डिजिटल इंडियंस: मैगज़ीन पीछे से पढ़ते लोगों ने दिया बिज़नेस आइडिया

संजीव बिखचंदानी

संजीव बिखचंदानी ने अपने स्कूल के दिनों से ही इस बात को लेकर मन बना लिया था कि वह नौकरी नहीं करना चाहते. मगर विडंबना देखिए कि वही बिखचंदानी अब लाखों भारतीयों को नौकरी ढूँढ़ने में मदद कर रहे हैं.

आज भारत के सबसे सफल डिजिटल उद्यमियों में से एक और देश में नौकरी खोजने वाली सबसे बड़ी वेबसाइट चला रहे बिखचंदानी कहते हैं कि आम लोगों की तरह उनके सामने भी कई विकल्प थे मगर अंत में उन्होंने जो राह चुनी, सफलता उसी का नतीजा है.

उनका, देश के सबसे प्रमुख इंजीनियरिंग स्कूल में दाख़िला हुआ मगर उसे ठुकराकर उन्होंने दिल्ली के सेंट स्टीफ़ंस कॉलेज में अर्थशास्त्र पढ़ना तय किया क्योंकि वह ‘कम अवधि का कोर्स’ था.

पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी कर ली. दो साल बाद जब उन्हें वहाँ सारी चीज़ें समझ में आ गईं और नौकरी आराम की हो गई तो उन्होंने नौकरी छोड़ दी.

पढ़ाई के बाद उन्हें नौकरी ही करनी चाहिए- ये उनका अपना चुना रास्ता नहीं था बल्कि उनके सरकारी डॉक्टर पिता, मध्यवर्गीय पड़ोसी और पढ़ाई के तौर तरीक़े- सभी ने एक तरह से उन्हें इसी ढर्रे पर आगे बढ़ाया.

मगर बिखचंदानी ने एक खाने की मेज़ से अपना बिज़नेस शुरू किया और फिर नौकरों के क्वॉर्टर को अपना पहला ऑफ़िस बनाया.

नौकरियों की माँग

आज इंफ़ो एज देश में सबसे ज़्यादा फ़ायदे में चल रहा वेब बिज़नेस है.

इस कंपनी में लगभग ढाई हज़ार कर्मचारी हैं. ये कंपनी नौकरी डॉटकॉम नाम की वेबसाइट चलाती है. साथ ही इसने ज़मीन-जायदाद के अलावा शिक्षा और शादी कराने वाली वेबसाइटें भी खोली हैं.

कंपनी में बिखचंदानी का जो 34 फ़ीसदी शेयर है उसकी क़ीमत 1100 करोड़ रुपए है.

बिखचंदानी बताते हैं कि सफल बिज़नेस दरअसल ‘अपने उपभोक्ता की ज़रूरत की बेहतर समझ’ पर निर्भर करता है.

उन्होंने ख़ुद ये कैसे किया? इसका उदाहरण देखिए- वह जिस बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करते थे वहाँ उन्होंने देखा कि जब कोई बिज़नेस पत्रिका आती है तो लोग आगे से पढ़ने के बजाए पीछे से पढ़ना शुरू करते हैं.

संजीव बताते हैं, “दरअसल पीछे से 40 पन्ने नौकरियों के होते थे. लोगों के लिए समाचार या फ़ीचर से ज़्यादा लुभावना नौकरी का विज्ञापन था.”

बिज़नेस की पत्रिका यूँ पढ़ते लोगों की तस्वीर उनके मन में घर कर गई और जब उन्होंने 1996 में दिल्ली में एक व्यापार शो में इंटरनेट देखा तो उनके जेहन में वो तस्वीर बरक़रार थी.

इंटरनेट

वह बताते हैं, “मैंने एक छोटा स्टॉल देखा, जिस पर लिखा था डब्ल्यू डब्ल्यू डब्ल्यू. मुझे वो देखकर और जानने की रुचि जगी. वहाँ मौजूद व्यक्ति ने बताया कि ये ई-मेल है. ई-मेल के बारे में जानकर कुछ मज़ा नहीं आया, मैंने सोचा कि मुझे किसे मेल भेजनी है?”

इसके बाद उस व्यक्ति ने बिखचंदानी को इंटरनेट दिखाया. उनके अनुसार, “वह मुझे याहू पर ले गया और सर्च बॉक्स में भारत डालकर इंटरनेट पर खोजा. तब मेरे दिमाग़ में बत्ती जली कि यहाँ मैं सारी नौकरियाँ एक साथ पोस्ट कर सकता हूँ.”

नौकरी डॉटकॉम की शुरुआत मार्च 1997 में हुई थी. बिखचंदानी के भाई कैलिफ़ोर्निया में एक प्रोफ़ेसर थे और उन्होंने एक वेबसर्वर लेने के लिए 25 डॉलर की फ़ीस जमा करके बिखचंदानी की मदद की.

नौकरी की वो वेबसाइट चल निकली. पहले साल में उनके पास 2,40,000 रुपयों की कमाई आई और अगले साल वो सात गुना हो गई.

बिखचंदानी को लगा कि उन लोगों के हाथ में सोने की मुर्गी लग गई है. उन्होंने बताया, “हमने बाक़ी सब कुछ छोड़कर नौकरी पर फ़ोकस करना शुरू कर दिया.”

उनकी साइट पर अख़बारों से नौकरियाँ लेकर छाप दी जाती थीं. लोगों ने कंपनियों में ये कहकर अर्ज़ियाँ भेजनी शुरू कर दीं कि “हमने आपकी नौकरी के बारे में नौकरी डॉटकॉम पर देखा.”

