किसमें भरोसा करें, विज्ञान या भगवान?

  • 23 अक्तूबर 2013
लॉर्ड केल्विन, विज्ञान, वैज्ञानिक

लॉर्ड केल्विन 19वीं सदी के महान वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं.

वो एक धर्मनिष्ठ ईसाई थे, जिन्होंने अपने धर्म और विज्ञान में सामंजस्य बिठाने का तरीका ढूंढा लेकिन इसके लिए उन्हें डार्विन सहित अपने ज़माने के वैज्ञानिकों से संघर्ष करना पड़ा.

उस वक़्त के इस संघर्ष की गूंज मौजूदा दौर में विज्ञान और धर्म की बहस में भी सुनाई देती हैं.

केल्विन पैमाने के अलावा यांत्रिक यानी मैकनिकल ऊर्जा और गणित के क्षेत्र में उनका शोध यूरोप और अमरीका को जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाली ट्रांस अटलांटिक केबल को बिछाने में अहम साबित हुआ है.

वो ब्रिटेन के पहले वैज्ञानिक थे जिन्हें हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में जगह मिली. उनका हमेशा ये विश्वास रहा कि उनकी आस्था से उन्हें बल मिला है और उनके वैज्ञानिक शोध को प्रेरणा मिली है.

आस्था और विज्ञान का सामंजस्य

Image caption मशहूर वैज्ञानिक स्टीफ़न हॉकिंग ने धर्म का जमकर विरोध किया है.

केल्विन का मानना था कि विज्ञान का पूरा सम्मान होना चाहिए. उनका कहना था, "वैज्ञानिक मानते हैं कि विज्ञान ने सृष्टि को बनाने वाले में आस्था जताने से बचते हुए भी प्रकृति के सभी तथ्यों की व्याख्या करने का तरीका ढूंढ लिया है. मेरा मानना है कि ये धारणा निराधार है. मैंने जितना शोध किया, मुझे लगता गया कि विज्ञान में नास्तिकता की जगह नहीं है. अगर आप मज़बूती से सोचते हैं तो विज्ञान आपको भगवान में भरोसा रखने के लिए मजबूर करेगा."

केल्विन बाइबल पढ़ते थे और रोज़ाना चर्च जाते थे.

बेलफ़ास्ट के क्वींस विश्वविद्यालय के डॉक्टर एंड्र्यू होम्स बताते हैं, "अपने सभी कामों में केल्विन की कोशिश रही कि वो अपनी आस्था, राजनीति और व्यावसायिक हितों को मिला सकें"

केल्विन के कुछ सिद्धांत ग़लत साबित हुए, इनमें पृथ्वी की आयु की ऊपरी सीमा तय करना भी शामिल था.

केल्विन ने अंदाज़ा लगाया था कि ये सीमा कुछ करोड़ साल होगी.

डॉक्टर होम्स कहते हैं, "कुछ लोग केल्विन को ख़ारिज कर सकते हैं क्योंकि धरती के ठंडे होने को लेकर उनका काम ग़लत साबित हुआ था और उन्होंने विद्युत चुंबकत्व यानी इलेक्ट्रोमैग्नेटिज़्म पर मैक्सवेल के काम को गंभीरता से नहीं लिया था. लेकिन उन्हें 19वीं सदी प्रमुख भौतिकशास्त्रियों में गिना जाता है."

Image caption लॉर्ड केल्विन ने डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत का विरोध किया था.

पृथ्वी की उम्र कम बताने की वजह से भूगर्भशास्त्री और डार्विनवादी संतुष्ट नहीं थे लेकिन ईश्वरवादियों को ये उम्र बहुत ज़्यादा लगती थी, इस वजह से केल्विन धर्म और विज्ञान के बीच फंस कर रह गए.

केल्विन ने डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत का ये कहते हुए विरोध किया कि डार्विन ने प्रकृति की रचना में ईश्वर की मौजूदगी के सबूतों को नज़रंदाज़ किया है और उन्होंने ये भी मानने से इनकार कर दिया कि मृत पदार्थों के परमाणु कभी मिलकर जीवन बना सकते हैं.

विज्ञान बनाम धर्म

आज के दो प्रमुख वैज्ञानिकों, मशहूर भौतिकशास्त्री स्टीफ़न हॉकिंग और रिचर्ड डॉकिंस, ने धर्म का जमकर विरोध किया है.

तो क्या ये माना जाए कि आज के वैज्ञानिक केल्विन की तरह ही आस्था रखते हैं या आस्था और विज्ञान आज बहुत दूर हो गए हैं.

अमरीका के टेक्सस की राइस यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर एलीन एक्लंड ने साल 2005 में अमरीका के आला विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों में सर्वे किया, उन्होंने पाया कि 48% लोगों की धार्मिक आस्था थी और 75% लोग मानते थे कि धर्म से महत्वपूर्ण सच का पता चलता है.

वो कहती हैं, "ये कहना ग़लत होगा कि आज उन वैज्ञानिकों की संख्या ज़्यादा है जो ईसाई हैं. लेकिन निश्चित रूप से ऐसे वैज्ञानिक हैं जो अपने वैज्ञानिक काम को अपनी आस्था से जुड़ा हुआ मानते हैं."

अमरीकी आनुवांशिक वैज्ञानिक फ़्रांसिस कॉलिंस ने कहा था, "हमारे समय की एक बड़ी त्रासदी ये धारणा है कि विज्ञान और धर्म में संघर्ष होना ही चाहिए."

निरंतर संघर्ष?

तो क्या वाकई में विज्ञान और धर्म प्राकृतिक रूप से एक दूसरे के खिलाफ़ हैं?

स्टीफ़न हॉकिंग ने अपनी किताब 'द ग्रैंड डिज़ाइन' में लिखा है, "स्वाभाविक रचना ही वो वजह है कि कुछ न होने की जगह कुछ है, ये ब्रह्मांड क्यों है, हम क्यों हैं. ये ज़रूरी नहीं है कि हचलच पैदा करने और ब्रह्मांड को चलाने के लिए भगवान को बुलाया जाए."

ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर जॉन लेनक्स ने साल 2010 में लिखे एक लेख में हॉकिंग के तर्कों का विरोध किया.

लेनक्स ने कहा, "हॉकिंग के तर्कों के पीछे जो वजह है वो इस विचार में है कि विज्ञान और धर्म में एक संघर्ष है लेकिन मैं इस अनबन को नहीं मानता."

कुछ साल पहले वैज्ञानिक जोसेफ़ नीडहैम ने चीन में तकनीकी विकास को लेकर अध्ययन किया. वो ये जानना चाहते थे कि आखिर क्यों शुरुआती खोजों के बावजूद चीन विज्ञान की प्रगति में यूरोप से पिछड़ गया.

वो अनिच्छापूर्वक इस नतीजे पर पहुंचे कि "यूरोप में विज्ञान एक तार्किक रचनात्मक ताकत, जिसे भगवान कहते हैं, में भरोसे की वजह से आगे बढ़ा, जिससे सभी वैज्ञानिक नियम समझने लायक बन गए."

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