क्या खब्बू लोग जल्दी मरते हैं?

खब्बू, बाएं हाथ से काम करने वाले, मौत

कहा जाता है कि दाएं हाथ का इस्तेमाल करने वाले लोग बाएं हाथ का इस्तेमाल करने वालों से नौ साल ज़्यादा जीते हैं. बाएं हाथ का इस्तेमाल करने वाले यानी खब्बू माता-पिता की बेटी होने और खब्बू भाई की बहन होने के नाते मेरे लिए यह चिंता में डालने वाला ख़्याल है. मगर क्या इसमें सच है भी?

1980 के दशक के आख़िर और 1990 के दशक की शुरुआत में अमरीकी मनोवैज्ञानिकों डाएन हैल्पर्न और स्टेनले कॉरेन ने अपने दो लेखों के ज़रिए इसकी पड़ताल की. दोनों लेख काफ़ी जाने माने वैज्ञानिक जर्नल्स नेचर और न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन में छपे थे.

मगर खब्बू लोगों की अकाल मृत्यु की क्या संभावित व्याख्या हो सकती है?

क्या इसकी वजह यह है कि उनके हाथ-पैर कुदरत के रवैये के विपरीत काम करते हैं?

दक्षिण इंग्लैंड के हैंपशायर की क्लेयर एलेन कहती हैं, ‘चाकू बेहद भौंडी चीज़ हैं. ये सीधे हाथ वालों के हिसाब से बनाए गए हैं. अगर आप उसे बाएं हाथ से इस्तेमाल में लाते हैं तो वो हमेशा तिरछा काटते हैं, जबकि सीधे हाथ से काम करने वाले के लिए ये सीधा काटते हैं.’

मुझे पता है कि मेरी मां बाएं हाथ वाली सिलाई कैंचियों के बिना अक्सर परेशान हो जाया करती थीं. मगर ऐसी चीज़ें किसी इंसान की उम्र क़रीब एक दशक तक कम करने के लिए ज़िम्मेदार नहीं हो सकतीं.

‘यह बिल्कुल सच नहीं’

Image caption खब्बू यानी बाएं हाथ से काम करने वालों की मौत को लेकर 1990 के दशक के शुरुआत में दो मेडिकल आलेख छपे थे.

यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर और ‘राइट हैंड, लैफ़्ट हैंड’ के लेखक क्रिस मैकमैनस कहते हैं, ‘यह बिल्कुल सच नहीं है.’

‘अगर यह सच होता तो यह किसी इंसान की उम्र तय करने का सबसे बड़ा पैमाना होता. यह बिल्कुल ऐसा होता जैसे आप एक दिन में 120 सिगरेट पी रहे हैं और दूसरे कई ख़तरनाक काम भी एक साथ कर रहे हैं. यह बिल्कुल अविश्वसनीय है कि किसी महमारी की जांच करने वाले वैज्ञानिक को कभी इसका पता ही न चला होता.’

अगर यह इतना अविश्वसनीय है तो इतने स्थापित शैक्षणिक जर्नल्स में ये लेख क्यों छापे गए और यह मिथक अब तक जारी क्यों है?

क्रिस मैकमैनस के मुताबिक इसकी वजह है कि शोधकर्ताओं ने ‘बेहद सूक्ष्म ग़लती’ की थी.

शोधकार्य दक्षिणी केलीफ़ोर्निया में हुआ था जहां हर मृत शख़्स की सूची मौजूद है.

हैल्पर्न और कॉरेन ने उन लोगों की सूची ली जिनकी हाल ही में मौत हुई थी और उनके परिवारों से संपर्क किया. उनसे पूछा गया कि उनके रिश्तेदार दाएं या बाएं हाथ से काम करते थे.

क़रीब दो हज़ार मामलों में उन्होंने पाया कि बाएं हाथ से काम लेने वालों यानी खब्बुओं की मौत के वक़्त औसत उम्र दाएं हाथ से काम लेने वालों के मुक़ाबले क़रीब नौ साल कम थी. इस आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि खब्बू जल्दी मौत का शिकार बने.

शोधकर्ताओं ने की ग़लती

पहली नज़र में यह बात काफ़ी समझदारी की लगती है. तो फिर शोधकर्ताओं ने ग़लती कहां की?

क्रिस मैकमैनस कहते हैं, ‘उनकी ग़लती यह थी कि उन्होंने सिर्फ़ मृतकों के आंकड़ों की बात की.’

अहम बात यह है कि आज खब्बू लोगों की संख्या पहले के मुक़ाबले ज़्यादा है, इसलिए जब यह शोध छपा था तो खब्बू लोग औसतन दाएं हाथ वालों के मुक़ाबले छोटे थे.

‘बाएं हाथ से काम करने वालों की क़ुदरती दर 10-11 फ़ीसदी है, मगर विक्टोरियन युग में इसे कृत्रिम तौर पर कम कर दिया गया था.’

क्रिस मैकमैनस कहते हैं, ‘आप 1800 से 1900 के बीच इसे गिरता हुआ पाते हैं.’

इस काल में खब्बुओं को आगे बढ़ने से रोका तो गया ही, उनके लिए ज़िंदगी काफ़ी मुश्किल भरी थी और वो जल्द ही विशिष्ट हो गए.

मैकमैनस बताते हैं, ‘फैक्ट्रियों में वो उन मशीनों पर काम करते थे जो सीधे हाथ वालों के लिए बनाई गई थीं और बाएं हाथ से काम लेने वालों को यह अजीब लगता था.’

‘इसके बाद अनिवार्य स्कूलिंग शुरू हुई. उन्हें कक्षाओं में बैठने तो दिया गया पर उन्हें सीधे हाथ से स्याही वाले पैन से लिखने को कहा जाता था और वो उसे गड़बड़ कर देते थे. नतीजा यह हुआ कि खब्बू लोगों को कलंकित किया जाने लगा और उन्हें मूर्ख समझा जाने लगा.’

इसलिए केलीफ़ोर्नियाई सूचियों में दर्ज मृतकों में से कई खब्बू बेशक पैदा हुए हों मगर उन्होंने अपना ज़्यादातर जीवन दाएं हाथ के लोगों की तरह काम करने और दिखने की कोशिश में बिताया था. जब शोधकर्ता उनके परिवारों के पास पहुंचे तो उन्होंने भी उनके बारे में ऐसे ही ख़्याल जताए थे.

इसके चलते शोधकर्ताओं के नतीजे गड़बड़ हो गए.

20वीं सदी में बढ़े खब्बू

इसकी वजह समझने के लिए थोड़ी देर के लिए आप मान लें कि 40 साल पूर्व यानी 1973 से पहले कोई खब्बू पैदा नहीं हुआ.

अब अगर हम 2013 का मृत्यु रिकॉर्ड देखें और जानने की कोशिश करें कि इनमें से कौन इंसान खब्बू था तो हमें पता चलेगा कि इनमें से सभी क़रीब 40 साल की उम्र में या उससे पहले मर गए. यह दाएं हाथ वालों की मौत के समय उम्र से काफ़ी कम होगा.

असल में ऐसी स्थिति कभी वास्तव में सामने नहीं आई है - लेकिन 20वीं सदी में ख़ुद को खब्बू कहने वालों लोगों की तादाद अचानक तेज़ी से बढ़ी है.

इसलिए यह मानना कि खब्बू यानी बाएं हाथ का प्रयोग करने वाले दाएं वालों के मुक़ाबले नौ साल पहले मर जाते हैं एक मिथक है.

ऐसे में कम घातक चोटों के बारे में क्या कहेंगे? क्या हमें क्लेयर एलन जैसे लोगों के बारे में चिंतित होना चाहिए जो अपनी रसोई में उन चाकुओं से जूझते हैं जिन्हें सीधे हाथ वालों के हिसाब से बनाया गया है?

क्रिस मैकमैनस कहते हैं, ‘कुछ सुबूत मौजूद हैं कि बाएं हाथ से काम करने वाले अपेक्षाकृत छोटी दुर्घटनाओं के ज़्यादा शिकार होते हैं. मगर यह पर्याप्त नहीं है और मुझे संदेह है कि इसका मृत्युदर पर कोई बहुत बड़ा असर होता होगा.’

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार