जीत की मारामारी में हार से जूझने की तैयारी

  • 4 अगस्त 2012
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Image caption फ़ेल्प्स ने पदक जीतने का रिकॉर्ड बना दिया है

हाल के सालों तक खेल मनोविज्ञान का जोर खिलाड़ियों को जीत के लिए ही तैयार करने पर रहता था. लेकिन गोल्ड मेडल जीतने के आदी हो चुके तैराक माइकल फेल्प्स और साइक्लिस्ट मार्क कैमडिश जैसे आधुनिक खेलों के नायक खुद को हारने के लिए भी तैयार करते हैं.

जानकारों का मानना है कि इस पहलू पर काम करके खिलाड़ी खुद को हार के बाद जहनी तौर पर तोड़ देने वाली निराशा से बचा सकते हैं.

लंदन ओलंपिक में 10,500 खिलाड़ी गोल्ड मेडल के लिए अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. इनमें से सिर्फ 302 के गले में ही यह चमचमाता पदक होगा. जबकि बाकी के हाथ लगेगी हताशा, गुस्सा और शर्मिंदगी.

न्यूयॉर्क के स्पोर्टस मेडिसन इंस्टिट्यूट आफ यंग एथलीट के स्पोर्टस फिजिशियन जॉर्डन मेज ने इस बारे में बीसीसी को बताया, “हार की कई बार अनदेखी की जाती है. जीत का जश्न मनाया जाता है लेकिन हार की टीस बहुत बुरी होती है.”

बेशक कई खिलाड़ी हार की स्थिति से काफी अच्छे ढंग से निपटेंगे. मसलन, हार उन्हें और कड़ा अभ्यास करके भविष्य में और बेहतर करने के लिए प्रेरित करेगा. लेकिन कुछ ऐसे भी होंगे जिनके लिए नाकामी को भूला पाना आसान नहीं होगा

हैमिल्टन का उदहारण

ऐसे हालात का सामना कर चुकी तीन बार की ओलंपिक रनर सूजी फेवर हैमिल्टन ने कहा, “कई देशों में रजत और कांस्य पदक को भी नाकामी माना जाता है.”

हैमिल्टन खुद ऐसी उम्मीदों का दबाव झेल चुकी हैं.

उनके आसपास मौजूद हर इंसान वर्ष 2000 में सिडनी ओलंपिक में उनसे सिर्फ 1500 मीटर में अमेरिका के लिए पहला गोल्ड मेडल जीतने की उम्मीद कर रहा था.

हैमिल्टन बताती हैं, “मेरी दोस्त कैंसर से मर रही थी, मेरे माता-पिता मेरे भाई की आत्महत्या से उबरने की कोशिश में लगे थे और उनके अलावा दस लाख डॉलर खर्च करने वाली मेरी प्रायोजक कंपनी भी पदक की उम्मीद कर रही थी. यकीनन उस समय मुझ पर सब तरफ का दबाव हावी था.”

इन सब हालात में हैमिल्टन ने 2004 की ओलंपिक के लिए खुद को तैयार करना शुरु किया लेकिन आखिरी समय में उन्होंने अपना नाम वापिस ले लिया. इसके बाद वह डिप्रेशन का भी शिकार हो गईं.

एक समय ऐसा भी आया कि हालात उन्हें खुदकुशी की कोशिश की ओर ले गए.

लेकिन डॉक्टर मेज की नजर मे हैमिल्टन का केस कोई हैरान करने वाला अकेला मामला नहीं है.

उन्होंने कहा, “कई खिलाड़ियों के लिए एक हार उनके अपने खेल को लेकर सोच की बदल देती है. इसका असर उनके बाकी के जीवन पर पड़ता है. अगर आपने सोच लिया कि हार होने वाली है तो यकीनन आप हार सकते हैं.”

हाल ही में विश्व के बेहतरीन एथलीटों के साथ काम करने वाले मनोवैज्ञानिक इस समस्या पर बिलकुल अलग तरह की राय जाहिर की है.

पीटर हैबर्ल के पास टीम यूएसए के शीर्ष ओलंपियनों को जहनी तौर पर मजबूत बनाने का जिम्मा है. बतौर वरिष्ठ मनोचिकित्सक उनका मानना है कि खिलाड़ियों के जहन से हार के डर को नहीं निकाला जा सकता.

हार का ख्याल

हैबर्ल की इस सोच में नामी मनोवैज्ञानी डेनियल एम वेंगर का ‘व्हाइट बीयर एक्सपेरिमेंट’ नामक चर्चित शोध हावी है.

वेंगर ने साबित किया कि किसी को अगर कहा जाए कि उसे खास चीज के बारे में नहीं सोचना चाहिए, वह बात उसके जहन में आ ही जाएगी.

उदहारण के लिए किसी से अगर कहा जाए कि वह सफेद भालू को अपने जहन में न लाए. यकीनी तौर पर कुछ समय बाद सफेद भालू उसके जहन में उभर ही आएगा.

हैबर्ल 2012 के लंदन ओलंपिक में हार का सामना करने वाले खिलाडि़यों के साथ काम करेंगे. खासकर उनके साथ जो बुरी तरह से हारे हों या जिनकी हार के बारे में किसी ने सोचा भी न हो.

हैबर्ल ने कहा, “ओलंपिक खत्म होने के कुछ महीने बाद तक मैं इस बात पर नजर रखूंगा कि हार ने उनके जीवन पर कैसे असर डाला और वह इसका सामना कैसे कर रहे हैं. हार के तीन महीने बाद भी इसके कारण डिप्रेशन हो जाना भी संभव है.”

उनके शोध के परिणामों पर लोगों की नज़र रहेगी.

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