क्या है ईश्वर कण?

  • 4 जुलाई 2012
ईश्वर कण
Image caption दशकों से वैज्ञानिक ईश्वर कण की खोज में जुटे हैं.

वैज्ञानिक लंबे समय से स्विट्जरलैंड की सर्न प्रयोगशाला में हिग्स बोसोन यानी ईश्वर कण की खोज में जुटे हैं. उन्हें उम्मीद है कि जल्द इन सवालों के जवाब मिल जाएंगे कि इस ईश्वर कण का अस्तित्व है या नहीं.

लेकिन ये असल में है क्या? और इस बुनियादी कण को ढूंढने के लिए क्यों वैज्ञानिक 40 साल से भी ज्यादा समय से जुटे हुए हैं.

हिग्स बोसोन क्या है?

अभी तक हिग्स बोसोन सिर्फ भौतिकशास्त्रियों के मस्तिष्क में ही बसता है. इस बात को लेकर लगभग एक पूरा सिद्धांत तैयार है कि ब्रह्मांड कैसे काम करता है- इसमें वे सभी सूक्ष्म अंश शामिल हैं जिनसे अणु, कण और वो सब बनता है जिसे हम देख पाते हैं.

इसे स्टैंडर्ड यानी मानक मॉडल कहा जाता है. हालांकि इस सिद्धांत में सबसे बड़ी कमी ये है कि ये इस बात को नहीं साबित कर पाता है कि इन कणों को कैसे द्रव्यमान मिलता है. यानी इन कणों में क्या होता है.

इस खाई को भरने के लिए 1964 में छह भौतिकशास्त्रियों ने हिग्स तंत्र का प्रस्ताव रखा जिनमें एडिनबर्ग के पीटर हिग्स भी शामिल थे.

ये द्रव्यमान इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

द्रव्यमान वो माप है जो बताती है कि ब्रह्मांड में मौजूद चीजों में कितने सारे कण या अन्य सूक्ष्मांश मौजूद हैं.

अगर द्रव्यमान न हो तो अणु का निर्माण करने वाले सभी कण प्रकाश की गति पर इधर-उधर भन्नाते रहेंगे और जिस व्यवस्थित रूप में आज ब्रह्मांड हमारे सामने मौजूद है, ऐसा नहीं होता.

हिग्स तंत्र का मानना है कि ब्रह्मांड में एक ऐसा क्षेत्र है जिसके माध्यम से कण द्रव्यमान ग्रहण करते हैं. ये बर्फ से ढके किसी मैदान की तरह है जिससे गुजरने पर आपकी चाल धीमी हो जाती है. जब जूते बर्फ के कणों के संपर्क में आते हैं आपकी चाल कम हो जाती है.

वैज्ञानिक हिग्स बोसोन की खोज कैसे करते हैं?

विडंबना ये है कि मानक मॉडल खुद हिग्स के निश्चित द्रव्यमान के बारे में कोई जानकारी नहीं देता.

एलएचसी जैसे पार्टिकल एक्सेलरेटर के जरिए द्रव्यमानों की एक श्रंखला में व्यवस्थित तरीके से कण को खोजा जाता है.

एलएचसी में दो विपरीत दिशाओं से प्रोटॉनों को लगभग प्रकाश की गति पर एक दूसरे से टकराया जाता है. इससे बहुत सारे कणों की बौछार उत्पन्न होती है और अत्यधिक ऊर्जा पैदा होती है.

हिग्स को संभवतः प्रत्यक्ष रूप से देखा भी नहीं जा सकेगा लेकिन वैज्ञानिकों को आशा है कि कणों के घालमेल में कुछ पल के लिए ही सहीं, हिग्स का अस्तित्व होगा. अगर इसका व्यवहार शोधकर्ताओं की उम्मीदों के मुताबिक रहा तो उन्हें और आगे कणों में विघटित होना चाहिए. इससे मिलने वाले सुराग इसके अस्तित्व को सिद्ध कर सकते हैं.

एलएचसी इस कण की खोज में लगी पहली मशीन नहीं है. इससे पहले सर्न में 1989 से 2000 तक इस्तेमाल की गई एलईपी मशीन ने एक निश्चित द्रव्यमान तक हिग्स की संभावना से इनकार किया.

वहीं अमरीका की टेवाट्रोन मशीन ने अपनी क्षमता से ऊपर इस कण को खोजा. इस मशीन को पिछले साल बंद कर दिया गया.

इन सब कोशिशों से मिली जानकारियों का अब भी विश्लेषण हो रहा है और ये विश्लेषण इस कण के होने या न होने के बारे में अहम योगदान दे सकता है. एलएचसी अब तक बनाया गया सबसे ताकतवर पार्टिकल एक्सलरेटर है और इसके जरिए हिग्स की खोज का सबसे महत्वाकांक्षी प्रयोग जारी है.

कब पता चलेगा कि हिग्स है या नहीं?

कण संबंधी भौतिकशास्त्र में इस वक्त ये सबसे मुश्किल सवाल है. हिग्स द्रव्यमानों की एक निश्चित श्रंखला में दिखना चाहिए.

अगर आप किसी सिक्के को दस बार उछालें और आठ बार चित्त आए तो आप सोचेगे कि सिक्के में कुछ “करामात” है.

लेकिन अगर भौतिकशास्त्र में सिक्के को उछालने का कोई निर्णय लिया जा जाना है तो उसे सैकड़ों बार उछालना होगा.किसी भी औपचारिक “खोज” के लिए इतनी निश्चितता जरूरी है.

एलएचसी के परिणामों के बारे में अभी तक यही बात स्पष्ट है कि दो टीम हिग्स को तलाशने पर काम कर रही हैं और उनके पास अभी पर्याप्त जानकारी नहीं है जिसके आधार पर कहा जा सके कि हिग्स तलाश लिए गया है या उसे लेकर कोई संदेह नहीं रह गया है. इसके लिए और अधिक प्रयोगों की जरूरत होगी.

अगर ये नहीं मिला तो क्या होगा?

ज्यादातर पेशेवर भौतिकशास्त्री कहते हैं कि अगर हिग्स ठीक उसी स्वरूप में मिल जाता है जैसा अनुमान सैद्धांतिक रूप से व्यक्त किया गया है, तो वास्तव में यह एक निराशा होगी.

एलएचसी जैसी बड़ी परियोजननाओं को इसलिए शुरू किया जाता है ताकि ज्ञान का विस्तार हो और ठीक उसी जगह हिग्स के अस्तित्व की पुष्टि हो जहां हमने उम्मीद की थी. ऐसा होता है तो ये भौतिकशास्त्र के बारे में हमारी समझ के नजरिए से एक जीत होगी. लेकिन इसका न मिलना, मिल जाने से कहीं ज्यादा उत्साहजनक है.

अगर भविष्य में होने वाले अध्ययनों में इस बात की निश्चित तौर पर पुष्टि हो जाती है कि हिग्स का अस्तित्व नहीं है तो फिर मानक मॉडल के सारे नहीं, तो कम से कम एक बड़े हिस्से को फिर से लिखना होगा.

इससे फिर नई खोज शुरू होगी जो ब्रह्मांड के बारे में हमारी समझ को लगभग क्रांतिकारी स्वरूप दे सकती है, ठीक उसी तरह जैसे एक सदी पहले भौतिकशास्त्र में किसी लापता सी चीज ने क्वांटम मैकेनिक्स के क्रांतिकारी विचार को स्वरूप किया था.

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