टेस्टट्यूब शिशुओं की संख्या हुई 50 लाख

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Image caption 1978 में दुनिया के पहले परखनली शिशु लुई ब्राउन का जन्म हुआ

दुनिया भर में 50 लाख लोगों की आबादी ऐसी है जिनका जन्म आईवीएफ तकनीक यानि परखनली तकनीक के जरिए हुआ है.

विशेषज्ञों का कहना है कि ये शिशु पैदा न कर पाने वाले लोगों के इलाज की दिशा में मील का पत्थर है.

वर्ष 1978 के जुलाई महीने में दुनिया के पहले परखनली शिशु का जन्म ब्रिटेन में हुआ था. इस बच्चे का नाम लुई ब्राउन है. पिछले महीने ही इस शिशु को जन्म देने वाली माँ लेस्ली ब्राउन का निधन हुआ था.

यूरोपियन सोसाइटी ऑफ ह्यूमन रीप्रोडक्शन एंड एंब्रियोलाजी के मुताबिक 2008 तक के आधिकारिक आंकड़े और तीन साल के अनुमानित आंकड़ो को जोड़कर निकाले गए आंकड़ो के आधार पर संसार में परखनली शिशुओं की आबादी पचास लाख तक जा पहुंची है.

नि:संतान दम्पतियों के लिए वरदान

इंटरनेशनल कमेटी फॉर मानिटरंग रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (इकमार्ट) के अध्यक्ष डॉक्टरक्टर डेविड एड्मसन का कहना है कि ये संतान उत्पन्न कर पाने में अक्षम नि:संतान दम्पतियों के लिए वरदान साबित हुई है. लाखों परिवारों ने इससे संतान सुख हासिल किया है.

डॉक्टर डेविड एड्मसन कहते हैं कि समय के साथ-साथ ये तकनीक बेहतर हुई है और गर्भाधान की दर भी काफी बढ़ी है.

इकमार्ट का कहना है कि विश्वभर में हर वर्ष लगभग तीन लाख 50 हजार बच्चों का जन्म इस प्रक्रिया के जरिए होता है. यह आंकड़ा हर वर्ष जन्म लेने वाले 13 करोड़ बच्चों का 0.3 फीसदी बैठता है.

लंदन के हैमरस्मिथ हॉस्पिटल के आईवीएफ के डॉक्टरयरेक्टर स्टुअर्ट लेवरे का कहना है कि ये तकनीक अब मुख्यधारा का हिस्सा बन चुकी है और दम्पतियों के लिए अब ये शर्म की बात नही रही.

बीमा न समझें

हालांकि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि दम्पति इस आईवीएफ तकनीक को बीमे की तरह न लें कि अगर वो देर से माता- पिता बनना चाहते हैं तो दिक्कत होने पर यह तकनीक तो उपाय के रुप में है ही.

आईवीएफ और आईसीएसआई कहलाने वाली दो तकनीकों के इस्तेमाल से परखनली शिशुओं का सृजन किया जाता है.

आईवीएफ तकनीक में अंडाणु और शुक्राणु दोनों को एक पेट्री डिश में निषेचित किया जाता है जबकि आईसीएसआई तकनीक में शुक्राणु का एक इंजेक्शन के जरिए अंडाणु में सीधे निषेचन कर दिया जाता है.

रोमन कैथोलिक ईसाइयों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था वेटिकन इसके अप्राकृतिक होने की वजह से इसकी विरोधी रही है.

इसके अलावा कई लोग इस तकनीक का विरोध इसलिए भी करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि माता पिता इसके जरिए अपने बच्चों में मनमाफिक गुण डलवा सकते हैं.

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