क्या अपनी ज़िंदगी लेने का अधिकार होना चाहिए?

क्या लोगों को आत्महत्या करने का अधिकार होना चाहिए, खासकर अगर वे गंभीर बीमारियों से पीड़ित हों? आपको ये बात चौंकाने वाली लग सकती है पर मैं ऐसा करना चाहता हूँ.

मैं बस चाहता हूँ कि समाज आत्महत्या को कम से कम ऐसे हालातों में स्वीकार्यता दे जब किसी गंभीर बीमारी के कारण धीमी और दर्दनाक मौत होनी तया है और इसका विकल्प आत्महत्या बन सकती है.

अगर आप तथ्यों पर नज़र डालेंगे तो ब्रिटेन जैसे देशों में मेडिकल साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है. बीमार होने के बावजूद लोगों को अब लंबे समय तक ज़िंदा रखा जा सकता है- फिर चाहे वो ज़िदंगी शारीरिक रूप से दुखों से भरी हो और मरीज़ों की देख-रेख करने वाले रिश्तेदारों या डॉक्टरों की ज़िंदगी भी दूभर हो चुकी हो. हालांकि मैं जानता हूँ कि बस लोग इससे सहमत नहीं होंगे.

कहने को तो समाज में बहुत से लोग कैंसर, दिल की बीमार और एलज़ाइमर जैसी बामिरयाँ से ग्रसित हैं. लेकिन इन सबसे बड़ी बीमारी है बुढ़ापा.

अंतिम दिनों में कष्ट असहनीय

मैं ये नहीं कह रहा कि आप चाहे किसी भी उम्र के हों या किसी भी शारीरिक-मानसिक स्थिति में हों, आपको आत्महत्या कर लेनी चाहिए. मैं कई ऐसे लोगों को जानता हूँ जो 90 साल से ज़्यादा के हैं, बीमार हैं पर जीवन का आनंद ले रहे हैं.

मैं ये ज़रूर मानता हूँ कि ऐसे लोग जिन्हें लगता है कि अपने अंतिम दिनों में उनका कष्ट असहनीय हो गया है, उन्हें ज़िंदगी से निजात पाने का हक होना चाहिेए.

लेकिन अपनी जान लेना बहुत से लोगों की धार्मिक मान्यता के खिलाफ है- फिर चाहे वो व्यक्ति दर्द से चूर चूर हो. इसलिए आत्महत्या करना आज भी सामाजिक रूप से स्वीकार्य नहीं है.

गंभीर रूप से कई बीमार लोगों की ज़िंदगी को अगर कोई चीज़ कुछ हद तक बेहतर बनाती है तो वो है डाईऐसीटाइलमोरफिन नाम की दवा. आम लोग इसे हेरोइन कहते हैं.

मेरे पिता और माँ दोनों की मौत कैंसर से हुई और तब वे पूरी तरह से दवाओं के नशे के असर में थे. मेरी माँ की नर्सों ने हमें साफ साफ बता दिया था कि वे उनका खाना कम कर रहे हैं और दवाओं की डोज़ बढ़ा रहे हैं ताकि उनके अंतिम पल कम तकलीफदेह हो सकें.

जब मेरे पिता की मौत घर पर हुई तो मैंने बड़ी मात्रा में मॉरफिन और पेनकिलर अस्पताल को वापस किए.

सम्मानजनक अलविदा

मौत को किसी भी कीमत पर टालने की इच्छा मैं समझ सकता हूँ. मैं खुद से यही कहता हूँ कि जब मेरे हालात खराब होने लगेंगे तो मैं सम्मानजनक तरीके से अलविदा कह दूँगा. लेकिन मुझे ये भी चिंता है कि मेरे हालात अचानक एक दिन बेहद दर्दनाक हो जाएँगे कि मैं कुछ करने लायक ही नहीं बचूँगा.

इसीलिए मुझे लगता है कि सामाजिक मान्यताओं में बदलाव किसी वरदान की तरह होगा.

वैसे हम में से बहुत कम लोग ये जानते होंगे कि बिना किसी तकलीफ के अपनी ज़िंदगी का अंत कैसे करना है. हमें बस ये पता है कि अब बीमारी की वजह से मौत कभी न कभी आने ही वाली है.

मेरे हिसाब से अपनी ज़िंदगी का अंत करने का फैसला पर्सनल डिगनिटी या निजी सम्मान की भावना को आवाज़ देने की ही प्रक्रिया है, इसे स्वीकार्यता दिलाने की कोशिश है. फिलहाल तो समाज में यही होता है कि हमारी ज़िंदगी के आखिरी हफ्तों में बड़े पैमान पर चिकित्सिय संसाधन खर्च किए जाते हैं ताकि हमारी मौत असंवेदनशील बन कर रह जाए.

मैं बातें यूँ ही नहीं बोल रहा हूँ. कई अन्य लोगों की तरह इस अधेड़ उम्र में मेरे पिछले कुछ साल इसी अधेड़बुन में निकले हैं कि मौत कब आ सकती है, मेरे आस-पास के लोगों के साथ क्या होगा जिन्हें मैं प्यार करता हूँ.

मैं किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचाना चाहता और न ही उन लोगों को आहत करना चाहता हूँ जो गंभीर रूप से बीमार हैं या ऐसे लोगों की देखभाल कर रहे हैं.

मैं ये मानता हूँ कि हम इस बात को तब तक नहीं समझ सकते कि अच्छी ज़िंदगी कैसे हासिल की जा सकती है जब तक हम खुद को बेहतर मौत के लिए तैयार नहीं करते.

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