डायबिटीज़ः चीन को चुनौती देता भारत

  • 14 नवंबर 2013
डायबिटीज

एशिया में डायबिटीज़ महामारी का रूप लेता जा रहा है. सबसे परेशानी की बात ये है कि इसकी ज़द में ज़्यादातर गरीब लोग आ रहे हैं.

आमतौर पर कहा जाता है कि डायबिटीज़ अमीरों का रोग है. मगर नए शोधकर्ताओं की मानें तो अब वैसे लोगों में डायबिटीज़ का ख़तरा बढ़ रहा है जो खाने की कमी और खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं.

बदलती जीवनशैली, तेज शहरीकरण और प्रसंस्कृत भोजन (प्रोसेस्ड फूड) ने टाइप-2 डायबिटीज़ का ख़तरा बढ़ा दिया है.

अंतरराष्ट्रीय डायबिटीज़ फ़ेडरेशन (आईडीएफ़) के नए आंकड़ों के अनुसार दुनिया भर में डायबिटीज़ से प्रभावित लोगों की संख्या बढ़कर अब 3.82 अरब हो गई है.

इनमें से आधे मरीज़ तो एशिया में ही मौजूद हैं. बाक़ी मरीज़ पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र से आते हैं जहां लगभग 90-95 फ़ीसदी मामले टाइप-2 के सामने आ रहे हैं.

चीन डायबिटीज़ मरीज़ों के मामले में एशिया में सबसे आगे है. चीन की आबादी का 10 फीसद यानी नौ करोड़ 80 लाख लोग डायबिटीज़ से पीड़ित हैं.

आधुनिकीकरण की तेज़ रफ़्तार

Image caption डायबिटीज़ चुपके-चुपके लोगों की जान पर ख़तरे का कारण बन रहा है.

हॉंगकॉंग में चीनी विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर जूलियाना चेन के अनुसार चीन में डायबिटीज़ के इतने ज़्यादा मामले इसलिए हैं क्योंकि चीन के तेज़ आधुनिकीकरण से पर्यावरण, आनुवंशिकी, जीवनशैली और पर्यावरणीय कारकों पर बुरा असर पड़ रहा है. और अंततः इससे लोगों की सेहत बिगड़ रही है.

वह कहती हैं, "डायबिटीज़ विरोधाभासों से भरा रोग बन कर सामने आ रहा है."

उन्होंने कहा, "वैसे तो डायबिटीज़ बढ़ती उम्र की बीमारी है, मगर आंकड़े बता रहे हैं कि अब युवा और मध्यम आयु वर्ग के लोग इसका ज़्यादा शिकार होने लगा है. यह मोटे लोगों में ज़्यादा पाया जाता है, मगर दुबले लोगों में इसके परिणाम बेहद ख़तरनाक हो सकते हैं."

प्रोफ़ेसर चेन कहती हैं, "मूक आबादी के लिए डायबिटीज़ खामोश क़ातिल साबित हो रहा है."

मूक आबादी यानी ऐसे लोग जो आमतौर पर अपनी गरीबी, गलत जानकारी और समस्याओं के कारण डायबिटीज़ का इलाज तब तक नहीं करते जब तक कि ये बीमारी पूरी तरह विकसित नहीं हो जाती.

डायबिटीज़ होने के बाद खराब गुर्दे, ह्रदय रोग और अंधापन जैसी आम जटिलताएं सामने आने लगती हैं.

भारत दूसरे नंबर पर

प्रोफ़ेसर चेन का मानना है कि बहुत तेज़ी से विकास करने के कारण चीन की ही तरह भारत को भी इससे बहुत ख़तरा है.

एक अनुमान के अनुसार छह करोड़ 51 लाख डायबिटीज़ मरीज़ों के साथ भारत भी चीन के काफी क़रीब आ चुका है.

25 साल की कनमणि पांडियन को जनवरी में पहला बच्चा होने वाला था.

दो महीने पहले ही पता चला कि कनमणि को जेस्टेशनल डायबिटीज़ है. इसके बारे में उसने पहले कभी नहीं सुना था.

कनमणि भाग्यशाली थी कि चेन्नई में गर्भवती महिलाओं की स्क्रीनिंग की सुविधा मौजूद है. अगर उनकी जांच नहीं की गई होती तो इसके बाद उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता, जैसे भ्रूण से संबंधित बीमारी या बच्चे का ज़रूरत से ज़्यादा वज़न, या ख़तरनाक प्रसव का सामना करना पड़ता.

जच्चा और बच्चा को खतरा

Image caption फिजी में हर 12 घंटे पर डायबिटीज़ के कारण संक्रमित एक पांव को काटा जा रहा है.

साल 2013 में दो करोड़ 10 लाख बच्चों का जन्म डायबिटीज़ से प्रभावित हुआ. भारत में स्थिति जटिल है.

चेन्नई के डायबिटीज़ विशेषज्ञ डॉ. आरएम अंजना कहती हैं, "जेस्टेशनल डायबिटीज़ को अक्सर गंभीर नहीं माना जाता. लोगों को यह एक बार की बात या छोटी परेशानी लगती है."

हालांकि ये परेशानियां बच्चे के जन्म के बाद समाप्त हो जाती हैं, मगर गर्भाधान के बाद के पांच सालों में 70 से 80 फीसदी महिलाओं में टाइप-2 डायबिटीज़ विकसित हो जाती है.

इसके अलावा शिशु में भी आगे डायबिटीज़ होने का ख़तरा बढ़ जाता है.

अगर पश्चिमी प्रशांत के इलाक़ों की बात करें तो वहां यह बीमारी अप्रत्याशित तरीके से इंसानों को और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही है.

कम सक्रियता

फिजी में, सर्जन हर 12 घंटे पर डायबिटीज़ से जुड़ा औसतन एक ऑपरेशन कर रहे हैं.

फिजी के डायबिटीज़ ट्रस्ट के सहसंस्थापक डॉ वाहिद ख़ान कहते हैं, "पहले तो लोग पैरों में हुए संक्रमण के लिए पारपंरिक दवाइयों या जड़ी बूटियों का सहारा लेते हैं. फिर जब इससे बात नहीं बनती तब वे क्लीनिक आते हैं. तब तक मामला इतना बिगड़ चुका होता है कि उस हिस्से को काट कर हटाना पड़ता है."

Image caption डायबिटीज़ से खराब गुर्दे, ह्रदय रोग और अंधापन जैसी समस्याएं तेज़ी से बढ़ रही हैं.

डॉक्टर ख़ान ने यह भी बताया कि आमतौर पर लोग ये नहीं चाहते कि कोई उनके रोग के बारे में जाने. उनका कहना है कि फिजी में सामान्यतः ये प्रचलन है कि जिन्हें डायबिटीज़ होता है उन्हें नौकरी मिलने की संभावना कम हो जाती है.

फिजी में इस बीमारी का ये हाल है कि 30 साल का हर तीसरा व्यक्ति डायबिटीज़ से प्रभावित है.

एशिया के चलन का अनुसरण करते हुए फिजी की पर्यटन, चीनी उद्योग, सोना, तांबा और मछली निर्यात से उभर रही अर्थव्यवस्था ने मध्यम वर्ग में बढोत्तरी की है.

डॉक्टर ख़ान का कहना है, "पहले लोग अपनी फ़सल ख़ुद उगाते थे, मछलियां पकड़ते थे, कहीं जाना होता था तो पैदल ही जाते थे. अब लोग आलसी हो गए हैं. फास्ट फूड और मिठाई उद्योग ने भी जीवनशैली को खराब किया है."

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