इसके बाद कंपनियों के मानव संसाधन यानी एचआर विभागों से उनके पास फ़ोन आने लगे. फिर इस वेबसाइट पर 350 रुपए में नई नौकरी या पूरे साल भर में 6,000 रुपए में जितनी चाहें उतनी नौकरियाँ लगाने का ऑफ़र दिया गया, और लोगों ने भुगतान शुरू भी कर दिया.

निवेशकों का पैसा

कुछ समय बाद 1999 में उन लोगों के पास निवेशकों के फ़ोन आने लगे जो कंपनी में पैसा लगाने के लिए तैयार थे. शुरू में तो उन्होंने ये मना कर दिया मगर तब बड़ी लागत के साथ बाज़ार में प्रतियोगिता शुरू हुई.

वह बताते हैं, “प्रतियोगियों के शुरुआती विज्ञापन या उसकी क़ीमत हमारी सालाना कमाई की दोगुना थी. खेल बदल गया था. हम पूरी तरह ख़त्म किए जा सकते थे. हम अपने निवेशकों के पास तब वापस गए.”

इन लोगों को पूँजी मिल गई मगर उसके कुछ ही समय बाद डॉटकॉम की दुनिया में बड़ी मंदी आ गई. उसके बाद दो वर्षों तक इंफ़ो एज को नुक़सान हुआ.

वह बताते हैं, “वो तो होना ही था. फिर हमने अपनी लागत निकालनी शुरू की. इसके बाद तीन वर्षों में हम 30 गुना बढ़े और हमने मुनाफ़ा कमाना शुरू किया.”

कंपनी ने 2006 में अपना आईपीओ निकाला.

फिर बिखचंदानी ने औरों को भी इसके लिए राज़ी किया कि वे बड़ी-बड़ी कंपनियों से नौकरी छोड़कर उनके साथ काम करें.

वह कहते हैं, “लोग आते हैं अगर उन्हें आपमें भरोसा हो तो.”

जिन लोगों ने उन पर भरोसा किया उनमें हितेश ओबरॉय थे जो हिंदुस्तान लीवर से आए और आज नौकरी के सीईओ हैं.

नई कंपनियों के साथ काम

बिखचंदानी अब रोज़मर्रा के काम से दूर हो चुके हैं और अपने पहले प्यार के साथ हैं, ये है नई शुरू होती कंपनियों के साथ मिलकर काम करना.

वह कहते हैं, “मैं अब नई कंपनियों के साथ मिलकर काम कर रहा हूँ. मुझे युवा उद्यमियों से मिलना, उनसे बातें करना पसंद है. उनके पास नए आइडिया होते हैं और वे अक़सर मुझसे ज़्यादा स्मार्ट होते हैं तो मैं उनसे काफ़ी कुछ सीख भी लेता हूँ. कभी-कभी मैं उनकी मदद भी करता हूँ.”

इंफ़ो एज से बाहर बिखचंदानी अशोका विश्वविद्यालय के साथ भी काम कर रहे हैं. दस उद्यमियों ने मिलकर ये काम शुरू किया है जिसमें कोई मुनाफ़ा कमाने के लिए काम नहीं कर रहा है.

अशोका के तहत चार साल का स्नातक कार्यक्रम चलाया जा रहा है जो अमरीकी मॉडल पर आधारित है.

वह बताते हैं, “हम एक ऐसा संस्थान बनाना चाहते हैं जिसकी दूसरे लोग नक़ल करें और भारत में कॉलेज की पढ़ाई का तरीक़ा बदले.”

उनसे चार घंटे लंबी चली बातचीत के बाद मुझे लगा कि वह कुछ शब्दों का इस्तेमाल काफ़ी ज़्यादा करते हैं और ज़्यादातर उद्यमी उन शब्दों से परहेज़ करते हैं जैसे- इनोवेशन, पैसा, बढ़ोत्तरी, कम ख़र्चीला.

भारत के सबसे प्रमुख डिजिटल उद्यमियों में से एक इसी तरह की दुनिया में रहते हैं. वह अपनी पुरानी ओपेल एस्ट्रा से नई होंडा अकॉर्ड में काफ़ी सालों के बाद आए. अपने दफ़्तर में उनके बैठने की जगह कोई बहुत बड़ी नहीं है.

इंफ़ो एज का आठ मंज़िला मुख्यालय काफ़ी बड़ा है मगर उसका कलेवर कम ख़र्चीला और लगातार काम करने वाला है.

मैंने जब उनसे विफलता के बारे में पूछा तो कम ख़र्च की बात फिर सामने आई, “विफल होने का डर अच्छा है. ये आपको हमेशा चौकस रखता है. इसके चलते आप सफलता के लिए ज़्यादा कड़ी मेहनत करते हैं. पर अगर आप फ़ेल हो जाते हैं और आपने ज़्यादा ख़र्च नहीं किया होगा तो आप फिर से शुरू कर सकते हैं.”

मगर इतने उतार चढ़ाव के बीच और उन वर्षों में जब वह कुछ भी नहीं कमा रहे थे तो क्या उन्होंने कभी ये सब छोड़ने के बारे में सोचा?

वह बताते हैं, “कभी नहीं. आप तब तक विफल उद्यमी नहीं हैं जब तक आप वो काम छोड़कर कुछ और नहीं करने लगते. जब तक आप मेहनत करना जारी रखे हैं तब आप ऐसे उद्यमी हैं जो बस अभी तक सफल नहीं हुआ है.”

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