क्या बैंक काट रहा है आपकी जेब...?

 बुधवार, 22 अगस्त, 2012 को 10:55 IST तक के समाचार
सेल

ख़र्च करने के लिए उकसाने की तकनीक से बैंकों को फ़ायदा

हम सभी ने ये सुन रखा है. वो एक काल्पनिक दोस्त है जो आपके कंधे पर थपकी देते हुए कहता है, ‘चलो ख़रीद लो, तुम इसके हक़दार हो...खरीदो. ’

ये चीज़ कुछ भी हो सकती है – कपड़े, जूते या कोई इलैक्ट्रॉनिक गैजेट. हम सब किसी ना किसी चीज़ का लालच तो है.

लेकिन क्या हो अगर ये काल्पनिक आवाज़, जो आपके इच्छाशक्ति की कुछ हद तक ग़ुलाम होती है, वास्तविक बन जाए?

नीदरलैंड्स का डीबीएस बैंक इसे ‘व्यक्तिगत दरबान’ कह कर पुकारता है.

तो क़िस्सा कुछ यूं है:

"बैंक चीन और भारत जैसी सस्ती जगहों पर आउटसोर्सिंग करके भी हर ग्राहक पर नज़र नहीं रख सकते. ऐसे में ये तकनीक काम आती है - इंटेलीजेंट एल्गोरिदम. इसे ना तो शौचालय जाने के लिए छुट्टी चाहिए और ना ही महीने के आख़िर में तनख़्वाह."

जॉन बेट्स

आपका स्मार्टफ़ोन जानता है कि आप कहां हैं.

जीपीएस के ज़रिए हर वक्त आपकी लोकेशन दर्ज होती रहती है. और क्योंकि आपके बैंक के पास आपका फ़ोन नंबर होता है इसलिए बैंक को भी पता होता है कि आप कहां है. बस खेल यहीं से शुरू हो जाता है.

आप क्रेडिट या डेबिट कार्ड के ज़रिए सामान ख़रीदते हैं इसलिए बैंक को पता होता है कि आप किस तरह की चीज़ों में दिलचस्पी रखते हैं – जूते, कपड़े या कुछ ओर. सबसे बड़ी बात ये कि बैंक जानता है कि आपके पास कितने पैसे हैं.

आपके बैंक बैलेंस के हिसाब से बैंक आपके पास एसएमएस भेजता है. उसमें शायद लिखा होता है कि अगले बीस मिनट में फ़ंला चीज़ खरीदोगे तो सस्ती ब्याज़ दर पर उधार मिलेगा...और हां बीस फ़ीसदी रियायत भी.

आप चाल में फंस जाते हैं और दुकान से बाहर हाथ में शॉपिंग बैग से लेकर निकलते हैं.

दरअसल आप ‘सही समय, सही जगह’ नाम से जाने जानी वाली मार्केटिंग प्रक्रिया का शिकार हो चुके होते हैं.

‘नए ग़ुलाम’

डीबीएस जैसे बैंक अपने ग्राहकों पर नज़र रखने के लिए जिस टेक्नोलॉजी का प्रयोग करते हैं उसे तकनीकी भाषा में ‘इंटेलिजेंट एल्गोरिदम’ कहा जाता है. ये तकनीक ग्राहक के बैंक बैलेंस, उसकी पसंद-नासपंद, उधार चुकाने की क्षमता और लोकेशन आदि का जायज़ा लेकर उसे ख़रीदारी करने के लिए उकसाती है.

कुछ बैंक और अन्य कंपनियां ग्राहकों को रिझाने के लिए उच्च तकनीक का सहारा ले रही हैं.

और इसके पीछे है एक स्मार्ट कंप्यूटर प्रोग्राम.

ये तकनीक ‘प्रोग्रेस’ जैसी कंपनियों के ज़रिए बैंकों तक पहुंचती है. ‘प्रोगेस’ के मुख्य टेक्नोलॉजी अधिकार जॉन बेट्स कहते हैं, “ ये तकनीक ग़ुलाम बनाने का ज़रिया है. ”

जॉन बेट्स कहते हैं कि बैंकों के लिए आदर्श स्थिति तो ये है कि वो अपने हर ग्राहक को उसकी ज़रुरतों के हिसाब से सेवाएं दे लेकिन ये संभव नहीं है क्योंकि इसमें बैंक को हर ग्राहक पर नज़र रखनी पड़ेगी. और ये काम महंगा साबित होगा.

जॉन बेट्स कहते हैं, “बैंक ऐसा नहीं कर सकते. चीन और भारत जैसी सस्ती जगहों पर आउटसोर्सिंग करके भी नहीं. ऐसे में तकनीक काम आती है. इंटेलीजेंट एल्गोरिदम को ना तो शौचालय जाने के लिए छुट्टी चाहिए और ना ही महीने के आख़िर में तनख़्वाह.”

इस तकनीक का इस्तेमाल बहुत-सी कंपनिंया कर रही हैं लेकिन कोई इस बात को ज़ाहिर नहीं होने देना चाहता. कुछ का आरोप है कि ये तकनीक ग्राहकों की नस्ल बगैरहा की भी खोज-ख़बर रखती हैं.

लेकिन इंटेलीजेंट एल्गोरिदम से कंपनियों को फ़ायदा हो रहा है और इसलिए इसका इस्तेमाल भी बढ़ रहा है.

व्यावसायिक जगत में इस तकनीक के सहारे लोगों को ख़ूब ख़र्च करने के लिए उकसाया जा रहा है.

तो अगली बार जब मॉल में घूमते-फिरते आपको कोई एसएमएस ये बताने के लिए आए कि फंला चीज़ पर इतना डिस्काउंट है, तो समझ लीजिए कि इसका मकसद आपसे कुछ कमाई करने का है.

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