आख़िर आंसू क्यों निकलते हैं?

  • 26 फरवरी 2013
Image caption आंसू दुख-तकलीफ़ का स्पष्ट संकेत होते हैं

क्या आप जानते हैं कि इंसानों को जानवरों से अलग करने वाली चीज़ों में से एक चीज़ आंसू भी हैं. जी हां सिर्फ़ इंसान ही भावुक होकर आंसू बहा सकता है.

चोट लगने से आंसू आते हैं और दुखी होने पर भी आंसू आते हैं. सवाल है क्यों?

वैसे तकनीकी रूप से आंसू आंख में होने वाली दिक्कत का सूचक है. ये आँख को शुष्क होने से बचाता है और उसे साफ और कीटाणु रहित रखने में मदद करता है. ये आंख की अश्रु नलिकाओं से निकलने वाला तरल पदार्थ है जो पानी और नमक के मिश्रण से बना होता है.

लेकिन भावुक होने पर आने वाले आंसू अब भी अबूझ हैं?

आंसू आते क्यों हैं?

प्रोफेसर माइकल ट्रिंबल इंस्टीट्यूट ऑफ़ न्यूरोलॉजी में न्यूरोलॉजी के प्रोफ़ेसर हैं. साथ ही वो, ‘इंसान रोना क्यों चाहता है’ किताब के लेखक भी हैं.

वो कहते हैं, “डार्विन ने कहा था कि भावुकता के आंसू सिर्फ़ इंसान ही बहाते हैं और फिर किसी ने इस बात का खंडन नहीं किया. दरअसल रोने की प्रयोशाला में जांच नहीं की जा सकती.”

विज्ञान इस पर क्या कहता है? ज़्यादा कुछ नहीं.

रेडियो फॉल्स ऑन द माइंड की प्रस्तुतकर्ता और इमोशनल रोलर कोस्टर किताब की लेखिका क्लाउडिया हेमंड के अनुसार, “हालांकि हम सभी रोते हैं लेकिन इस पर प्रयोगशाला में अध्ययन बहुत कम हुआ है.”

उन्होंने बताया, “प्रयोगशाला में लोगों को रोने के लिए प्रेरित करने के लिए आपको उदास करने वाला संगीत बजाना होगा, रुलाने वाली कोई फ़िल्म दिखानी होगी या उदास करने वाला कुछ पढ़ने को देना होगा और फिर उन पर नज़र रखनी होगी कि वो कब रोते हैं. लेकिन दिक्कत ये है कि असल ज़िंदगी में रोना बहुत अलग होता है.”

वो आगे कहती हैं, “आप लोगों से पूछ सकते हैं कि आपको रोना कब आता है या पिछली बार आपको किस वजह से रोना आया था लेकिन इसके उत्तर बहुत अलग-अलग होते हैं.”

विज्ञान लेखक और मनोवैज्ञानिक जैसी बैरिंग कहते हैं, “दिक्कत ये है कि कोई किस चीज़ को देखकर दुखी होता है, ये हर आदमी के हिसाब से अलग होता है.”

रोने की वजह क्या है?

क्या रोना अलग-अलग क्षेत्र के हिसाब से अलग हो सकता है.

क्लाउडिया हेमंड कहती हैं, “ये अलग-अलग संस्कृति के हिसाब से अलग हो सकता है. अगर देश के लिहाज से देखें तो आदमी-औरत दोनों के रोने के लिहाज से अमरीका सबसे ऊपर है. सबसे कम रोने वालों में मर्द बुल्गारिया के हैं तो औरतें आइसलैंड और रोमानिया की.”

प्रोफेसर ट्रिंबल कहते हैं, “अगर आप मुझसे पूछें कि रोने के सार्वभौमिक कारण क्या हैं तो मैं कहूंगा सबसे पहला है संगीत.”

वे बताते हैं, “मैंने कई अंतरराष्ट्रीय सर्वे किए हैं- लेक्चर के दौरान मैं कहता हूं कि संगीत सुनकर कितने लोग रोते हैं तो 90 लोग हाथ उठा देते हैं. कविता से जुड़कर 60 फीसदी, और किसी अच्छी पेंटिंग को देखकर 10 से 15 फ़ीसदी लोग रोते हैं. जब मैं सवाल मूर्ति या ख़ूबसूरत बिल्डिंग को देखकर रोने का पूछता हूं तो एक भी हाथ नहीं उठता.”

लेकिन क्या रोने से हमें कोई फ़ायदा होता है?

यूनिवर्सिटी ऑफ़ सदर्न फ़्लोरिडा के मनोवैज्ञानिक जॉनेथन रोटैनबर्ग कहते हैं, “हमने हज़ार लोगों से विस्तार से ये बताने को कहा कि वो कब रोए थे. सभी मामलों में सामाजिक समर्थन तभी मिला जब वो किसी के सामने रोए. अकेले में तकिए में सिर छुपा कर रोने से कोई फ़ायदा नहीं होता.”

क्या रोने का फ़ायदा है?

रोने के फ़ायदे पर राय अलग-अलग हो सकती है तो रोने के उदगम के बारे में चीज़ें और भी अनिश्चित हैं.

