पूर्णिमा की रात क्यों नहीं आती है नींद?

  • 29 जुलाई 2013
चंद्रमा

वैज्ञानिकों का मानना है कि पूर्णिमा की रात ठीक से नींद लेने में ख़लल डालती है. प्रयोगशाला में हुए एक प्रयोग के दौरान पूर्णिमा के दिन नींद में पांच मिनट ज़्यादा समय लगा और लोग 20 मिनट कम सोए.

प्रयोगशाला की कठिन परिस्थितियों में 33 स्वयंसेवकों पर किए गए इस प्रयोग के दौरान चंद्रमा के प्रभाव संबंधी साक्ष्य जुटाए गए हैं.

'करेंट बायोलॉजी' में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ जब चांद पूरा था, तो स्वयंसेवकों को नींद आने और अच्छी तरह नींद लेने में वक़्त लगा, जबकि बंद अंधेरे कमरे में उन्हें अच्छी नींद आई.

प्राकृतिक घड़ी

इस दौरान उनके शरीर की जैविक घड़ी से जुड़े मेलटोनिन नाम के हार्मोन स्तर में भी कमी देखी गई. अंधेरे में शरीर में अधिक मेलटोनिन बना जबकि उजाले में इसके निर्माण में कमी आई.

शाम के चमकीले प्रकाश या दिन का थोड़ा कम प्रकाश शरीर के सामान्य मेलटोनिन चक्र पर असर डाल सकता है.

स्विट्जरलैंड के बेसल विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर क्रिश्चियन कैजोहेन और उनके साथियों के इस अध्ययन में यह सुझाव दिया गया है कि चंद्रमा का प्रभाव इसकी चमक से संबंधित नहीं हो सकता.

इसमें शामिल स्वयंसेवक इस बात से अनजान थे कि इस अध्ययन का उद्देश्य क्या है. उन्हें प्रयोगशाला में जिस बिस्तर पर सुलाया गया था, वहाँ से वे चंद्रमा को नहीं देख सकते थे.

इनमें से हर स्वयंसेवक ने प्रयोगशाला में दो रातें बिताईं. अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि पूर्णिमा की रात गहरी नींद से जुड़ी दिमाग़ी गतिविधियाँ घटकर आधी रह गईं. मेलटोनिन का स्तर भी गिर गया.

छोटा अध्ययन

प्रोफ़ेसर क्रिश्चियन कैजोहेन कहते हैं,''चंद्रमा की गति इंसान की नींद पर असर डालती हुई लगती है. यह तब भी होता है कि जब कोई चांद को देखता भी नहीं है और उसे यह भी नहीं पता होता कि चांद किस अवस्था में है.''

शोधकर्ताओं के मुताबिक़ हो सकता है कि कुछ लोग चंद्रमा के लिए बहुत अधिक संवेदनशील हों.

उन्होंने यह अध्ययन चंद्रमा का प्रभाव जानने के लिए नहीं किया था. इसके विश्लेषण का ख़्याल उन्हें बाद के सालों में आया. उन्होंने पुराने आंकड़े लिए. उनका विश्लेषण किया कि जब लोग प्रयोगशाला में सोए थे तो उस रात पूर्णिमा थी या नहीं.

ब्रिटेन के नींद विशेषज्ञ डॉक्टर नील स्टेनली का कहना है कि छोटा अध्ययन होने के बावजूद इसके नतीजे महत्वपूर्ण हैं.

वो कहते हैं,''पूर्णिमा को लेकर कई कहानियाँ है. इसलिए अगर उनका कोई प्रभाव पड़ता है, तो उस पर ताज्जुब नहीं होना चाहिए. अब यह विज्ञान पर है कि वह यह पता लगाए कि पूर्णिमा पर हमारे अलग-अलग ढंग से सोने का कारण क्या है.''

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