क्या ट्यूमर बना सकता है सेक्स अपराधी?

  • 15 अगस्त 2013
स्वतंत्र इच्छा, ट्यूमर, दिमाग़

हम सभी को लगता है कि अपने कार्यकलापों पर हमारा नियंत्रण है मगर दिमाग़ में एक ट्यूमर या चोट हमारे व्यक्तित्व को पूरी तरह बदल सकती है. तो इससे स्वतंत्र इच्छा के बारे में क्या पता चलता है.

अगर आप किसी जिम में जाकर क्रिस्प के पैकेट के साथ टेलिविज़न के आगे बैठें तो आप क्या करेंगे? वर्ज़िश करेंगे या फिर क्रिस्प खाएंगे?

हम सभी के मन में ऐसे सवाल उठते हैं. हमें तय करना होता है कि हमें वर्ज़िश के लिए जिम जाना है, मगर असल में हम स्वादिष्ट नमकीन स्नैक खाने के लिए मचल रहे होते हैं. इसके बाद अक्सर हमारे अंदर ख़ुद से नफ़रत के भाव पैदा होते हैं.

न्यूरोसाइंटिस्ट और साइकोलॉजिस्ट इंसान की चाहत और उसकी प्रेरणा को समझने के लिए काफ़ी मेहनत कर रहे हैं. कमज़ोरी या इच्छा-जब हम असल में नहीं खाना चाहते तब क्रिस्प खाना ऐसा ही एक वाकया है.

दूसरी चीज़ है लत, चाहे वह जुए की हो, सेक्स की हो या सिगरेट-शराब की. हमारी भूख को उजागर करने वाली मानसिक घटनाओं के बारे में वैज्ञानिकों ने काफ़ी कुछ जान लिया है.

हमारे फ़ैसले करने की क्षमता में अवचेतन मन की मान्यता भी बढ़ रही है. हमें शायद इसकी जानकारी न हो कि हमारे आसपास कोई ख़ुशबू या आवाज़ का हम पर असर होता है. कुछ न्यूरोसाइंटिस्ट का यहां तक दावा है कि दिमाग़ के काम करने के ढंग का अध्ययन करके वो छह से सात सेकेंड पहले आपके उन फ़ैसलों के बारे में बता सकते हैं, जो आप लेने वाले हैं.

इन सभी चीज़ों से दार्शनिकों के लिए सवाल खड़े हो गए हैं. पहला तो यह कि इंसान की फ़ैसले करने की क्षमता की जानकारी से स्वतंत्र इच्छा का क्या होगा? क्या वैज्ञानिक प्रगति स्वतंत्र इच्छा को लेकर हमारी समझ को कमज़ोर बनाएगी? क्या इसका नतीजा यह होगा कि स्वतंत्र इच्छा एक भ्रम है?

अंडे जितना ब्रेन ट्यूमर

एक दशक पुराने एक मामले का ज़िक्र भी करते चलें.

40 साल के एक स्कूल टीचर में अचानक देखने में आया कि वह बच्चों के साथ अनियंत्रित यौन उत्पीड़क व्यवहार करने लगे थे. डॉक्टरों को जांच में पता चला कि उनके दिमाग़ के दायें हिस्से में अंडे के आकार का एक ट्यूमर विकसित हो गया था.

दिमाग़ के इस हिस्से यानी ऑर्बीफ्रंटल कॉर्टेक्स का काम है निर्णय लेना, अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना और सामाजिक व्यवहार से संबंधित है. डॉक्टरों ने जैसे ही ट्यूमर को निकाला, स्कूल टीचर का यौन व्यवहार पूरी तरह थम गया. यह मरीज़ इस समस्या से पहले अच्छा व्यवहार करता था. ज़्यादातर बाल यौन उत्पीड़कों की समस्याएं उनके बचपन से जुड़ी होती हैं.

कभी शादीशुदा एक अधेड़ शख़्स में अचानक चाईल्ड पोर्नोग्राफ़ी (बच्चों से जुड़ा अश्लील साहित्य) और वैश्यावृत्ति के प्रति झुकाव पैदा हो गया. अब तक इस आदमी में सेक्स को लेकर कोई ऐसी प्रवृत्ति नहीं देखी गई थी. जब हालात खराब हुए तो उनकी पत्नी चिंतित हो गईं.

जब इस शख़्स ने अपनी बेटी की तरफ़ क़दम बढ़ाए तो पत्नी ने पुलिस को सूचित कर दिया. थेरेपी देने के बावजूद उनके पति के व्यवहार में सुधार नहीं हुआ. वास्तव में उन्होंने थिरेपी सेंटर में आने वाली महिलाओं का ही उत्पीड़न शुरू कर दिया.

लगा कि अब उन्हें जेल जाना ही पड़ेगा. मगर जब उन्हें अदालत जाना था, उससे पहले ही उन्हें सिरदर्द शुरू हो गया. उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां जांच में पता चला कि उनके दिमाग़ में बड़ा ट्यूमर है. जैसे ही यह ट्यूमर निकाला गया, उनका व्यवहार सामान्य हो गया.

इस कहानी में फिर मोड़ आया. कुछ महीने बाद उनका पुराना व्यवहार फिर शुरू हो गया. जांच में पता चला कि ट्यूमर पूरी तरह से नहीं निकाला जा सका था. दूसरे ऑपरेशन के बाद फिर उनका व्यवहार सामान्य होने में मदद मिली.

ट्यूमर ज़िम्मेदार?

इस मामले में बहुत से लोगों को लगेगा कि शायद सेक्स को लेकर यह शख्स अपने व्यवहार में आज़ाद नहीं थे. असल में वह थे और इसके लिए ज़िम्मेदार था ट्यूमर.

तो आखिर क्यों एक शारीरिक गड़बड़ी यानी ट्यूमर दूसरे से अलग होता है. हो सकता है कि भविष्य में न्यूरोसाइंटिस्ट को अदालतों में जाना पड़े और अपराध की वजह समझानी पड़ें. मिसाल के लिए, ‘इस शख़्स को दुकान से चोरी के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. इसकी वजह इसके शरीर में डोपामाइन की मात्रा का ज़्यादा होना है.’ इस बात के सुबूत हैं कि पर्किंसंस के इलाज के लिए दी जाने वाली दवा डोपामाइन के इस्तेमाल से भावनाओं पर काबू पाने, सेक्स या जुए की समस्याएं सामने आती हैं.

खोपड़ी में छेद वाला इंसान

अमरीकी रेलवेकर्मी फिनिआस गेज ने न्यूरोसाइंस के अध्ययन को 1848 में पूरी तरह बदल दिया जब काम करते हुए उनके सिर में एक लोहे की रॉड घुस गई. यह रॉड उनकी खोपड़ी के ऊपरी हिस्से से बाहर निकल गई.

इसके बाद दूसरों पर निर्भर गेज भरोसेमंद नहीं रह गए. काम करने में भी वह अक्षम हो गए. यह पहला सुबूत था कि दिमाग़ को होने वाले नुकसान का असर व्यवहार और व्यक्तित्व पर पड़ता है.

तब से तक़रीबन हर प्रमुख दार्शनिक ने स्वतंत्र इच्छा पर चल रहे विवाद को लेकर कुछ न कुछ कहा ही है. चाहे वह कांट हों या शॉपेनहावर या फिर नीत्शे या सार्त्र. मुख्य रूप से इस मामले में दो तरह के खेमे बने हुए हैं. इनके अलावा 18वीं सदी के स्कॉट डेविड ह्यूम की तरह दार्शनिक हैं जो मानते हैं कि स्वतंत्र इच्छा नियतिवाद से जुड़ा है और इस बात से जुड़ा है कि हमारे सभी कार्यों का कोई न कोई कारण होता है. ह्यूम के अलावा दूसरे दार्शनिक भी हैं जो मानते हैं कि ऐसा नहीं है.

बहस-मुबाहिसों के अलावा स्वतंत्र इच्छा से आरोप और प्रशंसा के सवाल भी जुड़े हैं. अगर हमारे कार्य मुक्त नहीं हैं तो उनके लिए हमें कैसे ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है या हमारी प्रशंसा की जा सकती है.

एसेक्स यूनिवर्सिटी के दार्शनिक प्रो. वायेन मार्टिन कहते हैं, ‘स्वतंत्र इच्छा के विचार पर संदेह करने वालों का दावा है कि यह तत्वमीमांसा का समर्थन है ताकि हम लोगों को सज़ा देने की अपनी आदत का समर्थन कर सकें.’

इच्छा की कमज़ोरी इस बहस में कहां फिट होती है. अमरीकी दार्शनिक हैरी फ्रैंकफ़र्ट ने आज़ादी के बारे में 1970 के दशक में एक बेहद असरदार लेख लिखा. उन्होंने इसमें कहा कि हमारी सैकड़ों तमन्नाएं होती हैं. मीठा या नमकीन खाने की इच्छा या फिर वज़न कम करने की इच्छा. ये हमारी पहले दर्जे की इच्छाएं हैं. मगर ऊंचे दर्जे की इच्छाएं भी होती हैं.

खाएं या न खाएं?

मार्टिन के मुताबिक़, ‘मेरी ऊंचे दर्जे की तमन्नाएं असल में यह तय करती हैं कि पहले दर्जे की कौन सी इच्छाओं को मैं कार्यरूप में बदलना चाहता हूं. और फ्रैंकफ़र्ट स्वतंत्र इच्छा को पहले दर्जे की इच्छाओं पर नियंत्रण की तरह देखते हैं.’

दूसरे शब्दों में मैं तभी स्वतंत्र इच्छा यानी फ्री विल का स्वामी होऊंगा जब मेरा अपनी पहले दर्जे की इच्छाओं पर अनुशासन हो. अगर मेरी ऊंचे दर्जे की इच्छा वज़न कम करने की है और मुझे जिम जाना है तो क्या मैं इसे रोकने वाली चीज़ों पर काबू पा सकता हूं. तो अब वो नमकीन क्रिस्प कहां हैं?

(बीबीसी रेडियो फ़ोर के प्रोग्राम द फ़िलॉस्फ़र्स आर्म्स के लिए डेविड एडमंड्स)

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