जैसी बैरिंग कहते हैं, “आंसुओं के मामले में इंसान जानवरों से बहुत अलग है अपने सबसे नज़दीकी रिश्तेदार चिम्पांजी से भी. हम दूसरों की तरह सोच सकते हैं, हम खुद को उनकी जगह रखकर देख सकते हैं और यही हमें संभावित शिकार बनाता है, आंसुओं से हमें धोखा दिया जा सकता है.”

यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैरीलैंड में मनोविज्ञान और न्यूरो साइंस के प्रोफ़ेसर रॉबर्ट प्रोलाइन का विचार कुछ अलग है. वो आंसुओं से संपूर्ण प्रभाव पर अध्ययन कर रहे हैं.

वो कहते हैं, “आंसुओं का दृश्य-प्रभाव देखने के लिए हमने ऐसी तस्वीरें निकालीं जिसमें लोगों के आंसू निकल रहे थे. हमने कंप्यूटर द्वारा उसमें से आंसू हटा दिए. फिर उसके भाव देखने के लिए हमने लोगों को दिए. आश्चर्यजनक रूप से हमने पाया कि आंसू हटा देने के बाद तस्वीर में आदमी या तो कम दुखी लगता है या बिल्कुल दुखी नहीं लगता. दुख के आंसू सब कुछ बदल देते हैं.”

लेकिन क्या आंसू सिर्फ़ दुख का सूचक हैं या ये कुछ और भी हैं?

इसराइल के वाइट्स मैन इंस्टीट्यूट में न्यूरोबायलॉजी के प्रोफेसर नोएम सबाओ ऐसा ही मानते हैं. वो कहते हैं कि चूहों के आंसुओं में एक रासायनिक संदेश थेर्मौन होता है, जो दूसरे चूहों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है.

लेकिन क्या ऐसा इंसानों के साथ भी हो सकता है?

नोएम ने भावुकता से पैदा हुए आंसुओं का सैंपल लिया और कामोत्तेजना पर उसकी जांच की. उन्होंने पाया कि दुख के आंसुओं का कामोत्तेजना पर असर पड़ा है और ये कम हुई है.

“आंसू सूंघने वाले आदमियों में टेस्टेरॉन का स्तर तेजी से कम हुआ था.“

टेस्टेरॉन का स्तर कम होने से आदमी की आक्रामकता भी कम होती है. इसका मतलब ये है कि आंसुओं से सीधा संदेश जाता है- कृपया मुझ पर हमला न करें.

तो शोध का निष्कर्ष ये है कि इंसानों से आंसुओं में भी केमिकल सिग्नल होता है. हालांकि ये रासायनिक संदेश क्या है इसका अभी पता नहीं चला है.

महिलाएं ज़्यादा रोती हैं

क्या महिलाएँ पुरुषों से ज़्यादा रोती हैं?

Image caption आंसू खु़शी में निकलते हैं

प्रोफ़ेसर सबाओ ने एक प्रयोग किया. उन्होंने अपने घर और पड़ोस में आग लगा दी. इसे देखकर रोने वाले लोगों में 70 महिलाएं थीं और सिर्फ़ एक पुरुष.

प्रोफ़ेसर रौटैनबर्ग कहते हैं, “शिशुओं के रोने पर काफ़ी अध्ययन किया गया है, ये आसान है. लेकिन 10-11 की उम्र में जब लड़का और लड़की अपने लिंग को पहचानने लगते हैं, तबसे लड़कियां लड़कों के मुकाबले ज़्यादा रोती हैं और ये ताउम्र जारी रहता है.”

क्या वक्त के साथ रोने पर फ़र्क पड़ा है? क्या अब हम सार्वजनिक रूप से पहले से ज़्यादा रोते हैं?

प्रोफ़ेसर ट्रिंबल कहते हैं, “टीवी के साथ इस पर काफ़ी फ़र्क पड़ा है. ओलंपिक एक अच्छा उदाहरण है. इसमें खिलाड़ी रोते हैं जीतने पर और हारने पर भी. दर्शक भी जीत और हार में रोते हैं और ये सब टीवी में देखता है. इससे सार्वजनिक रूप से रोने को स्वीकार्यता मिलती है.”

फ़्रांस में रूमानी नाटकों के दौर में माना जाता था कि अगर आपके नाटक में दर्शक रोए नहीं तो वो बेकार है.

लेकिन अभिनेता के लिए आंसू निकालना दर्शकों के मुकाबले ज़्यादा मुश्किल है. रॉबर्ट प्रोलाइन कहते हैं, “दिक्कत यही है कि आंसू पैदा नहीं किए जा सकते. आप रोने का भाव तो दर्शा सकते हैं, लेकिन आंसू पैदा नहीं कर सकते.”

रूसी निर्देशक और शिक्षक, स्टैन लास्की कहते हैं, “ऐक्टर को रोने के लिए अपनी किसी दुख भरी याद का सहारा लेना पड़ता है. वो ये सोचकर नहीं रो सकता कि मुझे इस लाइन पर रोना है उसे उस डायलॉग से अपनी भावना को जोड़ना होगा. ऐक्टर जितनी सफ़लता से ये कर पाता है उसके लिए रोना उतना ही आसान होगा.”

वैसे हममें से कुछ लोग तो रोने का आनंद भी लेते हैं. कई लोग पैसे खर्च करके दोबारा ऐसी फ़िल्म देखने सिनेमाहॉल जाते हैं जिसे देखकर वो दिल खोलकर रो सकें.

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