मर्दों में आत्महत्या: सहारे के लिए कंधे की तलाश!

Image caption श्विक आकंड़ों के अध्यन से पता चला है कि पुरुषों में आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं

अपने एक बेहद अच्छे दोस्त से बात करने के महज़ आधे घंटे बाद एक पुरुष ने आत्महत्या कर ली. ना वो पत्नी जिससे उसका तलाक हुआ था, ना ही उसकी बेटी जिसे वो बेहद चाहता था और ना कोई दोस्त उसको मौत की तरफ बढ़ते हुए देख पाया.

मृतक अवसाद में था और उसे किसी से इस बारे में मदद मांगते देखा नहीं गया.

इस आदमी की पूर्व पत्नी कैरोलीन कार्टर कहती हैं, "मुझे हमेशा लगता है कि अगर उन्होंने परिवार से, दोस्तों से या किसी के साथ भी अपने दिल की बात बाँटी होती. तो शायद ऐसा नहीं होता."

कार्टर मानती हैं कि उन्होंने कभी अपने पति के दिल में इस नज़रिए से झाँक के नहीं देखा कि कहीं वो आत्महत्या तो नहीं करने वाले. कार्टर कहती हैं "हम अलग हो रहे थे. वो बेहद तनाव में थे पर उनका मूड हमेशा बदलता रहता था. मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था कि ऐसा हो जाएगा. मैं अपने आप को लंबे समय तक उनकी आत्महत्या के लिए दोष देती आई."

वैश्विक समानता

दुनिया के हर कोने में यह किस्सा आम है. अब वैश्विक आँकड़ों के अध्यन से पता चला है कि पुरुषों में आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं वहीं महिलाओं में यह कम हो रहे हैं. (भारत: आत्महत्या युवाओं की मौत का दूसरा बड़ा कारण)

साल 2011 में केवल ब्रिटेन में हर दिन 12 पुरुषों ने अपनी जान ले ली. आत्महत्या करने वालों में ज़्यादातर की उम्र 45 से 55 के बीच थी.

पर ऐसा हो क्यों रहा है?

न्यूहैम विश्वविद्यालय के अस्पताल में मनोचिकित्सक पीटर बर्न ने बीबीसी को बात करते हुए कहा, "बहुत बार कारण होता है पैसे या काम की कमी, उधार या व्यावसायिक विफलताएं."

ब्रिटेन में बुरे जीवन के खिलाफ अभियान चलने वाले एक संगठन की निदेशक जेन पॉवेल का कहना है दुनिया में चल रहा वैश्विक आर्थिक संकट आत्महत्या का एक बड़ा कारण है.

आपबीती

एक साल पहले साइमन स्टीफंस ने आत्महत्या की कोशिश की थी. उन्होंने एक कंपनी शुरू की थी जहाँ कुछ गलत हो गया और उन पर मुकदमा शुरू हो गया. स्टीफंस कहते हैं, "हर चीज़ बिखर रही थी तब मैंने जान देने की कोशिश की. दरअसल पुरुषों के लिए यह कहना कठिन होता है कि 'मुझे मदद चाहिए'. आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप भीतर से मज़बूत हों."

स्टीफंस के अनुसार समस्या का दूसरा कारण यह है कि ऐसी बहुत ही कम जगहें या अवसर होते हैं जब पुरुष अपनी समस्याओं के बारे में बात करने में सहज महसूस करते हैं.

स्टीफंस अपने अनुभव से कहते हैं, "आपका दिमाग आपके खिलाफ़ षड्यंत्र रचता है. वो ऐसी चीज़ें आपके सामने लाता है जिससे आप बहुत आहत होते हैं. लेकिन यह भी सच है कि साल भर में आप हालात को बहुत ज़्यादा बदल सकते हैं."

विशेषज्ञ

Image caption वैश्विक आकंड़ों के अध्यन से पता चला है कि महिलाओं में आत्महत्या के मामले यह कम हो रहे हैं

इस तरह के लोगों की मदद करने वाली जेन पॉवेल के लिए स्टीफ़ंस की कहानी बहुत पहचानी हुई है. वो कहती हैं "हजारों पुरुष स्टीफंस की तरह ही महसूस करते हैं."

मनोचिकित्सक पीटर बर्न कहते हैं "जो पुरुष मदद मांगने के लिए आते हैं वो उन पुरुषों से मानसिक रूप से अलग होते हैं जो आत्महत्या कर लेते हैं."

बर्न कहते हैं " ऐसे ना जाने कितने लोग हैं जिन्हें मानसिक इलाज की ज़रुरत है जिन तक हम नहीं पहुँच पा रहे हैं. परिवार वालों को उनकी परेशानियों का पता तब लगता है जब वो जान दे देते हैं."

बर्न के अनुसार जान देने को आतुर आदमी के पास सही ढंग से सोचने की कोई ताकत नहीं रह जाती. बर्न कहते हैं कि आत्महत्या करने जा रहा आदमी कभी यह नहीं सोच पाता कि वो इस हालत से बाहर कैसे आ सकता है.

कॉल ने बचाई जान

केविन शेपर्ड नाम एक सज्जन जो कि आत्महत्या के मुहाने से इसलिए निकल आए क्योंकि उन्होंने एक फ़ोन लगा लिया था. आत्महत्या करने के पहले वो अपने फ़ोन में नामों को देख रहे थे कि कौन उनके जीवन में है कौन नहीं है. तभी उनकी निगाह एक ऐसे नंबर पर पड़ी जो ब्रिटेन में इस तरह के लोगों की मदद करता है.

उन्होंने पहली बार फ़ोन लगाया किसी ने नहीं उठाया. उन्होंने दूसरी बार हिम्मत कर के फ़ोन लगाया किसी ने उठाया. वो बताते हैं "मैं नौकरी से निकाला जा चुका था. मेरा पत्नी के साथ संबंध ख़त्म हो चुका था. 40 साल की उम्र में जीवन दोबारा शुरू से शुरू करना था और मेरे पास कुछ नहीं बचा था."

मनोचिकित्सक बर्न कहते हैं "अवसाद अमीर गरीब देख कर नहीं आता लेकिन कम आमदनी वाले ज़्यादा मौत को गले लगाते हैं."

आत्महत्या का प्रयास कर चुके साइमन स्टीफंस मर्दों के ज़्यादा आत्महत्या करने के बारे में कहते हैं "महिला सशक्तीकरण और बराबरी की बात पर सबने महिलाओं के ऊपर खूब ध्यान दिया लेकिन लोग यह भूल गए कि पुरुष भी हैं और उन्हें भी मदद की ज़रुरत है."

जाएं तो जाएं कहां

केविन शेपर्ड कहते हैं " आप बात किससे करें. आप दोस्तों के सामने अपना दुखड़ा रो नहीं सकते. आपको डर लगता है कि अगर आप ऐसा करेंगे तो आपके दोस्त आपसे बात करना बंद कर देंगे. आप मनोचिकित्सक के पास इसलिए नहीं जाते क्योंकी आपको समझ नहीं आता कि आपको हो क्या रहा है. "

पर यक्ष प्रश्न बरकरार है.

कैसे अवसाद के उन प्रारंभिक निशानों को पहचाना जाए और किसी को बहुत देर होने के पहले मदद दी जाए?

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