चॉकलेट कंपनियों का वादा, ऊंट के मुंह में ज़ीरा

Image caption चॉकलेट निर्माता कंपनियों के वसा मुक्त वादे पर है विशेषज्ञों को संदेह.

चॉकलेट आदि खाद्य पदार्थ बनाने वाली शीर्ष कंपनियां भले ही फ़ैट (वसा) मुक्त उत्पाद का वादा कर रही हों लेकिन उनकी इस प्रतिबद्धता पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों को भरोसा नहीं है.

दुनिया की शीर्ष खाद्य पदार्थ निर्माता कंपनियों द्वारा वसा मुक्त उत्पाद बनाने के वादे को जाने-माने स्वास्थ्य विशेषज्ञ संदेह की दृष्टि से देखते हैं.

उनके अनुसार, अपने उत्पादों से वसा को कम करने का वादा करने वाली शीर्ष कंपनियां अपने उद्देश्य में नाकाम रही हैं.

असल में यह वादा उद्योग और सरकार के बीच एक स्वैच्छिक प्रतिबद्धता का हिस्सा भर है.

लेकिन, सार्वजनिक स्वास्थ्य संकाय के प्रोफ़ेसर जॉन एस्टन का कहना है कि इस वादे की विश्वसनीयता संदेह के घेर में है.

20 प्रतिशत ज्यादा वसा

इनमें मॉरिसन, सबवे और नेस्ले जैसी कंपनियां भी शामिल हैं जो किटकैट के निर्माण में तब्दीली करने जा रही हैं.

औसत व्यक्ति को प्रतिदिन 30 ग्राम से अधिक वसा नहीं लेनी चाहिए, जबकि औसत महिलाओं के लिए यह मात्रा 20 ग्राम प्रतिदिन है.

लेकिन अधिकांश लोग निर्धारित मात्रा से 20 प्रतिशत ज्यादा वसा लेते हैं.

सेनबरी का इस्तेलाम करने वाले 2000 लोगों पर किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि इनमें 84 प्रतिशत यही नहीं जानते थे कि संतृप्त वसा की कितनी मात्रा बेहतर स्वास्थ्य के लिए ज़रूरी है.

विकल्प

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, ख़ुराक़ में वसा की मात्रा को 15 प्रतिशत तक कम कर हृदयाघात और हृदयरोगों से होने वाली बाल मृत्यु में 2,600 मामलों को रोका जा सकता है.

इसमें कहा गया है कि लगभग आधे खाद्य निर्माता और खुदरा उद्योग अपने उत्पादों में संतृप्त वसा को कम करने के लिए एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर चुके हैं.

इन्हीं कंपनियों में से एक मॉरिसन ने कहा है कि वह अपने उत्पादों के अवयवों को सहमति के अनुसार सुधारेगा जबकि सबवे अपने किड्स पैक में वसा कम करने के लिए इसे बिस्कुट जैसे अन्य स्वास्थ्यवर्द्धक उत्पादों से स्थानांतरित करेगा.

सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्री जेन एलिसन ने कहा, ''समहमति पत्र पर इतनी कंपनियों का हस्ताक्षर वाक़ई उत्साहजनक है.''

रेस्पांसबिलिटी फूड नेटवर्क की चेयरमैन प्रोफ़ेसर सुसान जेब कहती हैं कि कंपनियों द्वारा किए गए वादे वसा कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण क़दम हैं.

वादे जो कभी पूरे नहीं होंगे

लेकिन ये वादे कभी पूरे भी होंगे, इस बात को लेकर आलोचक निश्चिंत नहीं हैं.

हालांकि वे यह भी कहते हैं, ''जिस पैमाने पर मोटापे का संकट है उसकी तुलना में यह कोशिश ऊंट के मुंह में ज़ीरा जैसी है.''

''इस समस्या को हल करने के लिए स्वेच्छा से किए गए स्वनियमन के नज़रिए के प्रति हम निश्चिंत नहीं हो सकते.''

उनके अनुसार, यह कोशिश अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है और यह कंपनियों को अपना दामन साफ़ करने की कोशिश के तौर पर देखा जाने लगा है.

क़ानून बनाने पर ज़ोर

नेशनल ओबेसिटी फ़ोरम के टैम फ्राई के अनुसार, मंत्रियों को एक व्यस्थित क़ानून के बारे में विचार करना चाहिए.

उन्होंने कहा कि स्वनियम की यह कोशिश बहुत कामयाब नहीं हो पाएगी जबतक कि सरकार सभी कंपनियों पर शिकंजा नहीं लगाती और उन सभी को हस्ताक्षर करने पर मजबूर नहीं करती.

इस सहमति पत्र की घोषणा एक विशेषज्ञ के उस बयान के दूसरे दिन आई जिसमें वसा के ख़तरे को बढ़ाचढ़ा कर प्रचारित किए जाने की बात कही गई थी.

एक ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में डॉ. असीम मल्होत्रा ने लिखा है कि वसा पर बहुत ज्यादा ध्यान केंद्रित किए जाने से चीनी और नमक जैसे अन्य कारक नज़रअंदाज़ कर दिए जाते हैं.

हालांकि ब्रिटिश हर्ट फ़ाउंडेशन की वरिष्ठ डाइटीशियन विक्टोरिया टेलर का कहना है कि वसा में कटौती करना कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम बनाए रखने का एक आसान तरीक़ा है.

''आपको अपने कोलेस्ट्रॉल स्तर पर ध्यान रखने की ज़रूरत है क्योंकि सभी जानते हैं कि इसका उच्च स्तर हृदय रोग का ख़तरा बढ़ा देता है.''

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