डिजिटल इंडियंस: इनफ़ोसिस छोड़ जो बना 'आधार' स्तंभ

नंदन नीलेकणी

नंदन नीलेकणी ने जब चार साल पहले भारत की एक अरब आबादी में से आधों को पहचान पत्र दिलाने की एक योजना शुरू की तो उनके सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा था.

तक़रीबन 120 अरब रुपए की लागत वाली ये परियोजना दुनिया की सबसे बड़ी बायोमेट्रिक परियोजना भी थी. सूचना प्रौद्योगिकी दुनिया में करिश्माई व्यक्तित्व की तरह जाने जाते रहे नीलेकणी ने इस परियोजना का काम सँभाला.

मगर उनके सामने इस परियोजना के ज़रिए निजी जानकारी तक सरकार की पहुँच और उसके ग़लत इस्तेमाल, लोगों पर निगरानी रखने और लोगों की जानकारी जुटाने जैसे कई अहम सवाल भी थे.

फिर कभी उन्होंने बजट में कटौती का सामना किया तो एक संसदीय समिति ने इस पूरी योजना को ख़ारिज ही कर दिया और कहा कि इसका दुरुपयोग हो सकता है.

इंफ़ोसिस के सह संस्थापक के तौर पर प्रसिद्ध रहे नीलेकणी आज चार साल बाद ये मानते हैं कि उनमें से कई आशंकाओं को हटाने में वह कामयाब हुए हैं.

ये योजना साल 2009 में शुरू हुई थी और तब से लेकर अब तक लगभग 50 करोड़ भारतीय इस पहचान पत्र के लिए पंजीकृत हुए हैं. इस 12 अंकों के विशिष्ट नंबर को आधार का नाम दिया गया है.

परियोजना की ओर से दावा किया गया है कि अब तक लगभग 40 करोड़ लोगों को ये कार्ड जारी भी किए जा चुके हैं. अब निगाहें 2014 तक लगभग 10 करोड़ और लोगों को ये नंबर जारी किए जाने पर हैं.

'मदद के लिए' आधार

नीलेकणी कहते हैं कि भारत के 28 राज्यों में से 10 पहले ही सरकारी पेंशन, छात्रवृत्ति और सब्सिडी देने के लिए इस आधार कार्ड का पहचान पत्र के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं.

कुछ राज्य तो ग़रीबों को सस्ता अनाज मुहैया कराने के लिए भी इसी कार्ड का इस्तेमाल कर रहे हैं जिससे अनाज सही जगह पहुँचे और भ्रष्टाचार कम हो.

नीलेकणी को भरोसा है कि ये देश की तस्वीर बदलने वाली योजना है और ख़ास तौर पर ऐसे देश के लिए जहाँ जन्म के समय सिर्फ़ 58 प्रतिशत बच्चों का ही पंजीकरण होता है और गाँवों में रहने वाले 40 फ़ीसदी लोगों के पास तो बैंक खाता भी नहीं है.

नीलेकणी कहते हैं, "इस पहचान पत्र को डिज़ाइन करने में काफ़ी ध्यान दिया गया है जिससे ये सिर्फ़ बड़े पैमाने पर आँकड़े इकट्ठे करने का साधन न बन जाए. ये एक साधारण पहचान पत्र का सिस्टम है जो नागरिकों की मदद के लिए है."

नीलेकणी के लिए ये लंबा और काफ़ी अनोखा रास्ता रहा है.

पहचान पत्र के बारे में नीलेकणी कहते हैं, "पश्चिमी देशों में पहचान पत्र को काफ़ी गंभीरता से लिया जाता है. भारत में चीज़ें अलग हैं. यहाँ पर लाखों ऐसे लोग हैं जिनके पास कोई पहचान पत्र नहीं है और उनके अस्तित्व को उस तरह स्वीकार ही नहीं किया जाता. वे बैंक खाता नहीं खोल सकते, मोबाइल फ़ोन का कनेक्शन नहीं ले सकते. ये दिखाता है कि कैसे पहचान रखने वालों और नहीं होने वालों के बीच बड़ा अंतर है."

सरकारी और निजी क्षेत्र का अंतर

तो फिर बंगलौर में जन्मा ये 58 वर्षीय करोड़पति अब सरकार में कैसे काम करता है? एक ऐसी जगह जहाँ बदलाव की रफ़्तार आम तौर पर काफ़ी धीमी होती है और बदलाव बहुत ही आसानी से पार्टियों की आपसी राजनीति में उलझ जाता है.

Image caption नंदन कहते हैं कि भारत में बहुत से लोगों के पास कोई पहचान पत्र नहीं है और उनके लिए ये कार्ड अहम है

सरकार की दुनिया निजी क्षेत्र की दुनिया से पूरी तरह अलग है. एक तरफ़ कुछ-कुछ सोए हुए से दफ़्तर, नौकरशाहों से भरे हुए सहायकों की सेना के साथ तो दूसरी ओर नीलेकणी की पुरानी कंपनी इंफ़ोसिस का परिसर चमचमाता और हर तरह चहल-पहल वाला.

वैसे नीलेकणी का ये दफ़्तर एक आरामदायक सा एहसास देने वाला है जहाँ किताबों की भरी हुई अलमारी, एक बड़े स्क्रीन वाला टीवी और एक लैपटॉप है. साथ ही अख़बार और कुछ पत्रिकाएँ बिखरी हुई हैं.

