मोबाइल ऐप्स, बोले तो जादू का पिटारा!

  • 10 जनवरी 2014

उत्तर प्रदेश के हापुड़ में एक सरकारी बैंक में क्लर्क रमेश शर्मा सुबह से परेशान हैं कि फ़ोन बिल भरने की आज आख़िरी तारीख़ थी और उनके दिमाग़ से यह बात फ़िसल गई. शाम का वक्‍़त है, ऐसे में‌ बिल काउंटर्स भी बंद हो चुके होंगे.

शर्माजी के घर में कंप्यूटर या लैपटॉप भी नहीं है, जो वेबसाइट पर लॉग-इन करके तुरंत बिल जमा करा दें. मगर सातवीं क्लास में पढ़ने वाला उनका बेटा सक्षम उनकी दिक़्क़त समझ नहीं पा रहा.

जब पता चला, तो उसके चेहरे पर विजयी मुस्कान आ गई.

सक्षम ने पिछले महीने छह हज़ार रुपए में खरीदा अपना एंड्रॉयड स्मार्टफ़ोन जेब से निकाला. टच-पैड स्क्रीन पर कुछ मिनट उंगलियां दौड़ाईं, पापा का कार्ड मांगा और बिल जमा हो गया.

शर्मा जी बेटे का चेहरा देखते रह गए. उन्हें यक़ीन ही नहीं हुआ कि फ़ोन पर बिल जमा करना बच्चों का खेल बन चुका है, जिसके लिए कभी वो घंटों लाइन में खड़े हुआ करते थे.

कल शाम की ही बात थी, जब सक्षम ने इसी फ़ोन से अपने इलाक़े के सारे डॉक्टरों और अस्पतालों की फेहरिस्त दो मिनट में निकाल दी थी.

स्मार्टफ़ोन, जादू की छड़ी!

सक्षम इसे ‘जादू की छड़ी’ कहता है और उसके पिता को इस पर यक़ीन हो चला है. यह स्मार्ट लोगों का ऐसा दौर है, जिसमें स्मार्टफ़ोन के बिना ज़िंदगी की कल्पना मज़ाक सी लगती है.

मगर फ़ोन हमेशा से ऐसा नहीं था. वह सिर्फ़ दो लोगों की बात कराता था. अब दुनिया चलाने लगा है.

फ़ोन और बिजली बिल जमा करने संबंधी ऐप, नेविगेशन, शौकिया फ़ोटोग्राफी, न्यूज़, शेयर बाज़ार, मनोरंजन, गेम्स, डिक्‍शनरी हो या कैलकुलेटर, स्मार्टफ़ोन हर चोला ओढ़ लेता है.

और यह कमाल है मोबाइल ऐप्लिकेशन का! फ़ोन की स्क्रीन पर नज़र आने वाली ये ईंटनुमा आकृतियां अपने भीतर पूरी दुनिया समेटे हैं. एक टच और दुनिया खुलकर आपके सामने आ जाएगी.

फ़ोन को पैदा हुए यूं तो कई बरस गुज़र चुके थे, लेकिन वो स्मार्ट तब हुआ, जब उसे ऐप्लिकेशन के पंख लगे. यह कमाल किया अमरीका की कंप्यूटर कंपनी ऐपल ने.

जुलाई, 2008 में आईओएस के लिए ऐपल के ऐप स्टोर की नींव रखी गई और एक नई क्रांति का आगाज़ हुआ. बाद में दूसरी टेक्‍नोलॉजी कंपनियों ने भी इसे लपक लिया.

विशेषज्ञों की मानें, तो बीते साल ऐप से दुनियाभर में होने वाली कमाई 20 से 25 अरब डॉलर तक पहुंच गई और उम्मीद है कि 2017 तक यह तीन गुना हो जाएगी.

यह बात सही है कि ऐप यूज़र्स इनके लिए भुगतान करना पसंद नहीं करते, लेकिन जो ऐप्स अच्छे हैं उनके लिए वो जेब ढीली करने से भी गुरेज़ नहीं करते.

रोटी, कपड़ा और मोबाइल!

बीस बरस पहले एक जुमला खूब मशहूर हुआ. ज़िंदगी की तीन जरूरतें - रोटी, कपड़ा और मकान. मगर स्मार्टफ़ोन ने ज़िंदगी के साथ उसे चलाने वाले मंत्र भी बदल डाले.

अब दुनिया रोटी, कपड़ा, मकान और मोबाइल की बात करती है. स्मार्टफ़ोन ऐप्स इसमें जुड़ने वाली पांचवीं ज़रूरत बन गई है.

फ़ोन कॉल और मैसेज के लिए जेब से निकाले जाने वाला मोबाइल फ़ोन अब दिन के ज़्यादातर घंटे और रात में कई बार हाथों में रहता है, तो इसकी वजह स्मार्ट ऐप्स हैं.

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