कैसे सामान्य सा संक्रमण बन सकता है कैंसर

Image caption बर्किट लिमफोमा कैंसर से पीड़ित एक बच्ची.

अफ्रीका में संक्रमण से होने वाले कैंसर पीड़ितों की संख्या काफ़ी है. ये बुरी ख़बर है.

लेकिन अच्छी ख़बर ये है कि सैद्धांतिक रूप में टीके से इसकी रोकथाम हो सकती है.

अफ्रीका के युगांडा में ‘बर्किट लिमफोमा’ नाम का कैंसर बच्चों को तेजी से अपनी पकड़ में ले रहा है.

यहां के बच्चों में ये बीमारी आम बात होती जा रही है.

इस कैंसर में चेहरे और पेट के कुछ हिस्से फुल जाते हैं और बेइंतहा दर्द होने लगता है.

कैंसर का नाम बर्किट क्यों?

करीब 50 साल पूर्व आयरलैंड के एक डॉक्टर डेनिस बर्किट युगांडा आए थे और यहां पर एक मेडिकल सेंटर खोला था.

उन्होंने पहली बार इस बीमारी को कैंसर के तौर पर परिभाषित किया.

बर्किट के क्लिनिक में पेट और मुहं फुले हुए बच्चे काफी संख्या में आने लगे. हालांकि बर्किट ने अपने देश में इस तरह की बीमारी कभी नहीं देखी थी.

Image caption डॉक्टर डेनिस बर्किट ने ही पहली बार इस बीमारी को पहचाना था.

शायद इसीलिए इस कैंसर को ‘बर्किट लिम्फोमा’ नाम दिया गया.

आज हालात ये है कि युगांडा कैंसर संस्थान के अधिकांश बेड पर ‘बर्किट लिम्फोमा’से पीड़ित बच्चे होते मिलते हैं.

कैसे होता है ये कैंसर

मध्य अफ्रीका में इस बीमारी का सबसे ज्यादा प्रकोप बताया जाता है.

कैंसर का इलाज करने वाले डॉक्टर अब्राहम ओमोडिंग कहते हैं, “बर्किट लिम्फोमा के लिए ‘एप्सटेन बर’ नाम का वायरस जिम्मेदार होता है.”

‘एप्सटेन बर’ एक ऐसा वायरस है जो मोनोन्यू्क्लियोसिस या गले में बुखार के साथ बर्किट लिम्फोमा नामक कैंसर को दावत देता है.

ओमोडिंग के हिसाब से तो मलेरिया की स्थिति में भी इस कैंसर का खतरा बढ़ जाता है.

इसके अलावा दूसरे संक्रमण भी कैंसर को बढ़ावा दे सकता है.

युगांडा में एचआईवी पॉजिटिव की संख्या काफी है और यहां 'कपोसी सर्कोमा' एक महामारी की तरह है.

ओमोडिंग कहते हैं वाइरस से होने वाले कैंसर यहां आम बात है.

स्वच्छ रहें, स्वस्थ रहें

मेडिकल जर्नल लॉन्सेट ऑन्कोलॉजी में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक उत्तरी अमरीका में 25 में से एक मामला ऐसा होता है जब किसी को संक्रमण से कैंसर हो.

जबकि, विकासशील देशों में हर चार में से एक कैंसर पीड़ित को संक्रमण की वजह से कैंसर होता है.

और इसके पीछे की वजह ये है कि विकासशील देशों में स्वच्छता को लेकर बेहद लापरवाही बरती जाती है.

अमरीका के सिएटल स्थित ‘फ्रेड हचिन्सन कैंसर शोध संस्थान’ में वैज्ञानिक वायरस से होने वाले कैंसर पर शोध कर रहे हैं.

Image caption एचआईवी का टीका लगाती डॉक्टर. युगांडा में एचआईवी पॉजीटिव की बहुतायत है.

ये वैज्ञानिक इस बात का पता लगाने में जुटे हैं कि आखिर 'एप्सटेन बर' वायरस की चपेट में आने के कितने दिनों बाद किसी बच्चे में कैंसर के लक्षण दिखने लगते हैं.

दरअसल, वैज्ञानिकों का दावा है कि अगर ये पता लग गया है कि इस वायरस से कैंसर बढ़ता है तो निश्चित तौर पर वायरस खत्म करते ही कैंसर का खतरा टल जाएगा.

यहां तक कि 'एचपीवी वैक्सिन' के साथ भी इसी विधि को अपनाया गया है. 'एचपीवी' जिससे 'सरवाइकल कैंसर' होता है, उसे खत्म करने के लिए ही एचपीवी टीका लगाया जाता है और इस तरह से सरवाइकल कैंसर से निजात मिल रही है.

'हेपेटाइटिस बी' के लिए भी टीके का इस्तेमाल हुआ और 1990 के दौर में चीन में इसका खासा असर भी देखने को मिला.

लेकिन, युगांडा के बच्चों को बर्किट लिम्फोमा से बचाने के लिए जो टीका चाहिए वो अभी विकसित नहीं हुआ है लेकिन वैज्ञानिक इसपर काम कर रहे हैं.

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