इंटरनेट आपको आपका पैसा कब देगा?

इस सदी के अंत में एक ऐसी दुनिया की कल्पना करिए जब मशीनें आज के मुकाबले कहीं बेहतर होंगी.

कारें और ट्रक अपने आप चलेंगे और उनसे शायद ही कभी कोई दुर्घटना हो. धरती से खनिज निकालने के काम में रोबोट लगे होंगे और मज़दूर कभी खान में नहीं फंसेंगे. मानव शरीर के ऑपरेशन करने वाले रोबोट से कभी गलती नहीं करेंगे.

कपड़े हमेशा नए डिजाइन के होंगे, वे हमेशा फिट आएंगे, क्योंकि घर पर लगी मशीन आपके एक दिन पुराने कपड़े को रिसाइकल करके उन्हें नया बना देगी. कपड़ों को धोने का झंझट न होगा.

मैं ये तो नहीं बता सकता हूं कि इनमें से कौन सी तकनीक इस सदी में काम करना शुरू कर देगी और कौन सी तकनीक अपनी खामियों की वजह से बेकार हो जाएगी. लेकिन इनमें से कुछ तकनीकें तो काम ज़रूर करने लगेंगी.

कौन होगा बेहतर?

इससे कौन अमीर होगा? अगर रोबोटिक सर्जन ने बढ़िया काम किया तो क्या आने वाले कल के सर्जन उसी नाव में सवार होंगे जिस पर आज के संगीतकार सवार हैं?

मसलन कुछ संगीगकार तो यूट्यूब या किकस्टार्टर पर रातोंरात हिट हो जाते हैं, जबकि अधिकांश के लिए अपना गुजारा चलाना भी मुश्किल होता है.

( ऐसा होगा भविष्य का कैमरा..)

यह सवाल पूछा जाना चाहिए. हालांकि यह जानना थोड़ा टेढ़ा काम है कि तकनीक ने हाल के समय में कैसे फ़ायदा पहुंचाया है.

यह कैसे हो सकता है कि डिजिटल नेटवर्किंग की अविश्वसनीय खूबियां इतने विशाल जनसमुदाय के पास पहुंच गईं और हमें इनका व्यापक फायदा न दिखे.

यह कैसे हो सकता है कि नेटवर्किंग का यह समय अंतहीन कटौतियों, बेरोजगारी और सामाजिक गतिशीलता की कमी का समय दिख रहा है और बाजार में इतना पैसा डालने के बावजूद भी क्यों कोई हलचल नहीं है.

हमारे इस दौर का सबसे बड़ा नुस्खा है खुली सूचना. ये नुस्खा अलग-अलग रूपों में देखने को मिलता है. मसलन ओपन साफ्टवेयर, मुफ्त ऑनलाइन शिक्षा, यूरोपीयन पाइरेट्स पार्टियां, विकीलीक्स, सोशल मीडिया और भी न जाने कितने रूपों में.

सूचना

सूचनाओं को मुफ़्त बनाने का सिद्धांत पहली नज़र में यह संकेत देता है कि इसका मतलब सूचना को कुछ खास लोगों से चंगुल से निकाल कर उसका फ़ायदा सब तक पहुंचाना है.

दुर्भाग्य से, ये नुस्खा अब जहर बन गया है, हालांकि इस पर अभी कोई ध्यान नहीं दे रहा है.

इंसानों को तो एक जैसा बनाया गया है. लेकिन कंप्यूटरों को नहीं.

( कैसे होंगे भविष्य के स्मार्ट शहर)

जब लोग मुक्त रूप से सूचनाओं को साझा करते हैं, तो जिन लोगों के पास सबसे अच्छे कंप्यूटर होते हैं, वो उस सूचना का सबसे अधिक फायदा उठा सकते हैं जबकि अन्य लोग उसका सीमित ही उपयोग कर पाते हैं.

जिन लोगों के पास बेहतरीन कंप्यूटर हैं, उनके पास ज्यादा दौलत और ज्यादा शक्तियां हैं.

