इंसानों की दवा चिंपाजियों पर भी कारगर

चिंपाजी
Image caption चिंपाजियों को प्रयोगशाला में रहते हुए अवसाद उठाना पड़ता है

एक नया शोध बताता है कि अवसाद ग्रस्त चिंपाजियों को भी उन दवाओं से ठीक किया जा सकता है जो अवसाद से जूझ रहे इंसानों के लिए बनाई गई हैं.

इन दवाओं का इस्तेमाल उन चिंपाजियों पर किया गया जो वैज्ञानिक शोध में इस्तेमाल किए जाते हैं.

शोधकर्ताओं का कहना है कि अन्य सैकड़ों चिंपाजियों का इलाज भी इसी तरह किया जाना चाहिए.

लंबे समय तक प्रयोगशाला में रहने के कारण ये जीव अकसर एक दायरे में बंध कर रह जाते हैं जिससे वो खेलने की क्षमता खो देते है.

ये अवसाद के शिकार हो जाते हैं और दूसरे चिंपाज़ियों के साथ संबंध नहीं जोड़ पाते हैं.

वैज्ञानिक शोध की कीमत

एम्सटरडैंम के बाहरी इलाके में स्थित एएपी बचाव केंद्र में चिंपाजियों के खाने के लिए ताज़ा सब्ज़िया हैं. वहां उन्हें भरपेट खिलाया जाता है और वे खुली हवा में खेल सकते है.

वहां कार्यरत व्यवहार जीव विज्ञानी डॉक्टर गोडेलीव करेननडोंक का कहना है कि कई जानवर इस केंद्र में दशकों से रह रहे हैं. ये ऐसे जानवर हैं जिनका इस्तेमाल वैज्ञानिक शोध के लिए हो रहा है.

उनका कहना है, “ये चिंपांजी हेपेटाइटिस सी के शिकार हैं और ये सब मरने तक यहीं रहेंगे.”

डॉ. करेननडोंक का कहना है कि जब ये जानवर प्रयोगशाला से निकलते हैं तो अवसादग्रस्त होते हैं. 15 से 20 सालों तक इन जानवरों की आवाजाही बहुत सीमित होती है.

वो कहती हैं, “हमें उम्मीद की थी कि जब इन्हें दूसरी जगह ले जाया जाएगा तो इनके असामान्य व्यवहार में कमी आएगी लेकिन परिणाम इसके उलट देखे गए. इनका असामान्य व्यवहार कम होने की बजाय और बढ़ा है."

डॉ. करेननडोंक कहती है कि ये उल्टी करते है और फिर उस उल्टी को समय-समय के बाद खाते चले जाते हैं.

अगर आप इस केंद्र के माहौल देखोगे तो चिंपाजियों की परेशानियों का एहसास होगा.

दवा का असर

टोमस और जुरों ने अपने जीवन का एक तिहाई हिस्सा उल्टी खाने में बिताया है. उल्टियां करने की वजह से इरीस का वजन इतना घट गया है कि यहां काम करने वाले कर्मचारियों का मानना है कि वो मर जाएंगी.

लेकिन इसमें से सबसे अधिक परेशानी में केनी दिखी. केनी बहुत ही छोटी सी चिंपांजी है और वो लगातार इस बात को लेकर सचेत रहती है कि उस पर कोई हमला कर देगा और वो अपना ज्यादातर समय डर के मारे चिखती ही रहती है.

इस केंद्र में काम करने वाले शोधकर्ताओं ने कुछ चिपांजियों को अवसाद दूर करने वाली दवाइयां दी. ये वहीं दवाइयां हैं जिनका इस्तेमाल अवसाद ग्रस्त इंसानों पर किया जाता है.

Image caption जीव वैज्ञानिक तौर पर चिंपाजी को मानव के सबसे अधिक करीब माना जाता है

डॉक्टर करेननडोंक का कहना है इस दवा के नतीजे चौंकाने वाले थे.

उन्होंने बताया, “जानवरों को ये दवा दिए जाने के बाद मैंने शुरुआत में पाया कि दो जानवर एक साथ खेल रहे थे लेकिन अब सभी जानवर खेल रहे है. ये सब अब खुश नजर आ रहे है.”

हाल ही में अमरीकी नेशनल इंस्ट्टयूट ऑफ हेल्थ ने 300 से ज्यादा चिंपाजियों को आजाद करने का फैसला लिया है जिसके बाद वो अपना बाकी जीवन राष्ट्रीय अभयारणय में बिता सकेंगे.

शोधकर्ताओं का मानना है कि प्रयोगशाला में इस्तेमाल किए जाने वाले जानवरों की मानसिक पीड़ा का इलाज सफलतापूर्वक किया जा सकता है. वैसे भी जानवरों के साम्राज्य में हमारे निकटम संबंधी होने के नाते वो इतने के हकदार तो हैं ही.

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