कैसे ज़िंदगी का हिस्सा बन गई ये दवा

Image caption अवसादरोधी दवाएं अब आम जिंदगी का हिस्सा हैं

पच्चीस वर्ष पहले जब प्रौज़ैक का पहली बार इस्तेमाल हुआ, उसके बाद से ही ये दवा हमारी जीवनशैली में शामिल होती चली गई.

1990 के दशक में प्रोज़ैक ने वह पाया, जो बहुत कम दवाएं पाती हैं. यह बेहद फैशनेबल तो बन ही गई थी, साथ ही साथ इस दवा ने आम आदमी के बीच भी शोहरत पा ली थी.

इसके लिए एलिज़ाबेथ वुर्टेल की किताब 'प्रोज़ैक नेशन' भी काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार थी.

सबसे पहले अमरीका में ये दवा 1988 में आई और इसके एक वर्ष बाद ब्रिटेन में इसे उतारा गया. उसके बाद से ही यह मानसिक बीमारी के बारे में कुछ भी बताने का एक मुहावरा हो गया.

साथ ही यह बात भी शुरू हो गई कि क्या मानसिक बीमारियों को किसी पेशेवर की सहायता से ठीक किया जाए, या फिर इसके लिए दवा दी जाए?

मशहूर उपन्यास ‘ऐन एंथोलॉजी ऑफ़ एसेज़, द एज ऑफ़ एंग्ज़ायटी’ की सह-लेखिका साराह डांट बताती हैं, ''यह मानों अपने अंदर जलती सलाख उतार देने सा होता था.''

वैसे, हर कोई इससे खुश नहीं है. कार्डिफ़ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और फ़ार्मागेडान नामक किताब के लेखक डेविड हीले कहते हैं, ''प्रोज़ैक को जिसने बेहतरीन बनाया, वह इसकी गुणवत्ता नहीं, इसकी शानदार मार्केटिंग थी.''

वह कहते हैं कि उन्होंने दवाओं के प्रति प्राकृतिक सावधानी को भूलने पर मजबूर कर दिया.

प्रोज़ैक, एक दवा और विचार के तौर पर भी चल पड़ी. इस पर आधारित पुस्तक 'प्रोज़ैक नेशन' तो बहुत बड़ी हिट साबित हुई. इसे 2002 में पुनर्प्रकाशित किया गया, और क्रिस्टीना रिक्की को लेकर एक फ़िल्म भी बनाई गई.

इसकी लगभग सवा लाख प्रतियां उस साल बिकी, जैसा पब्लिशर्स वीकली का दावा है.

किताब और फ़िल्म के ज़रिए, प्रोज़ैक दरअसल मानसिक बीमारी का जैसे पर्याय ही बन गया.

डिप्रेशन के लिए ड्रग्स

Image caption कई को अवसादरोधी दवाओं की लत भी लग जाती है

प्रौज़ैक अब हरेक अवसादरोधी के लिए लगभग दूसरा नाम है और वह ऑक्सफ़ोर्ड के शब्दकोश में भी आ गया है. लोगों के पास अब ‘प्रौज़ैक पल’ हो सकते हैं, जिसका मतलब खुशी या भूलना होता है.

अचरज नहीं कि प्रौज़ैक अब फ़िल्म निर्देशकों के लिए भी एक विषय बन गया. स्टीवन सोडेरबर्ग की मनोवैज्ञानिक थ्रिलर 'साइड इफ़ेक्ट्स' में एक न्यूयॉर्क निवासी अवसाद के लिए दवा लेता है, और वहां प्रोज़ैक का उल्लेख होता है.

आज यूरोप और अमरीका के लोग एक समान दर पर ही अवसादरोधी दवाएं लेते हैं.

बॉन के इंस्टीट्यूट फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ लेबर के आकलन के अनुसार 2010 में यूरोप के हर 10 में से एक आदमी यह लेता था.

यूएस सेंटर फ़ॉर डिज़ीज़ कंट्रोल रिसर्च के मुताबिक़ अमरीका में 12 वर्ष के ऊपर के लगभग 11 फ़ीसदी लोग अवसादरोधी दवाओं का सेवन करते हैं.

हालांकि, इन्हें प्रेस्क्राइब करनेवाले कई इसके इस्तेमाल करने के तरीक़े की आलोचना भी करते हैं.

यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन में न्यूरोसाइंस की वरिष्ठ लेक्चरर जोआना मॉनक्राइफ़ कहती हैं कि वह इसे लेकर बहुत पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकतीं.

दिल चाहता है

कई विशेषज्ञ मानते हैं कि अवसादरोधी काम के हैं. मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी के इयान एंडरसन कहते हैं कि दवाओं को लेकर रूढ़िवादी रवैया नहीं अपनाना चाहिए.

इयान कहते हैं, ''मैंने कई लोगों को अवसाद से बुरी तरह प्रभावित होते देखा है. यह ठीक नहीं है.''

डुनांट कहती हैं कि एक बार ब्रेकअप के दौरान उनको इन दवाओं से मदद मिली. वह कहती हैं कि काश ये दवाएं 1970 में भी होतीं, जब उनके पिता को तनाव से निपटने के लिए इलेक्ट्रिक शॉक थेरेपी लेनी पड़ी.

कई लोग बेहतर महसूस करते हैं, जब वे ये दवाएं लेते हैं. अवसादरोधी दवाओं का असर दिमाग़ में मौजूद सेरोटॉनिन के स्तर पर होता है, जो भावनात्मक संवेदना से जुड़ा हुआ है. हालांकि, सेरोटॉनिन और खुशी का संबंध स्पष्ट नहीं है.

ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी के स्टैफोर्ड लाइटमैन कहते हैं, ''हमारी राय इस मामले में बिल्कुल साफ़-साफ़ नहीं है. आख़िरकार कोई चूहा अवसाद में तो होता नहीं, जो हम प्रयोगशाला में उस पर शोध कर सकें.''

वह निष्कर्ष के तौर पर कहते हैं कि शायद ये दवाएं लेने के बाद आत्मविश्वास कई गुणा बढ़ जाता है.

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