पॉपकॉर्न खाओ, विज्ञापन भूल जाओ !

पॉपकॉर्न, फ़िल्म

जर्मनी के कलोन विश्वविद्यालय के एक नए अध्ययन के मुताबिक़ सिनेमा देखते वक्त जब दर्शक पॉपकॉर्न का लुत्फ़ उठाते हैं तब विज्ञापनों का असर कम होता है.

शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि दर्शक किसी नए नाम की नकल उतारकर ब्रांड का नाम याद करते हैं लेकिन यह आंतरिक प्रक्रिया चबाने की प्रक्रिया से प्रभावित होती है. इससे विज्ञापन बेअसर साबित होते हैं.

यह शोध जर्नल ऑफ़ कंज़्यूमर सायकॉलजी में छपा है. यह नया अध्ययन पुराने नतीजों से भिन्न है जिनमें कहा गया था कि च्यूइंग गम चबाने से याददाश्त बढ़ सकती है.

इस बात के कुछ प्रमाण हैं कि च्यूइंग गम चबाने से दिमाग़ में रक्त प्रवाह बेहतर होता है जिससे लंबी अवधि में आप ज़्यादा चौकस बन सकते हैं.

हालांकि पिछले साल कार्डिफ़ विश्वविद्यालय के एक अध्ययन में यह कहा गया था कि च्यूइंग गम चबाने से एक निर्धारित क्रम में चीज़ें याद रखना बाधित हो जाता है.

पॉपकॉर्न और याददाश्त

Image caption कार्डिफ़ विश्वविद्यालय के एक शोध में कहा गया था कि च्यूइंग गम चबाने से याददाश्त का क्रम बाधित होता है

पॉपकॉर्न और याददाश्त के बीच संबंध को जानने के लिए कलोन विश्वविद्यालय ने 96 लोगों को फ़िल्म देखने के लिए आमंत्रित किया. इससे पहले विज्ञापनों की श्रृंखला चलाई गई.

समूह में आधे लोगों को पूरी फ़िल्म के दौरान पॉपकॉर्न दिए गए जबकि बाक़ियों को शुगर क्यूब दिए गए. इन्हें उपलब्ध उत्पादों के वास्तविक विज्ञापन दिखाए गए जिनसे जर्मन लोग अंजान थे.

एक हफ़्ते बाद इन लोगों को प्रयोगशाला में बुलाया गया और कुछ उत्पादों के बारे में बताने के लिए कहा गया. इनमें वे उत्पाद भी शामिल थे जिनके विज्ञापन दिखाए गए थे.

शुगर क्यूब खाने वाले लोगों ने उत्पादों के बारे में अपनी प्राथमिकताएं बताईं जबकि पॉपकॉर्न खाने वाले समूह ने ऐसा नहीं किया.

एक दूसरे अध्ययन के दौरान भी समान परिस्थितियों में 188 लोगों को विज्ञापन दिखाए गए और चैरिटी संस्थाओं को दान करने के लिए पैसे दिए गए.

फिर से शुगर क्यूब वाले समूह ने उन चैरिटी संस्थाओं को दान दिया जिन्हें सिनेमा के दौरान विज्ञापनों में दिखाया गया लेकिन पॉपकॉर्न खाने वाले समूह ने ऐसा नहीं किया.

दोहराव

एक शोधकर्ता साशा टोपोलिंस्की कहती हैं, ''पॉपकॉर्न खाने की गतिविधि ने प्रतिभागियों को विज्ञापन के व्यापक असर से मुक्त कर दिया था.''

अध्ययन के मुताबिक़ लोगों में किसी ब्रांड का नाम स्थापित करने के लिए उसे बार बार दोहराने की ज़रूरत पड़ती है.

शोधकर्ताओं ने लिखा है कि ख़ासकर नए ब्रांड की स्थापना के लिए ज़रूरी है कि उसे दोहराया जाए.

याद कीजिए कि शुरूआत में किस तरह याहू, गूगल या विकीपीडिया ने आपको परेशान किया था लेकिन अब वो आपकी याददाश्त में छप चुके हैं.

टोपोलिंस्की तो यहां तक कहती हैं कि विज्ञापनकर्ता शायद पॉपकॉर्न का बहिष्कार करने लगें.

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