन लैंग्टन ग्रामर स्कूल में इस तकनीक के सिर्फ चार टाइल लगाए हैं.

टाइल से बिजली

केन मोफाट कहते हैं "हमारे स्कूल में 1100 बच्चे हैं और आप ये कल्पना कर सकते हैं कि ये छात्र इस जगह चक्कर लगाते हैं जिससे ऊर्जा पैदा हो रही है. अगर इस तरह की कोई चीज लंदन के भूमिगत स्टेशन पर लगा दी जाए तो ये काफी रोमांचक होगा. उस स्तर पर इसका इस्तेमाल और भी व्यापक होगा."

इस टाइल को बनाने वाली कंपनी के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी लॉरेंस कैम्पबेल का कहना है कि जब आप इस टाइल के बीच में खड़े होते हैं तो ऊर्जा पैदा होती है.

हालांकि ये ऊर्जा मिलीवॉट में है और हमें इसका हजार गुना चाहिए.

ब्रिटेन की राष्ट्रीय भौतिकी प्रयोगशाला के प्रोफेसर मार्किस केन का कहना है, ''हालांकि हम अपनी तकनीक से गतिज ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल रहे हैं लेकिन वो काफी कम है. आप जितने भारी होंगे, उतनी ही ज्यादा ऊर्जा पैदा होगी.''

व्यापक स्तर पर इस्तेमाल

लॉरेंस कैम्पबेल कहते हैं कि उनकी योजना सिर्फ स्कूलों में नहीं बल्कि इसके व्यापक स्तर पर इस्तेमाल की है.

वो कहते हैं, "मुख्य रुप से स्टेटफर्ड शहर के वेस्टफील्ड जगह पर हम काम कर रहे हैं. ये यूरोप का सबसे बड़ा शॉपिग सेंटर में है. ये ओलंपिक पार्क के पास है जहाँ पर आने वाले दिनों में एक करोड़ चालीस लाख लोग गुजरेंगे. इससे पैदा होने वाली ऊर्जा से शॉपिग सेंटर के बाहर के एक बड़े हिस्से को रोशन कर सकते हैं."

ये टाइल विद्युत चुम्बकीय प्रणाली पर आधारित हैं. इस टाइल में एक चुम्बक लगा है जिस पर चलने से ऊर्जा पैदा होती है और बाद में ये ऊर्जा एक बैटरी में जमा हो जाती है.

ये एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे आने वाले वर्षों में ऊर्जा संकट के समाधान में मदद मिल सकती है.

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