क्या कीड़े-मकोड़े खाने होंगे 20 साल बाद?

भविष्य का खाना

बढ़ती महंगाई और जनसंख्या को देखते हुए जानकार इस बारे में सोचने लगे हैं कि भविष्य में हमारा खाना क्या होगा. अब से 20 साल बाद हम कैसा खाना परोस रहे होंगे?

खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों, बढ़ती आबादी और उन्हें लेकर पर्यावरणविदों की चिंताओं ने भविष्य में भोजन को लेकर संयुक्त राष्ट्र के साथ-साथ सरकारों की परेशानी भी बढ़ा दी है.

अनुमान है कि अकेले ब्रिटेन में अगले पांच से सात वर्षों में गोश्त के दाम दोगुने हो सकते हैं जिससे वो आम लोगों की पहुंच से बाहर हो सकता है.

भविष्य में भोजन के स्वरूप पर काम करने वाली मोर्गन गाए का कहना है, “खाद्य पदार्थों के बढ़ते दामों की वजह से हम उस दौर की वापसी देख रहे हैं जब गोश्त समृद्धि से जुड़ जाएगा. इसका मतलब है कि हमें गोश्त के कारण पैदा होने वाली खाई को पाटने के तरीके तलाशने होंगे.”

तो ये तरीके क्या हो सकते हैं- हमारा भोजन किस तरह का होगा? नीचे बने लिंक्स पर क्लिक करके देखिए-

कीड़े-मकोड़े

गाए का कहना है कि हमारे खाने में कीड़े-मकोड़ों की अहम जगह हो सकती है.

दरअसल नीदरलैंड्स के वागेनिनगेन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के अनुसार कीड़े मकोड़ों में भी आम गोश्त के जितने पोषक तत्व पाए जाते हैं, जबकि उन पर मवेशियों की तुलना में कम लागत आती है.

उन्हें पानी भी कम चाहिए होता है और पर्यावरण के बढ़ते तापमान से जुड़ी चिंताओं से भी उनका उतना लेना देना नहीं है.

इतना ही नहीं, कीड़े-मकोड़ों की 1400 ऐसी प्रजातियां हैं जिन्हें इंसान खा सकता है.

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Image caption दुनिया के कई हिस्सों में की़ड़े मकोड़े खाए जाते हैं.

गाए यह नहीं कह रही हैं कि जल्द की आपकी तश्तरी में समूचे कीड़े मकोड़े परोसे जाने लगेंगे, बल्कि वह मानती हैं कि बर्गर और सॉसेज में कीड़े इस तरह इस्तेमाल हो सकते हैं कि वो आपको समूचे दिखाई न दें.

वैसे दुनिया के कई हिस्सों में कीड़े-मकोड़े पहले से ही लोगों के खाने का हिस्सा हैं. अफ्रीका में कैटरपिलर और टिड्डी को शौक से खाया जाता है तो जापानी लोग ततैंयों को चाव के खाते हैं.

वहीं थाईलैंड में कीट पतंगों को खाने का चलन रहा है.

लेकिन गाए कहती हैं कि अगर कीड़े-मकोड़ों को बड़े पैमाने पर खाने का हिस्सा बनाना है तो उन्हें लेकर आम धारणाओं को बदलना होगा.

क्या कहता है खाना

ये बात सब जानते हैं कि हमारे खाने पर इस बात का खासा असर पड़ता है कि खाना कैसा दिख रहा है और उसकी खुशबू कैसी है. लेकिन खाने के स्वाद पर आवाजों के प्रभाव को परखने के लिए भी अब प्रयोग हो रहे हैं.

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों को कुछ ऐसी आवाजें मिली हैं जिनके इस्तेमाल से खाना ज्यादा स्वादिष्ट या ज्यादा बेस्वाद बन सकता है.

इस शोध से जुड़े रशेल जोन्स कहते हैं, “इस बात पर खूब जोर दिया जाता है कि खाना कैसा दिख रहा है और उसकी खूशबू कैसी है, लेकिन इस पूरे मामले में आवाज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.”

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रायोगिक मनोविज्ञान के प्रोफेसर चार्ल्स स्पेंसर के नेतृत्व में हुए इस शोध से पता चला कि खाने के स्वाद को पृष्ठभूमि में बज रहे संगीत की ध्वनि में बदलाव करके परिवर्तन किया जा सकता है.

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Image caption संगीत बढ़ाएगा खाने का स्वाद

जोन्स कहते हैं, “हमें अभी पूरी तरह नहीं पता कि इससे दिमाग में क्या होता है, लेकिन कुछ तो होता है और हम इसे लेकर बेहद उत्साहित हैं.”

खाने के साथ ध्वनि के संगम को शेफ हेस्टन ब्लूमेंथल ने अपने रेस्त्रां में पेश किया है. उन्होंने खास व्यंजन तैयार किया जिसका नाम है साउंड ऑफ सी यानी सागर की ध्वनि.

