क्या खत्म हो रही हैं मधुमख्खियां?

Image caption मधुमख्खियों की कमी का असर परागण और पैदावार पर होता है.

एक शोध में ये सामने आया है कि यूरोप के काफ़ी हिस्से में फ़सलों के परागण के लिए मधुमख्खियों की संख्या कम पड़ गई है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि जैव ईंधन वाली फसलों में भारी पैमाने पर इजाफा होने कारण परागण की जरूरत अत्यधिक बढ़ गई है.

सबसे ज्यादा कमी ब्रिटेन में है जहां जरूरत की महज एक चौथाई मधुमख्खियां ही मौजूद हैं.

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस कमी को भौंरे और मख्खियों की अन्य जंगली प्रजातियां पूरा कर रही हैं.

इस अध्ययन को प्लोस वन जर्नल में प्रकाशित किया गया है.

भोजन या ईंधन

हाल के दिनों में ब्रिटेन और अन्य जगहों पर मधुमख्खियों की संख्या घट रही है और इसकी वजह कीटनाशकों का इस्तेमाल और बीमारियों को माना जा रहा है.

हालांकि पूरे यूरोप में, 41 देशों में 2005 से 2010 के बीच मधुमख्खियों के छत्तों की संख्या में सात प्रतिशत की कुल वृद्धि दर्ज की गई है.

लेकिन इसी समयावधि में तिलहन, सूरजमुखी और सोयाबीन जैसी जैव ईंधन की फसलों का क्षेत्रफल एक तिहाई बढ़ गया.

यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग से जुड़े और इस अध्ययन का नेतृत्व करने वाले डॉ. टॉम ब्रीज का कहना है, ''बहुत सारे देशों में तिलहन की फ़सलों में भारी इजाफा हुआ है.''

''ग्रीस में 2005 में कुछ ही हेक्टेयर में तिलहन की पैदावार की जाती थी लेकिन तबसे लेकर इसके क्षेत्रफल में कई गुना इजाफा हुआ है क्योंकि जैव ईंधन फ़सलों पर सब्सिडी मिलती है.''

मांग और अनुपात

उनका कहना है कि पूरे यूरोप में छत्तों की संख्या में करीब एक करोड़ 34 लाख की कमी आई है. यानी सात अरब मधुमख्खियों की कमी आई है.

सबसे ज्यादा कमी वाले देशों में ब्रिटेन सबसे अव्वल है. ब्रिटेन से 300 गुना छोटा मोलदोवा ही केवल ऐसा देश है जहां मधुमख्खियों की सबसे ज्यादा कमी है.

शोधकर्ताओं का मानना है कि परागण में सहायक प्रजातियों पर निर्भरता पैदावार को प्रभावित कर सकती है और ब्रिटेन में फ़सलों पर खतरा पैदा हो सकता है.

शोध पत्र के सह लेखक और यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के प्रोफेसर साइमन पॉट्स के अनुसार, ''यदि हम कोई उपाय नहीं करते हैं तो आने वाले समय में यह समस्या भयावह हो जाएगी.''

''परागण में सहायक जंगली प्रजातियां को सुरक्षा की जरूरत है. ये गांव के कम चर्चित नायक हैं जो मनुष्यों की खाद्य शृंखला में एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम मुफ्त में करते हैं. वरना ब्रिटिश किसानों को 180 अरब रुपये अतिरिक्त खर्च करना पड़ता.''

जैव ईंधन की बाध्यता

शोधकर्ताओं का कहना है कि यूरोपीय संघ के स्तर पर मख्खियों की रक्षा करने के लिए कुछ क़दम उठाए गए हैं, जैसे, नियोनिकोटिनॉयड कीटनाशकों पर शुल्क स्थगित करना, लेकिन कई यूरोपीय देश समस्या पर गंभीरता से विचार नहीं कर रहे हैं.

यूरोपीय संघ के अक्षय ऊर्जा के लिए जारी दिशा निर्देशों के अनुसार, 2020 तक परिवहन ईंधन का 10 प्रतिशत हिस्सा अक्षय ऊर्जा से हासिल करना अनिवार्य है. हालांकि अभी इस पर बातचीत जारी है.

अंतिम लक्ष्य जो भी हो इस दिशा निर्देश का प्रभाव यह हुआ कि इससे तिलहन फ़सलों के क्षेत्रफल में वृद्धि हुई.

प्रोफेसर पॉट्स के अनुसार,''पूरे यूरोप में कृषि और पर्यावरण के बीच काफी दूरी बढ़ रही है.''

''एक तरफ किसानों को तिलहन वाली फ़सलों का उत्पादन करने के लिए हम बढ़ावा दे रहे हैं, दूसरी तरफ इस बात पर कोई विचार नहीं हो रहा है कि परागण के लिए कीट पतंगों की सुरक्षा कैसे की जाएगी.''

पूरे यूरोप में एक व्यवस्थित रणनीति बनाए जाने की आवश्यकता है.

(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें. आप ख़बरें पढ़ने और अपनी राय देने के लिए हमारे फ़ेसबुक पन्ने पर भी आ सकते हैं और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार