रोबोट रोकेंगे परमाणु संयंत्रों में रिसाव!

रोबोट ग्राफ़िक्स

एक दृश्य की कल्पना कीजिएः परमाणु रिएक्टर में अलार्म बज रहे हैं, इसमें रिसाव हो रहा है और ज़हरीला पदार्थ बाहर निकल रहा है. ऐसी स्थिति में किसी भी इंसान का बचना नामुमकिन है. लेकिन तभी रोबोट बचाव दल वहां पहुंच जाता है और काम शुरू कर देता है. जल्द ही स्थिति नियंत्रण में आ जाती है.

यह किसी हॉलीवुड की फ़िल्म का दृश्य नहीं है- अगर पेंटागन की कोशिशें सफल हुईं तो जल्द ही रोबोट दल ऐसी मानव-जनित दुर्घटनाओं पर काबू पा सकेंगे.

अमरीकी रक्षा विभाग ने इस तकनीक को प्रोत्साहन देने के लिए सौ में से 17 दलों और उनकी मशीनों को चुना. यह सभी दल मियामी के नज़दीक होने वाले परीक्षण- डार्पा रोबोटिक चैलेंज (डीआरसी)- में प्रतियोगिता करेंगे.

एक साल बाद इसका फ़ाइनल होगा जिसमें 20 लाख डॉलर (1.24 अरब रुपये) इनाम के विजेता का ऐलान होगा.

कई देशों की टीमें

वर्जीनिया टेक्स रोबोटिक्स और मैकेनिज़्म लैबोरेट्री इस प्रतियोगिता में इंसान जैसा पूरे कद का रोबोट- थॉर- को लेकर आई है.

इसके निदेशक प्रोफ़ेसर डेनिस हॉंग कहते हैं, "यह इंसानियत को बचाने वाला प्रोजेक्ट है. इस तरह की बड़ी प्रतियोगिताएं विज्ञान फ़ंतासियों को हकीकत बनाने में मदद करती हैं."

"फ़ुकुशिमा प्लांट जैसी दुर्घटनाएं फिर होंगी और अगर हम ऐसी तैयारी नहीं करते हैं तो हम लाचार शिकार होंगे."

जापान में भी 2011 की परमाणु प्लांट दुर्घटना के बाद रोबोट्स भेजे गए थे लेकिन उन्होंने सिर्फ़ वीडियो और अन्य डाटा ट्रांस्फ़र किया. वह मरम्मत का काम नहीं कर सकते थे.

इसके विपरीत डीआरसी परीक्षण में ज़्यादा की उम्मीद की जा रही है. इसमें रोबोट्स को आठ काम करने होंगे.

उन्हें खंभों के साथ-साथ गाड़ी चलाकर जाना होगा.एक ऐसे इलाके से निकलना होगा जिसमें ढलान, सीढ़ी और ढीले कुंदे पड़े होंगे.आठ फ़ीट ऊंची सीढ़ी पर चढ़ना होगा.रास्ता रोक रहे मलबे को हटाना होगा.लीवर लगे हुए दरवाज़े को खींचकर खोलना होगा.एक बिना तार वाले ड्रिल से दीवार को तिकोना काटना होगा.तीन एयर वॉल्वस को बंद करना होगा, जिनमें हर एक अलग आकार के पहिए या लीवर से बंद होगा.एक पाइप को खोलना होगा और फिर इसके नॉज़ल को दीवार से लगे एक कनेक्टर से कसना होगा.

आयोजक मानते हैं कि इस दौरान रोबोट्स को कुछ खरोच और धक्के लग सकते हैं.

डीआरसी के मैनेजर गिल प्रैट कहते हैं, "अभी रोबोट्स करीब-करीब एक साल के बच्चे जितने ही कुशल और चलने योग्य हैं. इसलिए आपको रोबोट बहुत धीरे चलते हुए लगेंगे."

"आप यह भी देखेंगे कि रोबोट्स अभी उस स्तर पर खुद ही काम करने में सक्षम नहीं हैं जितना हम चाहते हैं लेकिन एक इंसान उन्हें ऑपरेट करेगा तो इससे बहुत फ़र्क पड़ेगा."

अमरीकी दलों के अलावा दक्षिण कोरिया, हॉंग-कॉंग, चीन, जर्मनी और जापान के इंजीनियर भी इस प्रतियोगिता में शामिल हैं.

हथियार कार्यक्रम?

ज़्यादातर अपनी खुद की मशीन लेकर आए हैं लेकिन बाकी बॉस्टन डायनेमिक्स (जिसे हाल ही में गूगल ने ख़रीदा है) के दो पैर वाले रोबोट- एटलस- की कॉपियों को प्रोग्राम कर रहे हैं.

एटलस पर ही काम कर रही मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) की टीम के प्रोफ़ेसर सेथ टेलर इस प्रतियोगिता को "खेल बदलने वाला" बताते हैं.

वह कहते हैं, "आपको यहां काम वास्तविक स्थितियों में करने होंगे- मतलब बाहर खुले में. बिना यह जाने कि आगे किस तरह की ज़रूरत पड़ेगी वह भी बहुत ख़राब नेटवर्क लिंक के साथ."

"ऐसे बहुत से मौके आएंगे जब इंसान और रोबोट्स के बीच किसी क़िस्म का कोई संपर्क नहीं होगा. इसे काम को अंजाम देने के लिए खुद ही चीज़ें करनी होंगी."

लेकिन अमरीकी सेना के इन तकनीकी दलो के साथ काम करने को लेकर सभी रज़ामंद नहीं हैं.

रोबोट आर्म्स कंट्रोल पर अंतर्राष्ट्रीय समिति के सह-संस्थापक प्रोफ़ेसर नोएल शार्की पूछते हैं, "जब रक्षा बजट इतने दबाव में है तब अचानक डार्पा लाखों डॉलर बचाव रोबोट के विकास पर क्यों ख़र्च कर रहा है?"

"ऐसा लगता है कि यह परिष्कृत रोबोट हथियारों को विकसित करने का दीर्घकालिक कार्यक्रम है."

प्रोफ़ेसेर हॉंग मानलते हैं कि इस प्रतियोगिता से टर्मिनेटर जैसे (एक हॉलीवुड फ़िल्म) हत्यारे रोबोट्स के विकास को रफ़्तार मिल सकती है लेकिन इस बात पर ज़ोर देते हैं कि कार्यक्रम का घोषित लक्ष्य ज़िंदगियों को बचाना है- तबाह करना नहीं.

हालांकि वह मानते हैं कि रोबोट्स के बचाव कार्य शुरू होने में उतने में अभी वक्त है.

वह कहते हैं, "एक वास्तविक परमाणु संयत्र में रेडिएशन सभी इलेट्रॉनिक उपकरणों को बर्बाद कर देगा. रेडिएशन से सुरक्षा एक बड़ी दिक्कत है और इसके लिए सालों तक शोध और विकास कार्य करना होगा."

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