रियो बैठक से दक्षिण एशिया की उम्मीदें

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Image caption तीन दिन के शिखर सम्मेलन में 130 से अधिक देशों के प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं

विशेषज्ञों के अनुसार दक्षिण एशियाई देशों के लिए अभी चल रहा संयुक्त राष्ट्र विकास और पर्यावरण रक्षा सम्मेलन में ऊर्जा हासिल करने की दिशा में फायदेमंद हो सकता है.

उनके अनुसार सम्मेलन में किसी तरह की सहमति से इस क्षेत्र में सीमापार ऊर्जा की आपूर्ति में वैश्विक निवेश को बढ़ावा मिल सकता है.

ब्राज़ील के रियो द जेनेरो शहर में संयुक्त राष्ट्र के 130 से अधिक देशों के शासनाध्यक्ष और प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं.

सम्मेलन के एजेंडे में सबसे अधिक अहमियत, इसके आयोजक संयुक्त राष्ट्र के शब्दों में, ग्रीन इकोनॉमी को दी जा रही है.

और विशेषज्ञों के अनुसार इसी वजह से दक्षिण एशिया में ऊर्जा के विकास को लेकर आशा बँधती है.

उनका कहना है कि यदि इस बैठक में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम करने के लिए स्वच्छ ऊर्जा के बारे में कोई सहमति होती है तो इससे दक्षिण एशिया को लाभ होगा.

नेपाल और भूटान जैसे देश और भारत के कुछ हिस्सों में हाइड्रोपावर या जलशक्ति के विकास की प्रचुर संभावनाएँ हैं. क्षेत्र के दूसरे देशों में सौर ऊर्जा का अच्छा उत्पादन हो सकता है.

वैज्ञानिकों इस तरह की ऊर्जा को स्वच्छ ऊर्जा कहते हैं जो उनके अनुसार पर्यावरण को प्रदूषित किए बिना विकास को संभव बनाती है.

आशा

लंदन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीच्यूट ऑफ़ एनवायरमेंट एंड डेवलपमेंट में विशेषज्ञ सलीमुल हक़ का माना है कि स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में दक्षिण एशिया वैश्विक निवेश को आकर्षित कर सकता है.

वे कहते हैं,”इस क्षेत्र में एक वैश्विक सहमति से सहयोग बढ़ेगा और वैश्विक निवेशों को बढ़ावा मिलेगा जिसकी ज़रूरत भी होगी. इस क्षेत्र में शायद पर्याप्त राशि ना हो मगर यहाँ ऐसी नीतियाँ होनी चाहिए जिनसे कि निवेशों को आकर्षित किया जा सके“.

मगर विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक निवेशों से पहले, क्षेत्र के राजनीतिक अस्थिरता वाले देशों को अपनी नीतियाँ बनानी होंगी.

सतत विकास के बारे में बांग्लादेश के विशेषज्ञ अतिक़ रहमान कहते हैं,”हमारी संकीर्ण नीतियाँ बड़े मुद्दों की दिशा तय करती हैं. ये उन बड़ी त्रासदियों में से एक है जिनसे हम घिरे हैं. यहाँ की सरकारों में भरोसे की कमी है. कोई यदि कुछ कहता है, तो ये पूछते हैं कि वो क्यों कह रहा है.“

इस क्षेत्र की बड़ी आर्थिक शक्ति भारत पर कोयले और तेल जैसे बुरे ईंधनों से निकलनेवाले कार्बन उत्सर्जन को घटाने के लिए विकसित देशों की ओर से भारी दबाव है.

संयुक्त राष्ट्र की एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि उसने अपने सालाना ऊर्जा उत्पादन की दक्षता को बेहतर नहीं किया तो पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने में भारत की भागीदारी बढ़ती जाएगी.

अतिक रहमान कहते हैं कि भारत को को वैसे भी दूसरी बड़ी आर्थिक महाशक्ति चीन से पीछे नहीं रहने के लिए ऊर्जा की ज़रूरत है.

वो कहते हैं,”बिना बिजली के, विकास नहीं हो सकता. मतभेद हैं, मगर बिजली चाहिए, इसपर कोई संदेह नहीं. आम लोग, ग़रीब लोग, सबको बिजली चाहिए“.

ज़िम्मेदारी

दक्षिण एशिया के देशों में बिजली की भारी कमी है और समझा जाता है कि वहाँ के 60 प्रतिशत से अधिक लोगों के पास बिजली नहीं है.

सलीमुल हक़ जैसे विशेषज्ञ कहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन जैसे प्रयासों से रातों-रात लोगों की दशा नहीं बदल जाएगी मगर उनके नेता दीर्घावधि में बहुत कुछ कर सकते हैं.

वे कहते हैं,"ज़िम्मेदारी हमारे ही क्षेत्र के नेताओं पर है. हम इसके लिए बान की मून को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते. हमें सहयोग नहीं करने के लिए अपने ही नेताओं पर आरोप लगाना चाहिए".

रियो के तीन दिवसीय सम्मेलन में जुटे दक्षिण एशियाई नेता सम्मेलन से क्या संदेश लेकर अपने देश लौटते हैं, अभी ये देखना बाकी है.

और यदि वो ऐसा करते हैं, तो भी इस कठिन वित्तीय समय में इस क्षेत्र में कितना वित्तीय निवेश आकर्षित हो पाता है, ये उससे भी बड़ा प्रश्न है.

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