जब ये व्यंजन परोसा जाता है तो आईपैड से समंदर किनारे की ध्वनियां बजाई जाती हैं. बताया जाता है कि इससे खाने का स्वाद बढ़ जाता है.

जोन्स कहते हैं, “ये तो हम जानते हैं कि चीनी से खाना मीठा होता है, लेकिन आप संगीत के इस्तेमाल से खाने में मीठे की मात्रा को उतना कम करने का प्रभाव पैदा कर सकते हैं जितना खाने वाले को पसंद हो.”

कंपनियां पैकिंग में भी खाने और आवाज के संबंध को ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं. पैकिंग के लिए कड़क सामग्री का इस्तेमाल किया जिससे लोगों को लगे कि खाना कुरकरा है.

हो सकता है कि जल्द ही खाने के पैकेट पर ये जानकारी भी मिलने लग जाए कि उन्हें खाते वक्त कौन सा संगीत बजाना चाहिए.

प्रयोगशाला में गोश्त

इसी साल डच वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में गोश्त विकसित करने में भी कामयाबी हासिल कर ली. उन्होंने गाय की मूल कोशिकाएं लेकर ये कारनामा किया. वे इस साल के अंत तक दुनिया का पहला 'टेस्ट ट्यूब बर्गर' भी तैयार करने का दावा कर रहे हैं.

प्रयोगशाला में गोश्त तैयार करने की दिशा में वैज्ञानिक दस साल से काम कर रहे हैं. वे इसे गोश्त की मांग को पूरा करने का ज्यादा प्रभावशाली और पर्यावरण अनुकूल तरीका बता रहे हैं.

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में हुए हालिया अध्ययन के अनुसार मवेशियों को मारने से बेहतर होगा कि गोश्त प्रयोगशाला में ही तैयार किया जाए क्योंकि इससे ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम होगा और ऊर्जा व पानी की खपत भी घटेगी.

नीदरलैंड्स के माशत्रिश विश्वविद्यालय में हुए इस शोध का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर मार्क पोस्ट कहते हैं कि वो नहीं चाहते कि प्रयोगशाला में तैयार गोश्त और प्राकृतिक गोश्त में कोई अंतर दिखे, लेकिन वो अलग तो होगा ही.

हालांकि इसे लोगों में लोकप्रिय बनाने के लिए बहुत ज्यादा काम करना होगा क्योंकि अभी ऐसी कोई चीज चलन में नहीं है.

शैवाल

शोधकर्ताओं का कहना है कि शैवाल इंसानों और पशुओं के लिए खाना मुहैया करा सकते हैं और उन्हें सागर में उगाया जा सकता है. बहुत से वैज्ञानिकों की तो ये भी राय है कि शैवाल से मिलने वाले जैव ईंधन से भूमिगत ईंधन की जरूरत को कम करने में भी मदद मिल सकती है.

कई जानकार मानते हैं कि शैवाल की खेती दुनिया का सबसे बड़ा फसल उद्योग बन सकता है. किसी जमाने में एशिया और खास कर जापान जैसे देशों में इसके बड़े फार्म पाए जाते थे.

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Image caption नमक की जगह शैवाल का इस्तेमाल फायदेमंद साबित हो सकता है.

ब्रिटेन के ‘सीवीड हेल्थ फाउंडेशन’ से जुड़े डॉ. क्रेग रोस का कहना है कि समुद्री शैवाल के बारे में अहम बात ये है कि वे बड़ी तेजी से उगते हैं. ये पृथ्वी पर सबसे तेजी से बढ़ने वाला पौधा है. इसलिए इसकी खेती बहुत कामयाब हो सकती है.

कीड़े मकोड़ों की तरह शैवाल को भी खाने में इस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है कि उसका ज्यादा पता न चले. ब्रिटेन के शेफील्ड हमल विश्वविद्यालय में वैज्ञानिकों ने समंदर में होने वाले पौधों के चूर्ण को ब्रेड और प्रोसेस्ड फू़ड में नमक की जगह इस्तेमाल किया. इस चूर्ण का स्वाद खासा मजबूत होता है लेकिन उसमें नमक कम पाया जाता है, जबकि नमक उच्च रक्तचाप, पक्षाघात और समय से पहले होने वाली मौतों के लिए जिम्मेदार माना जाता है.

वैज्ञानिकों को आशा है कि समुद्री पौधे के इस चूर्ण का इस्तेमाल जल्द ही बाजार में मिलने वाले तैयार खाने, सॉसेज और यहां तक कि चीज में हो सकता है. रोज का कहना है कि दुनिया में 10 हजार प्रकार के समंदरी पौधे पाए जाते हैं, जो दुनिया में खाने की समस्या को हल करने में मददगार साबित हो सकते हैं.

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