इन बेहतरीन कंप्यूटरों का इस्तेमाल बड़ी कारोबारी कंपनियों, सोशल मीडिया साइटों, राष्ट्रीय खुफ़िया एजेंसियों, विशाल ऑनलाइन स्टोरों, बड़ी राजनीतिक मुहिमों, बीमा कंपनियों या फिर सर्च इंजनों, किसी के लिए भी हो सकता है.

‘विशाल डाटा’ संरक्षित करने वाले सभी कंप्यूटर आम तौर पर एक जैसे ही दिखते हैं. उन्हें किसी अज्ञात स्थान पर रखा गया है और किसी खजाने की तरह उनकी रखवाली की जाती है.

कंप्यूटर प्रोगाम

ये बेहतरीन कंप्यूटर जिन प्रोग्रामों से संचालित होते हैं, वो भी तकरीबन एक जैसे ही होते हैं

इनका सबसे पहला काम होता है दुनिया भर के लोगों से जुड़ी वो सूचनाएं जुटाना जो मुफ़्त रूप से उपलब्ध है.

इसमें स्कैन की गईं ईमेल, सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारियां, क्लाउड कनेक्टेड कैमरों से ली गई तस्वीरें, विज्ञापन या मेडिकल फ़ाइलें, सभी कुछ शामिल हैं. यहाँ ताक-झांक की पूरी आजादी होती है.

लोगों से जुड़ी विशेष सूचनाएं हासिल करने के लिए उन्हें कई बार ललचाया भी जाता है.

इस तरह के प्रलोभनों में मुफ्त इंटरनेट या संगीत सर्विस शामिल हो सकती है. जो लोग इन प्रलोभनों में आ जाते हैं, उन्हें इसकी कीमत चुकानी पड़ती है. कईयों के लिए नौकरियों के अवसर सिमट जाते हैं तो लोगों को बड़ी आर्थिक चपत लगती है.

आम लोग या कहिए साधारण कंप्यूटरों वाले लोग ही वो सूचना मुहैया कराते हैं जिनसे बड़े कंप्यूटर इतने ताकतवर और मूल्यवान बनते हैं. इसके बदले में इन आम लोगों को भी कुछ थोड़े-बहुत फायदे होते हैं.

अर्थव्यवस्था का हिस्सा

ज्यादा से ज्यादा लोग इस अर्थव्यवस्था का हिस्सा बन रहे हैं जिनमें सबका फ़ायदा दिखाई देता है. सोशल मीडिया पर चहल पहल सबको पसंद है लेकिन यही उस जानकारी को हासिल करने का जरिया है जो ताकत का स्रोत है.

अधिकांश मामलों में यहां कोई गड़बड़ नहीं होती है. बड़े कंप्यूटरों के बहुत से मालिक अच्छे लोग हैं.

मैं भी एक सिस्टम को तैयार करने और उसके फ़ायदे सब तक पहुंचाने की परियोजना का हिस्सा रहा हूं. बावजूद इसके, इसे बरकरार नहीं रखा जा सकता है.

मुख्य समस्या ये है कि बड़े कंप्यूटरों के मालिक खुद को एक बड़ा कृत्रिम दिमाग समझने लगते हैं. लेकिन वास्तव में वे उन सूचनाओं की रीपैकेजिंग ही कर रहे होते हैं, जो अन्य लोगों से उन्हें मिली है.

‘बड़े डाटा’ का यही मतलब है. उदाहरण के लिए अगर देखें तो गूगल या माइक्रोसाफ़्ट का कंप्यूटर किसी लेख का अंग्रेजी से किसी अन्य भाषा में कमोबेश अनुवाद कर सकता है. लेकिन इसमें होता ये है कि इंसानों के जरिए किए गए अनुवाद को अलग अलग स्तरों पर जमा किया जाता है और उसकी मदद से नया टेक्सट तैयार किया जाता है.

( सिर्फ़ मशीन नहीं रह जाएगा रोबोट)

ऐसे में पुराने अनुवादों के अंशों को मिला कर नया अनुवाद तैयार किया जाता है. ऐसे में पुराने अनुवाद के रूप में जितने ज्यादा स्रोत होंगे, अनुवाद उतना ही ज्यादा सटीक होगा.

डिजिटल नेटवर्क

वैसे पहले डिजिटल नेटवर्क संचार की शुरुआत 1960 के आसपास हुई. मैं यहां टेड नेलसन के के शुरुआती कामों का जिक्र कर रहा हूं.

नेटवर्क डिजिटल मीडिया का विचार पहली बार तब आया जब एक वैश्विक माइक्रोपेमेंट सिस्टम के बारे में सोचा गया, ताकि अगर किसी व्यक्ति ने नेटवर्क में कोई डाटा जोड़ा है और कहीं कोई और उसका इस्तेमाल कर रहा है तो डाटा जोड़ने वाले को इसका भुगतान किया जा सके.

ठीक वैसे ही ही जैसे किसी लेखक की किताब बिकने पर उसे रॉयल्टी मिलती है.

लेकिन आजकल जिस तरह की दकियानूसी व्यवस्था है, ये उसके पूरी तरह खिलाफ़ था.

चीजें अगर क़ीमती है, तो इसका मतलब यह नहीं हुआ कि उन्हें खरीदा नहीं जा सकता है. चीजों को मुफ्त बनाने की मांग करने का मतलब है कि आप ग़रीबी को गले लगा रहे हैं. समस्या कीमत नहीं, बल्कि गरीबी है.

सूचानाओं को पैसे में बदलने यानी उसके व्यवसायिकरण से बड़े फायदे होंगे.

लेकिन समस्या ये है कि कई बार आपकी सूचना पर आपका नियंत्रण ही नहीं है.

सरकारी कैमरे आपको शहर में घूमते हुए कैद कर लेंगे, भले ही इस बात पर कितनी ही बहस होती रहे कि सरकार को ऐसा करने का अधिकार है या नहीं. सरकार को छोड़िए, बड़े कंप्यूटरों के मालिक भी यही करते हैं. निजी कैमरे भी आपको सरकार के कैमरे की तरह ही खोजते रहते हैं.

निजता बनाए रखने के नियमों के जरिए प्रयास तो बहुत होते हैं लेकिन उनका कोई खास नतीजा नहीं निकलता है. पता नहीं ये नियम कभी पूरी तरह कारगर होंगे भी या नहीं.

लेकिन अगर आपको उन सूचनाओं के लिए पैसा मिले जो आपकी वजह से हैं, तो कैसा रहेगा? एकाउंटेंट और वकील इसी काम के लिए हैं. सरकार को मुफ्त में आपकी जासूसी करने का अधिकार भला क्यों होना चाहिए?

वैसे अगर बड़े कंप्यूटर को सूचनाओं के लिए भुगतान करना पड़े तो उनका अस्तित्व खत्म नहीं हो जाएगा.

हां, फिर बड़े कप्यूटरों को अपनी कमाई के नए रास्ते तलाशने होंगे. जासूसी और हेराफेरी से अधिक समय तक कारोबार नहीं हो पाएगा, क्योंकि कच्चा माल ज्यादा समय तक मुफ्त में नहीं मिलता है.

दरअसल सूचना को पूरी तरह व्यावसायिक कर दिया जाएगा तो इससे बड़े कंप्यूटर वालों का कारोबार अच्छा चलेगा क्योंकि इससे दुनिया भर की अर्थव्यवस्था में गति आएगी.

दूसरी तरफ अगर सूचनाएं मुफ्त होंगी तो अर्थव्यवस्था सिकुड़ने लगेगी.

लेकिन सबसे जरूरी बात ये है : सूचना के व्यावसायिकरण के बाद सूचना के आदान प्रदान से एक मजबूत मध्यवर्ग उभरेगा. और ये मजबूत मध्य वर्ग खर्च करने के मामले में उच्च वर्ग को पछाड़ देगा.

मुक्त सूचना का विचार यूं तो सबको सशक्त बनाने वाला लगता है लेकिन वास्तव में इससे पैसा वही लोग बना रहे हैं जिनके पास सबसे बड़े कंप्यूटर हैं और ये कहीं न कहीं लोकतंत्र को भी कमजोर कर रहे हैं.

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