देर से सोएगा बच्चा तो पढ़ाई में होगा कमजोर!

  • 11 जुलाई 2013
नींद
Image caption देर से सोना बच्चे के दिमाग पर बुरा असर डालता है.

एक ताज़ा शोध कहता है कि अगर बच्चे रात को देर से सोते हैं तो इससे उनके दिमाग़ पर असर पड़ सकता है.

ब्रिटेन में सोने की आदतों और दिमाग की क्षमता के बीच संबंध पर इस शोध में सात साल की उम्र के 11 हज़ार से ज्यादा बच्चों पर अध्ययन किया गया है.

जिन बच्चों का रात को सोने का कोई नियमति समय नहीं था या जो रात के नौ बजे के बाद सोते थे, वो पढ़ने में और गणित में कमजोर पाए गए.

शोधकर्ताओं का कहना है कि नींद की कमी से एक तरफ तो शरीर की लय बिगड़ सकती है तो दूसरी तरफ नई बातें सीखने की दिमाग की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है.

शोधकर्ताओं ने पहले तीन साल, फिर पांच साल और उसके बाद सात साल की उम्र में नई चीजें सीखने की इन बच्चों की क्षमता पर जानकारी जुटाई और ये जानने की कोशिश भी की कि क्या इस क्षमता का नींद से कोई संबंध है.

लड़कियों पर ज्यादा असर

तीन साल की उम्र में ज्यादातर बच्चे के सोने के समय में बहुत अनियमितता पाई गई. पांच में से लगभग एक बच्चे के सोने का बहुत ही अलग अलग पाया गया.

जब बच्चे सात साल के हुए तो उनमें से आधे आधे बच्चे एक निश्चित समय पर सोने लगे जो शाम साढ़े साथ से साढ़े आठ के बीच था.

मिलाजुला कर देखा गया कि जिन बच्चों के सोने का समय निश्चित नहीं था उनके अंक रीडिंग, गणित और सामान्य ज्ञान की परीक्षा में अपने बाकी साथियों से कम आए.

देर से सोने की आदत का बुरा असर लड़कों से ज्यादा लड़कियों में देखा गया. यह भी पाया गया कि लडकियों में इस तरह की परेशानियां आगे भी रहीं.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन की प्रोफेसर अमांडा सैकर नेतृत्व में शोधकर्ताओं की टीम ने बताया कि यह भी संभव है कि सोने की अनियमित दिनचर्या परिवार में अशांत माहौल के कारण हो.

पारिवारिक माहौल

इन परिस्थितियों में यह कहा जा सकता है कि देर से सोने की आदत की बजाय पारिवारिक कलह या अशांति बच्चे के विकास पर बुरा असर डाल रही है.

Image caption देर से सोने की बुरी आदत का असर लड़कों से ज्यादा लड़कियों में देखा गया.

प्रोफ़ेसर सैकर ने कहा, “हम इन कारणों पर भी सोच विचार कर रहे हैं.”

देर से और अनियमित समय से सोने वाले बच्चे ज्यादातर गरीब परिवारों से आते हैं. ऐसे बच्चे रात को पढ़ने की बजाय टीवी ज्यादा देखते रहते हैं. यह टीवा अकसर उनके बेडरुम में ही लगा होता है.

प्रोफेसर सैकर आगे कहती हैं, “महत्वपूर्ण बात यह है कि एक अच्छी दिनचर्या बच्चों के लिए खास महत्व रखती है. बचपन में ही सोने का एक सही समय तय करना सबसे अच्छा होता है. मगर अब भी देर नहीं हुई है.”

वे यह भी मानती हैं कि इस बात के कोई प्रमाण नहीं है कि जिन बच्चों को समय से पहले सुला दिया गया हो उनका दिमाग ज्यादा तेज़ चलता है.

( बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकतें हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार