हॉकिंग के दिमाग को भाषा में बदलने की कोशिश

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Image caption स्टीफ़न हॉकिंग को मोटर न्यूरॉन (एमएनडी) नाम की बीमारी है

एक अमरीकी वैज्ञानिक बहुत जल्द ही यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैम्ब्रिज में गणित और सैद्धांतिक भौतिकी के प्रोफ़ेसर रहे स्टीफ़न हॉकिंग के दिमाग को भाषा में बदलने की कोशिश का नुस्खा बताने वाले हैं.

प्रोफ़ेसर फिलिप लोव का कहना है कि इस तकनीक के ज़रिये स्टीफ़न हॉकिंग के मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाली तरंगों को भाषा में बदला जा सकेगा.

उनका कहना है कि स्टीफ़न हॉकिंग इसके ज़रिए अपनी भाषा को अपने मस्तिष्क में 'लिख' सकेंगे और यह उस तरीके से भिन्न होगा जिससे वह अभी तक अपनी बात दूसरे तक पहुंचा पाते हैं.

पिछले कुछ वर्षों से स्टीफ़न हॉकिंग अपनी व्हीलचेयर पर बैठे हुए एक विशेष कंप्यूटर प्रोग्राम के जरिए अपनी बात कह पाते हैं जिसे पढने और समझने के लिए उस कंप्यूटर स्क्रीन का सहारा लिया जाता है.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैम्ब्रिज में गणित और सैद्धांतिक भौतिकी के प्रोफ़ेसर रहे स्टीफ़न हॉकिंग की गिनती आइंस्टाइन के बाद सबसे बढ़िया भौतिकशास्त्रियों में होती रही है.

जीवन

जब वे 20-22 साल के थे तब पता चला था कि स्टीफ़न हॉकिंग को मोटर न्यूरॉन (एमएनडी) नाम की बीमारी है और वे कुछ महीने ही ज़िंदा रह पाएँगे. इसमें शरीर की नसों पर लगातार हमला होता है.

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Image caption स्टीफ़न हॉकिंग अभी तक व्हीलचेयर पर बैठ कर एक विशेष कम्प्यूटर प्रोग्राम के जरिये अपनी बात कह पाते हैं.

इसी बीमारी का एक रूप होता है एएलएस, जिससे प्रोफ़ेसर हॉकिंग भी ग्रसित हैं. इस बीमारी का पता चलने के बाद केवल पाँच फ़ीसदी ही लोग ऐसे होते हैं जो एक दशक से ज़्यादा ज़िंदा रह पाते है.

बीमारी के शुरुआती दिनों में तो वे ख़ुद खाना खा सकते थे, बिस्तर से भी स्वयं उठ-बैठ सकते थे.

लेकिन समय के साथ उनकी हालत बिगड़ने लगी और ये स्पष्ट हो गया कि उन्हें व्हीलचेयर में ही जीवन बिताना पड़ेगा.

उनकी विंडपाइप में गर्दन के ज़रिए ट्यूब डाली गई ताकि उन्हें साँस लेने में दिक्कत न हो. ये उपचार सफल रहा लेकिन इस वजह से उनकी आवाज़ हमेशा के लिए चली गई.

लेकिन इस सब से जूझते हुए भी प्रोफ़ेसर हॉकिंग ने अपनी पढाई और शोध जारी रखी है.

ब्लैक होल और बिग बैंग थ्योरी को समझने में उन्होंने अहम योगदान दिया है. उनके पास 12 मानद डिग्रियाँ हैं और उन्हें अमरीका का सबसे उच्च नागरिक सम्मान दिया गया है.

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