अंतरिक्ष में भारत की चीन से कोई होड़ नहीं: इसरो

भारत जल्दी ही मंगल पर अपना पहला यान भेजने जा रहा है. लेकिन इस महत्वाकांक्षी योजना से कई सवाल और संशय जुड़े हुए हैं. इन्हीं सवालों का जवाब जानने के लिए बीबीसी ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के प्रमुख के. राधाकृष्णन से बात की.

भारत के मंगल मिशन का लक्ष्य क्या है?

जिस मंगल मिशन की हम योजना बना रहे हैं उसका पहला लक्ष्य भारत की क्षमता प्रदर्शित करना है और उसके बाद मंगल के बारे में अर्थपूर्ण और वैज्ञानिक प्रयोगों को अंजाम देना है.

मंगल मिशन से आपको क्या मिलने की उम्मीद है?

जब हम मंगल की बात करते हैं तो सबसे पहले हम मंगल पर जीवन संभव है या नहीं, इस बारे में खोज करना चाहते हैं. इसके साथ-साथ हम यह भी जानना चाहेंगे कि मंगल पर मीथेन है या नहीं और अगर मीथेन है तो ये जैविक है या भूगर्भीय. हमारी दिलचस्पी मंगल के वायुमंडल के बारे में जानने की भी है.

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भारत के पूर्वी तट से यान प्रक्षेपित होगा, इसका असली मकसद क्या हासिल करना होगा और इसमें कितना समय लगेगा?

मंगल पर किसी भी मिशन को किसी खास समय में ही भेजा जा सकता है. हमारे पास सबसे क़रीब जो अवधि है वह नवंबर 2013 है. हमें किसी भी हालत में 30 नवंबर तक यान को प्रक्षेपित कर देना है क्योंकि इस दौरान पृथ्वी और मंगल के बीच दूरी सबसे कम रहेगी.

मंगल यान को नवंबर के पहले सप्ताह में भारत के पूर्वी तट पर स्थित श्रीहरिकोटा से लांच किया जायेगा. इस मिशन की कुल लागत 450 करोड़ रुपये है. यान नवंबर 2013 से सितम्बर 2014 तक अपने मिशन को पूरा करेगा. नवंबर में लांच होने के बाद यह पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हो जाएगा औऱ इसके बाद इसके छः इंजन इससे अलग होकर इसे वहाँ से 215,000 किलोमीटर के दूरतम बिंदु पर स्थापित कर देंगे, जहाँ ये लगभग 25 दिनों तक रहेगा. फिर इसे 30 नवंबर को अंतरग्रहीय प्रक्षेपवक्र में भेज दिया जायेगा.

Image caption के. राधाकृष्णन, इसरो प्रमुख

इसके बाद आंकड़े इकट्ठे करने और खोज करने का काम ये कब से शुरु करेगा?

मंगल की कक्षा में इसके पहुँचने के बाद हम अपना काम शुरु कर देंगे. यह आंकड़े भेजना शुरु कर देगा. किसी भी तरह के आंकड़ों को मंगल की कक्षा से पृथ्वी की कक्षा तक आने में सिर्फ 4 से 20 मिनट लगेंगे.

इस अभियान की आलोचना भी की जा रही है कि आखिर इस तरह के मिशन पर भारत करोड़ों रुपए क्यों खर्च कर रहा है जबकि हमारी अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही है और देश में भुखमरी और कुपोषण है?

पिछले 50 साल से यह सवाल पूछा जा रहा है कि भारत अंतरिक्ष कार्यक्रम क्यों चला रहा है. इसका जवाब यही है कि आम आदमी और समाज की समस्याओं का हल ढूंढना है. इस क्षेत्र में भारत दुनिया के लिए एक आदर्श बन गया है. अगर हम केन्द्र सरकार के खर्च की बात करें तो हम बजट का केवल 0.34 प्रतिशत हिस्सा ही अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम पर खर्च करते हैं. इसका अधिकांश हिस्सा दूर संवेदी, दूरसंचार एवं दिशासूचक उपग्रहों के निर्माण पर खर्च हो जाता है. मंगल मिशन पर इसका केवल आठ प्रतिशत खर्च हुआ है जबकि इसके फायदे बहुत हैं.

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चाहे दूर संवेदी उपग्रह हो, दूरसंचार उपग्रह हो या फिर दिशासूचक उपग्रह, इन सबकी हर भारतीय को रोज जरूरत पड़ती है. आपदा प्रबंधन की बात हो, या प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग की, मौसम की सटीक जानकारी और तकनीक को बढ़ावा देने के लिए अंतरिक्ष अभियानों को बढ़ावा देने की जरूरत है.

भारतीय स्पेस मिशन के दूसरे अभियानों की बात करें जैसे कि चंद्रमा पर भेजा गया यान, तो यह कितना सफल रहा है? चंद्रमा पर हमारा अभियान बेहद सफल रहा है. यह भारत के अंतरिक्ष इतिहास का टर्निंग प्वाइंट रहा है. हमने चंद्रयान-1 को भेजने में पीएसएलवी का प्रयोग किया, और अब मंगल मिशन में हम इसका प्रयोग कर रहे हैं. चंद्रयान-1 से हमें महत्वपूर्ण आंकड़ों को इकट्ठा करने में मदद मिली. भविष्य के लिए आगे के अभियान में भी हमें इन आंकड़ों से मदद मिलेगी. हम चंद्रयान-1 अभियान से कुछ औऱ वक्त तक आंकड़े इकट्ठे कर सकते थे, लेकिन वो एक अलग मुद्दा है.

भारत के चंद्रयान-2 अभियान की योजना के बारे में आपके क्या कहना है? चंद्रयान-1 भारत और रूस का संयुक्त अभियान था. लेकिन हमारी कोशिश है कि चंद्रयान-2 पूरी तरह स्वदेशी हो. यह पूरी तरह से भारत का अभियान होगा. अगर दिसंबर में होने वाले जीएसएलवी का लांच सफल रहता है तो चंद्रयान-2 को भेजने की हमारी कोशिश के सफल होने की उम्मीद बढ़ जायेगी. चंद्रयान-2 को 2016 तक भेजने की कोशिश रहेगी.

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मानव को अंतरिक्ष में भेजने की भारत की क्या योजना है? यह कब तक मुमकिन होगा? फिलहाल ऐसी कोई औपचारिक योजना नहीं है. लेकिन 2006-2007 से हमने इस पर काफी गम्भीरता से विचार करना शुरू किया है. मानव यान भेजने के लिए भारत को अभी नई तकनीक पर बहुत काम करना है. क्रू मॉडल सिस्टम, क्रू एस्केप सिस्टम, और बहुत सी तकनीक जो एक मानव यान भेजने के लिए जरूरी है उस पर काम करना प्रथमिकता है. जीएसएलवी की सफलता भी इसके लिए जरूरी है.

यदि हम चीन और भारत के बीच स्पेस रेस की बात करें तो विश्लेषकों का कहना है कि चीन दस साल पहले मानव यान भेज चुका है और भारत चीन से दशकों पीछे है, इस पर आपका क्या कहना है? हर देश की अपनी प्राथमिकता होती है. साठ के दशक से ही भारत का मकसद मूलभूत स्पेस एप्लिकेशन पर काम करना रहा है और भारत इसमें रोल मॉडल रहा है. चीन की अपनी प्राथमिकताएं रही है. हमारी किसी से कोई रेस नहीं है. हाँ हमारी रेस खुद से है.

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