पुरुषों के शौचालय में कंप्यूटर से प्रिंट किया एक संदेश चिपका है कि 'वॉशबेसिन या शौचालय में तंबाकू या पान न थूकें.' ये नोट सरकारी और निजी क्षेत्र के बीच की चुनौतियों को भी रेखांकित करता है.

वैसे सरकारी तंत्र के साथ काम ने नीलेकणी को धैर्य और आम सहमति बनाना सिखाया है.

वह बताते हैं, "निजी क्षेत्र में बिज़नेस की ओर से एक फ़ैसला होता है, आप अपनी प्रबंधन टीम के साथ उस पर चर्चा करते हैं, बोर्ड की सहमति लेते हैं, अपने शेयर धारकों के पास जाते हैं, विश्लेषकों को आश्वस्त करने की कोशिश करते हैं. बस."

मगर उनके अनुसार सरकारी मामले में ऐसा नहीं है, "सरकारी क्षेत्र में ये पूरी तरह से अलग है. आप सरकार, संसद, नौकरशाही, न्यायपालिका, स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं और पत्रकारों का सामना करते हैं. फिर संघीय ढाँचा है जिसमें केंद्र सरकार है, राज्य सरकार है और स्थानीय निकाय हैं. आप इन सभी के साथ चर्चा करते हुए कुछ करने की कोशिश करते हैं."

सफलता का पैमाना

सरकार के साथ काम करते हुए और विपक्ष की नाराज़ग़ी का सामना करते हुए नीलेकणी को भी ये एहसास हुआ कि सरकार में सफलता का पैमाना निजी क्षेत्र से पूरी तरह अलग है.

उनके मुताबिक़, "बिज़नेस में आपकी सफलता राजस्व से, क़ीमत पर लगाम लगाकर, मुनाफ़े से, नए उत्पादों से, प्रति शेयर की कमाई से और वृद्धि से आँकी जाती है. प्रदर्शन को आँकने की भाषा एक ही होती है फिर चाहे उत्पाद कोई भी क्यों न हो."

तो फिर सरकार में सफलता का पैमाना क्या है?

वह बताते हैं, "पहचान पत्र कार्यक्रम में भरोसा करने वाला व्यक्ति कहेगा कि मैं सफल हूँ अगर मैं ये कर सका. मगर जो इसमें भरोसा ही नहीं करता उसके लिए तो मैं जो कुछ भी करूँ मैं विफल ही रहूँगा. सरकार में सफलता उस विचारधारा से जोड़कर देखी जाती है जहाँ से आप दुनिया को देखते हैं."

नीलेकणी अपने शुरुआती जीवन के बारे में भी बताते हैं. जब वह 12 साल के थे तो बंगलौर में एक कपड़ा मिल के मैनेजर उनके पिता ने उन्हें अपने अंकल के साथ एक छोटे से नगर धारवाड़ में रहने भेज दिया.

वह कहते हैं कि उन्होंने अपने पिता और अंकल को गहन राजनीतिक चर्चा में डूबे हुए देखा था, आपस में लोगों के मुद्दों पर चर्चा करते हुए. उनके लिए लोगों के साथ जुड़ने की वही शुरुआत थी.

प्रौद्योगिकी आम लोगों के लिए

वह भारत के टॉप इंजीनियरिंग स्कूल गए, उसकी क्विज़ टीम में रहे, छात्रों के कुछ समूहों का नेतृत्व किया और कहते हैं कि इस ज़रिए उन्होंने 'अपनी सामाजिक क्षमता को विकसित किया, थोड़े चालू हुए और मोल-तोल करना सीखा'.

नीलेकणी कहते हैं कि इन सब चीज़ों ने इंफ़ोसिस के उनके तीन दशक के समय में काफ़ी मदद की. वह कई उद्योगों के लोगों से मिलते रहे और ग्राहकों का रवैया पढ़ते भी रहे जिससे टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से कैसे उनकी मदद की जा सकती है, ये समझा जा सके.

जब उन्होंने साल 2009 में कंपनी छोड़ी तो वह 50 फ़ीसदी बड़ी हो चुकी थी और उन्हें काफ़ी धनी भी बना चुकी थी. वह बताते हैं, "मैंने प्रौद्योगिकी को सिर्फ़ उस को समझने के लिए ही नहीं जाना बल्कि उसका इस्तेमाल करके कैसे आम लोगों की बड़ी और जटिल समस्याएँ दूर की जा सकती हैं इस पर ध्यान दिया."

वह कहते हैं कि जब उनका ये पहचान पत्र का प्रोजेक्ट समाप्त होगा तो वह लोगों की समस्याएँ दूर करने में ही लगे रहना चाहेंगे.

वैसे प्रौद्योगिकी की दुनिया में नाम कमाने वाले नीलेकणी के मुताबिक़, "मेरी पत्नी कहती है कि मैं बेहद ख़राब इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हूँ क्योंकि मैं तो एक बल्ब भी नहीं बदल पाता हूँ."

आपका डिजिटल इंडियन कौन है? बताइए हमें फ़ेसबुक, ट्विटर या गूगल प्लस के बीबीसी हिंदी के पन्ने पर आकर, या अपने कमेंट के साथ टाइप कीजिए #BBCDI.

(बीबीसी हिंदी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और गूगल प्लस पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार