तांबे के ज़्यादा सेवन से अल्ज़ाइमर का ख़तरा?

तांबे की धातु

लंबे समय तक भोजन में तांबे का अधिक सेवन अल्ज़ाइमर बीमारी की वज़ह बन सकता है.

यह कहना है अमरीकी वैज्ञानिकों का जिन्होनें चूहों पर अपने प्रयोग के बाद ताज़ा शोध अध्ययन में यह जानकारी दी.

नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेस ने कहा कि तांबे की अधिक मात्रा के कारण मस्तिष्क को उस प्रोटीन को कम करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है जिसे मनोभ्रंश (डिमेंशिया) का प्रमुख कारण माना जाता है.

शोध के निष्कर्ष पर वैज्ञानिकों के बीच बहस जारी है क्योंकि कुछ अन्य शोधों का कहना है कि "तांबा वास्तव में मस्तिष्क की सुरक्षा करता है."

हमारे रोज़मर्रा के आहार का तांबा प्रमुख हिस्सा है. इसे स्वस्थ शरीर के लिए आवश्यक माना जाता है.

'अधिक सेवन से नुकसान'

तांबे के पाइप से आने वाला टोटी का पानी, लाल मांस, शेल फिश और सब्ज़ियां भोजन में तांबे के प्रमुख स्त्रोत हैं.

तांबे के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए न्यूयॉर्क की रॉशेस्टर यूनिर्वसिटी में वैज्ञानिकों ने चूहों पर शोध किया. इस टीम ने पाया कि तांबा दिमाग़ के रक्षा करने वाले तंत्र में हस्तक्षेप करता है.

जिन चूहों को पानी में घोलकर ज़्यादा तांबा दिया गया. उनके दिमाग़ की रक्त वाहिनियों में तांबे की मात्रा बढ़ गई और उनके दिमाग़ की सक्रियता प्रभावित हुई.

वैज्ञानिकों का कहना है कि दिमाग़ की झिल्ली के काम करने के तरीके पर असर पड़ा. इसके साथ-साथ चूहों के दिमाग़ का बीटा एम्लॉयड के उस प्रोटीन से छुटकारा पाना कठिन हो गया, जो मनोभ्रंश (डिमेंशिया) का प्रमुख कारण है.

अल्ज़ाइमर की एक विशेषताइसमें धीरे-धीरे मर रहे दिमाग़ में एम्लॉयड की परत का बनना है.

प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर राशिद डीन का कहना है, "यह स्पष्ट है कि तांबे का मिलाजुला असर मस्तिष्क की उस व्यवस्था पर पड़ता है जिसके तहत एम्लॉयड बीटा को दिमाग़ से बाहर निकाला जाता है."

Image caption सब्ज़ियां भी भोजन के रास्ते शरीर को मिलने वाले तांबे की मात्रा की प्रमुख स्त्रोत हैं.​

'विपरीत साक्ष्यों की मौजूदगी'

डॉक्टर राशिद ने बीबीसी को बताया कि तांबे के कारण ही दिमाग़ में मनोभ्रंश (डिमेंशिया) पैदा करने वाले प्रोटीन का अधिक उत्पादन शुरू हो जाता है. इससे दोहरी बाधा उत्पन्न होती है.

एक तरफ अम्लॉयड प्रोटीन का उत्पादन बढ़ जाता है और दूसरी तरफ इस प्रोटीन की मस्तिष्क से सफ़ाई की गति भी धीमी पड़ जाती है.

डॉक्टर राशिद डीन कहते हैं, "तांबा शरीर के लिए काफी महत्वपूर्ण खनिज है और आप नहीं चाहते कि शरीर में इसकी कमी हो. कई पोषक खाद्य पदार्थों में तांबे की मात्रा पाई जाती है."

हालांकि इसका सप्लीमेंट लेना शरीर की ज़रूरत से ज़्यादा हो सकता है.

लेकिन ताज़ा शोध में मिले-जुले सबूतों की मौजूदगी का संकेत मिलता है.

कील यूनिवर्सिटी में बायो-इनआर्गेनिक केमेस्ट्री के प्रोफ़ेसर क्रिस एक्सले कहते हैं कि तांबे की अल्ज़ाइमर में भूमिका को लेकर "कोई वास्तविक सहमति" नहीं बन पाई है.

इंसानी दिमाग़ पर अपने शोध में उन्हें उल्टे ही सबूत मिले.

क्रिस एक्सले कहते हैं, "हमें ताज़ा शोध में पता चला कि तांबे की कम मात्रा से उम्र बढ़ती है और अल्ज़ाइमर होती है."

उन्होंने पाया कि "अगर मस्तिष्क में तांबे की मात्रा कम है तो मस्तिष्क के ऊतकों में एम्लॉयड का ज़्यादा उत्पादन होता है."

'और अध्ययन की जरूरत'

क्रिस एक्सले कहते हैं, "अभी हम उम्मीद करेंगे कि तांबे से सुरक्षा मिलती है और उम्र बढ़ने से रोकने में ये मददगार है, न कि ये उम्र बढ़ाता है, लेकिन हम नहीं जानते."

ब्रिटेन के अल्ज़ाइमर रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉक्टर एरिक कैरन कहते हैं, "इस शोध से संकेत मिलते हैं कि किस तरह तांबा चूहों में अल्ज़ाइमर के लक्षण पैदा कर सकता है लेकिन ये नतीजे दूसरे अध्ययनों में भी दिखने चाहिए.

डॉक्टर एरिक कैरन का कहना है, "अभी ये जानना जल्दबाज़ी होगी कि कैसे तांबे की सामान्य मात्रा अल्ज़ाइमर को बढ़ावा देती है."

एल्ज़ाइमर सोसायटी के डॉक्टर डाउग ब्राउन कहते हैं, "तांबा शरीर के लिए अहम खनिज है, लोगों को इस शोध को सावधानी के साथ लेना चाहिए और अपने ख़ाने से तांबे को हटाना नहीं चाहिए."

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